Sunday, 28 February 2016

जरा जरा सा करके संवरने लगी है

जरा जरा सा करके संवरने लगी है
धुप मेरे आंगन भी   उतरने लगी है

झीलों का शहर है    प्यासा है पंछी
इक बुंद में हालात निखरने लगी है

मजबूरियों से हाथ      बंधे हैं अभी
भुख बेझिझक सबसे लड़ने लगी है

सब जिंदगी ही चुल्हे पर दिखती है
न गली न पकी बस उबलने लगी है

जाने कैसा बंधन कौन-सा रिश्ता है
आंखों के रस्ते    जो रिसने लगी है

खिलौने माशूका  रुतबा फिर खुदा
उम्र से यूं फितरत झलकने लगी है

चांद की पीली आँच में झुलस कर
कुछ ख्वाबों में दरारें पडने लगी है

जरा जरा करके   मौत आ रही है
जरा जरा    उम्र भी ढलने लगी है

Friday, 26 February 2016

ये जो तुम हालचाल पुछते हो

ये जो तुम हालचाल पुछते हो
बडा मुश्किल सवाल पुछते हो

देख कर भी तबाही के मंजर
बेखबर बन कमाल पुछते हो

अश्क तन्हाई हसरतें उदासी
नाउम्मीदगी बेहाल पुछते हो

जीने की शर्त यहां खामोशी हैं
दिल मे दफ्न मलाल पुछते हो

हाथो में खुदखुशी की अर्जियां
लाचार से खुशहाल पुछते हो

फाको में जहां बसर हो रही है
क्या है भुख हड़ताल पुछते हो

तुरपाई लिबास के कहां कहां से उधड़े

तुरपाई लिबास के कहां कहां से उधड़े
कुछ यहाँ से उधड़े कुछ वहाँ से उधड़े

अश्कों के धागे से सी लेते हैं कुछ गम
पैबंद लगा देते हंसी के  जहां से उधड़े

जरा सी आंच मे  झुलस जाते हैं रिश्ते
बहुत ऐसे है जो  हमारी जुबां से उधड़े

कद लोगों के बहुत   अब ऊंचे हो गये
यार भी मुफलिसी के   निशां से उधड़े

लगे है मेले खुशी   के जिस्म के बाहर
सुलगते दर्द से    उठते धुंआ से उधड़े

सांसो को छूके जो कोई महक निकली
पीछे पीछे जो चले आंसू वहां से उधड़े

हवाएँ जैसी हो हर बात भी उसी तरह
शहर फिर क्यूँ कभी तेरे बयां से उधड़े

Thursday, 18 February 2016

अब तक सुलग रहा है उठ रहा है धुंआ धुंआ सा

अब तक सुलग रहा है उठ रहा है धुंआ धुंआ सा
इक रिश्ता जलते जलते रह गया है जरा जरा सा

कुछ बीज मुहब्बत के      सींचे थे घर के आंगन
बिन खाद पानी पौधा     दिखता है मरा मरा सा

मुद्दत हुई है इश्क की      मैयत ही निकल गई है
दिखता है अब तलक ये दिल यूँ ही भरा भरा सा

रिश्तों की फटी है चादर      तुरपाई कर रहा था
सुई चुभी जो उंगली      रह गया मै डरा डरा सा

वसीयत में मिली शराफत हर शख्स को शहर में
हर बंदा फिर भी क्यूँ है     यही पे लुटा लुटा सा

सुबह निकले थे जरुरतों के संग धुप सर पडी़ थी
शाम लौटा तो हाथ खाली औ खुद थका थका सा

बस राख ही बचा है  कुछ बाकी तो निशां नहीं है
बस्ती थी कल यहां पर   लगता है सुना सुना सा

