Wednesday, 19 February 2020

चाह है बस कुछ न कुछ चलता रहे

चाह है  बस  कुछ न कुछ  चलता  रहे
अब  फसाना   हो कि  वो   धोखा रहे

प्रोपेगेंडा    इस कदर    फैला  है   कि 
हर  किसी  के   आंख  में   परदा  रहे

दरमियाँ   अनबन   भले   चलती  रहे
फासला  दिल से  नही  दिल  का  रहे

क्या  भला  इससे  जियादा   हो  बुरा
खुद का होकर भी न जो खुद का रहे

कोई  हो   किरदार   कैसा  भी  मगर 
हर किसी  के  दिल  में इक बच्चा रहे

जिंदगी  जीना  है  गर  तो   यूँ  जीयो
खत्म  हो   किस्सा   मगर   चर्चा  रहे

शाद   कैसे   अब  कोई  भी हो भला
हर  बखत   जब  पेट  ही  मसला रहे

भूख  और  रोटी  की  बातें छोड़ कर
मुल्क  में    मजहब    बड़ा  मुद्दा  रहे

कोई सच की तह तलक  जाता नही
झूठ  चाहे   कितना  भी  कहता  रहे

उलझी  है    जद्दोजहद   में  जिंदगी
कैसे  अब  कह दे  भला  बढ़िया रहे

सुब्ह  की  खातिर   जरूरी  शम्स है
चांद  कब  तक   रात  में  ठहरा  रहे

आईना  ही   पोंछकर  क्या  फायदा
धूल  से   सर सर   अगर  चेहरा  रहे

दाग   दामन  में  अगर  है   रहने  दे
कुछ  कहीं पर  तो कभी  अच्छा रहे

बसंत आते ही मौसम की मार गुजरेगी

बसंत  आते  ही   मौसम   की मार  गुजरेगी
खिलेंगे   मौर  भी   महकी   बयार  गुजरेगी

शजर में  फिर से  नये फूल पल्लवित   होंगे
यकीं  है  अब कि  इधर  से  बहार  गुजरेगी

जगी है  आस   नयी   दरमियाँ   उदासी  के
चलो  कभी  तो  कहीं  हंस  के यार गुजरेगी

फिर  एक  बार    पसारेंगी    पांव    उम्मीदें
बहुत  करीब  से   हसरत   हजार   गुजरेगी

नया है दिन  है नयी सुब्ह  कुछ तो बदलेगा
या अब कि बार भी  खुशियां उधार गुजरेगी

अजब नशा है सियासत का आज लोगों पर
हर एक दिन   यूँ ही  फितने सवार  गुजरेगी

समझ  ये पायेगी  जमहूर  कब सही क्या है
ये  कब तलक  यूँ ही  रहबर खुमार गुजरेगी

खयाल  ख्वाब में  तस्वीर  इक  बनी है  जो
बची  ये जिन्दगी  उस को  निखार  गुजरेगी

हसीन  सपने  सजाए थे  दिल  के  कोने में
जहन  जिगर पे  वही  अब  बेदार  गुजरेगी

सत्कार बदल जाते संसार बदल जाते

सत्कार   बदल   जाते   संसार    बदल   जाते
दहलीज़   बदलते   ही   किरदार  बदल  जाते

कैसी  ये  विडंबना है  मालिक  तेरी  दुनिया में
बेटी  के    बिहाते  ही   हकदार   बदल   जाते

जज्बात   बिकाऊ  है    हर  बात   बिकाऊ  है
दरकार  मुताबिक  अब   बाजार   बदल  जाते

मतलब की ये दुनिया है मतलब की ही यारी है
हालात   बदलते  ही   सब  यार   बदल   जाते

दीपक की जरूरत  बस  अंधियारे तलक ही है
सूरज  के  निकलते  ही   दरकार  बदल  जाते

मालिक मेरे बच्चों पर  रहमत की नजर करना
परेशान  हो   गर  कोई   गुफ्तार   बदल  जाते

