Sunday, 20 August 2017

नही मिलती कोई खुशी
अब
तुम्हे देखकर
उदास हो जाता है मन

वक्त की परतो के नीचे दबे
लम्हे

तेरी यादों के झोंके से
निकल आते है बाहर

बहुत दुखता है
मन के भीतर कुछ

जब भी तुझसे
निगाहें टकराती है
आजकल

फिर से उन लम्हों को
जीने को

लालायित हो उठता है
ये बावरा मन

दबाना पड़ता है
सीने में ही
बेलिबास हसरतों को

बहुत समझाना पड़ता है
खुद को

अब तुझमे कोई
बस नही रह गया है मेरा

मगर ये जो तेरी यादें हैं
ये मेरे बस मे नही

आ ही जाती है
गाहे ब गाहे

मुझसे
इजाजत लिए बगैर