चाह है बस कुछ न कुछ चलता रहे
अब फसाना हो कि वो धोखा रहे
प्रोपेगेंडा इस कदर फैला है कि
हर किसी के आंख में परदा रहे
दरमियाँ अनबन भले चलती रहे
फासला दिल से नही दिल का रहे
क्या भला इससे जियादा हो बुरा
खुद का होकर भी न जो खुद का रहे
कोई हो किरदार कैसा भी मगर
हर किसी के दिल में इक बच्चा रहे
जिंदगी जीना है गर तो यूँ जीयो
खत्म हो किस्सा मगर चर्चा रहे
शाद कैसे अब कोई भी हो भला
हर बखत जब पेट ही मसला रहे
भूख और रोटी की बातें छोड़ कर
मुल्क में मजहब बड़ा मुद्दा रहे
कोई सच की तह तलक जाता नही
झूठ चाहे कितना भी कहता रहे
उलझी है जद्दोजहद में जिंदगी
कैसे अब कह दे भला बढ़िया रहे
सुब्ह की खातिर जरूरी शम्स है
चांद कब तक रात में ठहरा रहे
आईना ही पोंछकर क्या फायदा
धूल से सर सर अगर चेहरा रहे
दाग दामन में अगर है रहने दे
कुछ कहीं पर तो कभी अच्छा रहे