Monday, 22 September 2025

आते हैं हमसे मिलने वो चश्मा उतार कर


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आते हैं  हमसे  मिलने  वो  चश्मा  उतार कर
मिलते  नही  है  पर  कभी  रुतबा उतार कर

हर पल   बदलते  देखे हैं  हमने जहां के रंग
फिर रख दिया है  हमने भी  चेहरा उतार कर

अब  आजकल  ये  अहदे मुहब्बत  कहां रहे
करते हैं  लोग  इश्क  भी  कपड़ा उतार कर

अब  हादसों के  दौर  भी कुछ ऐसे चल पड़े
घर से  निकलते  लोग हैं  सदका  उतार कर

नफरत की  बाढ़ में  ये  मुहब्बत भी बह गई
हासिल हुआ क्या  अम्न की  गंगा उतार कर

मजहब  बड़ा  के  भूख  बड़ी  है  जहान में
इस  बार   देखते  हैं  ये   चर्चा  उतार  कर

रंगों  के  साथ  साथ  दिली  मैल  धूल  गए
हमने भी रख दिया गिला शिकवा उतार कर

दो  चार  हर्फ  जोड़  लिए  बस  इधर उधर
फूले  नही   समाते  हैं   मिसरा  उतार  कर

यूँ  ही  तो  वो  दरख्त  नही  लड़खड़ा गया
रोया  है   खूब   जर्द  सा  पत्ता  उतार कर

बचपन  को  ढुंढता  वो  फिरे  बदहवास सा
लगता  उदास  तिफ्ल़  का  चोला उतार कर

धोखा  फरेब  झूठ  खलक  अनलहक़ अना
हम दर पे मां के आए हैं क्या क्या उतार कर

बंटने  लगी  है  राहतें   फिर  लालीपाप सी
फिर  से  उचक्के  आ  गए चोला उतार कर