मंजिल  पे  पहुंच  करके  रस्तों को  भुला  बैठे
अहसान  फरोस ऐसे   क्यूँ  यार   बदल  जाते

मै  खुद  भी  नदारद हूँ  अपनी  ही  कहानी से
कुछ  काम  न  होने  पर   भंगार   बदल  जाते

अनजान  सा  दिखता है अब शहर ये सारा ही
बेदार   न   रहिए   तो    दस्तार   बदल   जाते

हर  रोज़  वही  खबरें   बस  लूट  फसादों  की
कुछ और न बस हर दिन अखबार बदल जाते

Wednesday, 12 February 2020

बसंत आते ही मौसम की मार गुजरेगी

बसंत  आते  ही   मौसम  की  मार  गुजरेगी
खिलेंगे   मौर  भी   महकी   बयार  गुजरेगी

शजर में  फिर से  नये फूल पल्लवित   होंगे
यकीं  है  अब कि  इधर  से  बहार  गुजरेगी

जगी है  आस   नयी   दरमियाँ   उदासी  के
चलो  कभी  तो  कहीं  हंस  के यार गुजरेगी

फिर  एक  बार    पसारेंगी    पांव    उम्मीदें
बहुत  करीब  से   हसरत   हजार   गुजरेगी

नया है दिन  है नयी सुब्ह  कुछ तो बदलेगा
या अब कि बार भी  खुशियां उधार गुजरेगी

अजब नशा है सियासत का आज लोगों पर
हर एक दिन   यूँ ही  फितने सवार  गुजरेगी

समझ  ये पायेगी  जमहूर  कब सही क्या है
ये  कब तलक  यूँ ही  रहबर खुमार गुजरेगी

खयाल  ख्वाब में  तस्वीर  इक  बनी है  जो
बची  ये जिन्दगी  उस को  निखार  गुजरेगी

हसीन  सपने  सजाए थे  दिल  के  कोने में
जहन  जिगर पे  वही  अब  बेदार  गुजरेगी

Tuesday, 11 February 2020

रोज के हादसों का दिल पे भी असर आता है

रोज के हादसों का दिल पे भी असर आता है
आदमी   गाहे-बगाहे   यूँ   ही   डर   जाता है

चोट  करती है  जो   गहराई तलक  शिद्दत से
उम्र भर   दाग  भी   चेहरे पे   नजर  आता है

शिद्दतों  से जो  तराशा  गया पत्थर भी कभी
पारसाई   सा   वो   किरदार   निखर आता है

यूँ  न  बरपाओ   कहर  इंतेहां  है जुल्मत की
खौफ  मासूम  की  आंखों  में  उतर  आता है

हसरतें   रोज  ही  दम   तोड़ती है चौखट पर
जेब  खाली  लिए  जब  बाप वो घर आता है

झूठ  की  भीड़ में  दम  तोड़ती सच की सांसे
शोर ही   शोर   सभी   ओर  जो भर आता है

बेच  आते है  सभी  शौक  जरूरत  के  लिए
शाम  होते  ही  थका  जिस्म  इधर   आता है

वक्त  के  साथ   बदलना  नही  आता  है हमें
गैर  को  अपना   बनाने   का  हुनर  आता है

दुश्मनों  को  भी  करे  माफ जो धोखे खाकर
आते आते  ही  किसी  पर  ये  असर आता है

नफरत से हर किसी का ही नुकसान ही तो है

नफरत से हर किसी का ही नुकसान ही तो है
रखकर   गुबार   जिंदगी   हलकान  ही  तो है

बिखरी थी  कल  फिजाओं में रंगत बहार की
वो  बस्तियां  भी   खौफ  से   वीरान ही तो है

हर शख़्स  जिम्मेदार  है  इस  हाल  के  लिए 
सहमा   डरा  जो   वक्त   है दौरान  ही  तो है

क्यूँ  जात  और  जमात  में  बंटता  है आदमी
पहले तो  हर एक  शख्स भी  इंसान ही तो है