Wednesday, 17 February 2016

आंखों में लगा काजल फैला जरुर होगा 2

आंखों में लगा काजल फैला जरुर होगा
रिश्ता लिबास बन कर मैला जरुर होगा

उम्मीदें वफा की हो चादर से भला कैसे
पैबंद से भी हाले         बयां जरुर होगा

हम आज अजनबी से जो है तेरे शहर में
यहीं कहीं पे अपना    निशां जरुर होगा

रिश्तों की महक कैसे यूँ खोने अब लगी है
दरमियां कोई तो       बोझा जरुर होगा

जिक्र फिक्र तेरा      खयालो सवाल तेरे
कुछ इसके सिवा भी तो चर्चा जरुर होगा

सिक्कों की खनक हरदम कानों में गूंजते
तब रिश्तों ने भी घर को छोडा जरुर होगा

रक्त में नहा कर   अखबार आज आया है
शहर में कहीं बलवा    हुआ जरुर होगा

अखबारो मे ही भुखा   रोटी लपेट लाया
संसद पटल में कल ये   मुद्दा जरुर होगा

आंखों में लगा काजल फैला जरुर होगा

आंखों में लगा काजल फैला जरुर होगा
रिश्ता लिबास बन कर मैला जरुर होगा

वफा की उम्मीद चादर से भला कैसे करे
फकत छेद से सब दर्द बयां जरुर  होगा

अजनबी से है आज तेरे शहर में तो क्या
वहीं कहीं पे अपना भी निशां जरुर होगा

मिठास रिश्तो की सब ही क्यूँ खोने लगी
कोई तो फासला इस दरमियां जरुर होगा

तेरा जिक्र फिक्र और तेरे खयाल सवाल
इसके सिवा कुछ  नहीं  बचा जरुर होगा

खुन से सना हुआ अखबार  दिख रहा है
नफरतों से फिर कहीं बलवा जरुर होगा

उसी अखबार मे भुखा रोटी रख खा रहा
जिसकी खबरों का यहां मुद्दा जरुर होगा

Monday, 15 February 2016

खैरातों में लिपटी हुई सी जिंदगी मिली

खैरातों में लिपटी हुई सी जिंदगी मिली
लोगों के रहमतो पे हमें हर खुशी मिली

चाहा मुस्कुराने तो    आंसू निकल पड़े
हर मोड़ पर  हालातों की बेबसी मिली

कभी दुआ तो कभी   बद्दुआ से लडते
उम्र भर ही किश्तों में खुद कुशी मिली

मिट्टी के बुतों का  यहां मेला लगा हुआ
हमे कही इंसान की    मुरत नहीं मिली

दर्द बदन पर फैले हर कपड़े मिले मैले
राख के ढेर तो मिले चिंगारी नहीं मिली

दिन तो गुजरता जाता  यूं ही बुझा बुझा
शाम तलक नसीबो से रोशनी नहीं मिली

जरुरतों का इस घर में धुंआ बहुत है

ख्वाहिशे सांस भी नहीं ले पाती यहां
जरुरतों का इस घर में धुंआ बहुत है

नींद तो अब भी बहुत आती है मगर
जिम्मेदारियों का मुझपे बोझा बहुत है

घर की बात थी बाजार तक आ गई
तकदीर संग अपना झगड़ा बहुत है

घर का अखबार बुजुर्ग सा लगता है
जरूरत के बाद लगता बेजा बहुत है

बर्फीले अहसास कभी जी कर देखिए
गर्म जज्बातों का महज धोखा बहुत है

मुसीबतें आना जाना करती रहती है
इस घर के साथ उसका रिश्ता बहुत है

दैरो हरम के नाम पे बरगला रहे हैं कुछ लोग

दैरो हरम के नाम पे बरगला रहे हैं कुछ लोग
नफरतों की नई फसल उगा रहे हैं कुछ लोग

शहर में हवायें अब कुछ गर्म सी बहने लगी है
चिंगारियों को फुंक से दहका रहे हैं कुछ लोग

खामोशी से आती है शहर में बारिश आजकल
दहशतगर्दी फिजूल में   फैला रहे हैं कुछ लोग

परदों से नही बच पायेगी अब आबरू घर की
सुराखों पर भी अब सेंध लगा रहे हैं कुछ लोग

हम ही मुकर्रर हो गये क्या हर इम्तिहाँ के लिए
हमारा पता मुश्किलों को बता रहे हैं कुछ लोग

आसमां छुने के खातिर इक परिंदा आमादा है
रास्ता रोक उसके पंख जला रहे हैं कुछ लोग

नक्शा उठाके देख लिया हमें कहीं दिखा नही
मुहब्बतो का इक शहर  बता रहे हैं कुछ लोग

Saturday, 13 February 2016

अपने नसीब खुशियों की हिस्सेदारी नही जानते

अपने नसीब खुशियों की हिस्सेदारी नही जानते
समझ तो सब लेते हैं पर दुनियादारी नहीं जानते

पाई पाई जोड़ते रहते है चंद हंसी लम्हो के लिए
मुसीबतों से बचने की   कोई तैयारी नहीं जानते

बडी शिद्दत से निभाते हैं हर किरदार हम अपना
रिश्तो की गहराई में महज अदाकारी नहीं जानते

दफ्न करते हैं रोज ख्वाहिशे जरुरतों की नाम पर
बदहवास सी जिंदगी की कारगुजारी नहीं जानते

मतलबपरस्ती के दरमियां  इस तरह  घिरे हुए हैं
चिकनी चुपडी   बातों की होशियारी नहीं जानते

आजादी के नाम पर जो मुल्क बेचने निकले हैं वो
बकवाद बस करते हैं कोई जिम्मेदारी नहीं जानते

वतनपरस्ती पर उनके ये सवाल होना लाजिमी है
पहलु में बैठे हैं दुश्मनों के और गद्दारी नहीं जानते

करते हैं जुल्म इस तरह कि दाग कही दिखते नहीं
शरीफों की बस्ती से है जो गुनहगारी नहीं जानते

Friday, 12 February 2016

फौजी पर कविता

बिंदिया कंगन पैजनियां का श्रृंगार नही सुहाता है
घर पे रोती आंखों को कोई त्यौहार नहीं सुहाता है

इस छुट्टी पर जो बेटा मां की साड़ी लाने वाला था
वो वीर सिपाही भारत के तिरंगे मे लिपटा आता है

धन्य है वो गोद मां की  जिसने ऐसा लाल जना है
जिस हौसले के दम  ही आज अपना सीना तना है

जिन हौसलों से बर्फीला पर्वत भी पिघल जाता हैं
मौत भी ऐसे वीरों के सामने आने से घबराता है

खुब लजाते सकुचाते आयी मौत उस बेटे के पास
हर आंखे गीली हो गई मुल्क की हर   सुरत उदास

अंतिम सांसों तक अपनी वो जंग ही लडता रहा
फर्ज से डिगा नही सरहद की हिफाजत करता रहा

हनुमनथप्पा हम तुझे श्रद्धासुमन समर्पित करते हैं
बिरले ही होते हैं वो बंदे जो मुल्क के लिए मरते हैं