जरा जरा सा करके संवरने लगी है
धुप मेरे आंगन भी उतरने लगी है
झीलों का शहर है प्यासा है पंछी
इक बुंद में हालात निखरने लगी है
मजबूरियों से हाथ बंधे हैं अभी
भुख बेझिझक सबसे लड़ने लगी है
सब जिंदगी ही चुल्हे पर दिखती है
न गली न पकी बस उबलने लगी है
जाने कैसा बंधन कौन-सा रिश्ता है
आंखों के रस्ते जो रिसने लगी है
खिलौने माशूका रुतबा फिर खुदा
उम्र से यूं फितरत झलकने लगी है
चांद की पीली आँच में झुलस कर
कुछ ख्वाबों में दरारें पडने लगी है
जरा जरा करके मौत आ रही है
जरा जरा उम्र भी ढलने लगी है