जद्दोजहद  यूँ  जीने की  खातिर  ही चल रही
पर  हर बशर  ही  वक्त से  अनजान ही तो है

रहने  को  कौन  आया  है  दुनिया  में  दोस्तों
दो चार  दिन  का  हर  कोई मेहमान ही तो है

मुश्किल बड़ी है जिसके समझ में न आयी है
समझा है  जिसने  जिंदगी  आसान  ही तो है

आने  दे  लब  पे  आती  है  तो  रोक  न  इसे
महशर  नही  है  कोई  ये  मुस्कान  ही  तो  है

कमबख्त अब तो बख्श दे अहसान कर जरा
दिल  तुझपे  है  फिदा  बड़ा  नादान ही तो है

ऐसे  गिरा  न   आंखों  से   बारे गिराँ   है   ये 
आंसू   ये  तेरे   दर्द  के   दरबान   ही  तो  है

है  वो  नया नया  अभी  उसको  खबर  नही
उल्फत  की राह  से अभी अनजान ही तो है

रह रह   के   है   मचलती   तमन्नाएं  सीने में
कब तक  इन्हें  दबाएँ  ये  अरमान  ही तो है

गैरत   जमीर   से   जो   रहे   हैं   यतीम  से
जिंदा  है  जिस्म  से  मगर  बेजान  ही तो है

कितना  मजा है   दर्द है  कैसे  मिजाज  का
क्या  जाने  वो  भला  कि ये तूफान ही तो है

खिदमत कभी तो कर ले तू मां बाप की जरा
धरती  पे   जीते जागते   भगवान  ही  तो  है

क्यूँ  हड़बड़ाते  देख  के  मफ़ऊल फ़ाइलातु
शेरो सुखन   के  वास्ते   अरकान   ही  तो है

Wednesday, 5 February 2020

है अपनी हरिक मौज उधारी सुबह से

है  अपनी  हरिक मौज उधारी  सुबह   से
जरूरत  है  ख्वाहिश  पे  तारी  सुबह  से

क्यूँ  आंखों  में  है  अश्क  तारी  सुबह से
हुआ  जा  रहा  दिल  भी  भारी  सुबह से

नया   कोई   मेहमान  आने  को  है  क्या
गमो   का   तो  है  आना  जारी  सुबह से

परिशान   हर   शख़्स   दिखता   यहां  है
तबस्सुम  है   सबकी    उधारी   सुबह  से

शिकायत  तो  है   खूब   सारी  यूँ   तुमसे 
मगर  यादें   तेरी    है  भारी     सुबह   से

हुई    मुद्दतें     तुझको     देखा    नही  है
खयालों  में   यूँ  है   तू   तारी    सुबह  से

तमाशा   नया    रोज    दहलीज़   पर  है
चला   आ   रहा   है    मदारी    सुबह  से

पशेमां   कदम   दर   कदम    जिंदगी  है
कुछ  ऐसी   चली  है   बिमारी   सुबह  से

हमारी   जो    होकर    नही   है    हमारी
वही   जीस्त   हमने    गुजारी   सुबह  से

लगाया है  तोहमत पे तोहमत  है  जिसने
वही   एक    सुरत    निहारी     सुबह  से

बिठाया सिर आंखों पे जिस शख़्स को है
उसी  ने   है   इज्जत   उतारी   सुबह  से

खयालो  में   गुजरी   फकत  रात  उनके
जहन  में   है   फिर   बेकरारी   सुबह  से

बहुत   बेलगाम  हसरतों   का   है   घोड़ा
हर इक  शख़्स   करता  सवारी  सुबह से

किये  जो   हमल में है   कल  भ्रूण हत्या
वो   ढूंढे   है    कन्या  कुवांरी   सुबह  से 

ये   दैरो हरम   का   भरोसा   करें    क्या
जो  खुद  है   भरोसे   पुजारी   सुबह  से