Sunday, 30 September 2018

दर्द को हौसले मिल गए

दर्द को हौसले मिल गए
दरमियां फासले मिल गए

जब दरकने लगे भीत ही
दीमकों को भी घर मिल गए

ढुंढता फिर रहा था हमे
दर्द को हम यहीं मिल गए

सब्र मुझको नही थी मगर
दर्द को भी दहर मिल गए

सब तरफ हो रहा है धुंआ
सांस में है जहर मिल गए

होश ही फिर न हमको रहा
सामने वो हमें मिल गए

ख्वाहिशों को पकड़ न सके
जब जरुरत से हम हिल गए

यक ब यक उनसे हम मिल गए
फूल से फिर चमन खिल गए

कैसे जलवा करुं मै तेरा
महफिलों में आ जाहिल गए

वो परिंदा न आया इधर
कल शहर से जो बिस्मिल गए

चांद तड़पा किए रात भर
दीद तेरे हो मुश्किल गए

जिंदगी सांस लेने लगी
आशना जो तेरे मिल गए

मुश्किलें क्यूँ खड़ी हो गई
हौसले जो गले मिल गए

जब जरुरत से हम हिल गए
हादसों को भी दम मिल गए

याद तेरी सताती हमें
पहले ही कहकहे मिल गए

मुड़ के देखा जो पीछे जरा
बिछड़े लम्हें वहीं मिल गए

जागती रात भर रात भी
रात हम रात से मिल गए

आह दिल से निकलती रही
आशना जो तेरे मिल गए

खुशनुमा फिर सुबह हो गई
रात वो ख्वाब में मिल गए

चांद तड़पा किए रात भर
दीद तेरे हो मुश्किल गए

अब मैं सजदा करुंगा तेरा
मस्जिदों से है जाहिल गए

साजिशें फिर चल ही गई
मसअले दैर से मिल गए

खूब ढूंढा किए हैं तुझे
चांद के सामने मिल गए

शिकायत खुशामद सजा चाहते थे

शिकायत  खुशामद   सजा  चाहते थे
मुहब्बत  में  अपनी   वफा  चाहते थे

सुना  है  हवाएँ   बदल  सी  गयी  है
शहर में  सबा  हम    सिफा चाहते थे

ये अपनी मुहब्बत  असर कर गयी थी
न  होना   कहाँ  वो    मेरा  चाहते थे

वहां  चांद  टहनी  पे  बैठा  हुआ  था
बढ़ा  हाथ  उसको   छुना  चाहते  थे

उफ़क से चला औ उरुज आसमाँ तक
ऐ सूरज   ठहर जा   जरा   चाहते थे

जईफ़ी में  सूरज   डूबा  जा   समंदर
शफ़क़  सांझ   हम  देखना  चाहते थे

इबादत  जियारत  सभी  छोड़कर हम
तेरी  दीद    सजदा   तेरा    चाहते थे

तुम्हारे   शहर से   गुजर   हो  रही थी
चले   आते   तुम   मिलना   चाहते थे

तन्हाई के   मरहम   क़मर  रात   तारे
हमारे थे   महरम     भला   चाहते थे

मुक़द्दस   लियाकत   सदाकत  वफाएं
फकत हम  मुहब्बत में  क्या  चाहते थे

Monday, 24 September 2018

खूब चर्चा है मिरे किरदार का

खूब चर्चा है मिरे किरदार का
है अजब किस्सा दिले खुद्दार का

हाथ न फैलाए तंगदस्ती में भी
हर समय रुतबा रखा दस्तार का

भुख पे रोटी पे चर्चा ही नही
इक बड़ा मुद्दा है ये सरकार का

चार दीवारी है इक छत है यहाँ
फ़ाएदा क्या इक नये दीवार का

कोई झगड़ा कोई भी ना बतकही
क्या सबब आपस में फिर तकरार का

इस कदर है हादसे मेरे मुल्क में
तर ब तर है हर सफा अखबार का

कद्र कोई है नही जज्बात की
तजकिरा अब हो कहाँ लाचार का

रोज की ये बात है अब तो यहां
है सरापा दर्द मंद बीमार का

राएगा है चमचमाती जिंदगी
है उजाला चांद में उधार का

बेच देते हैं खुशी हो या के गम
है यही उसूल इस बाजार का

भुख ना रोटी ना मुद्दा है यहाँ
दैर है मुद्दा यहां सरकार का

सुर्खियां है आज ये अखबार में
जिक्र गलती से हुआ लाचार का

दीद की हसरत नही बाकी रही
है फकत उम्मीद अब त्यौहार का

Saturday, 22 September 2018

हादसों के दरमियां जिंदा हूँ मैं

हादसों के दरमियां जिंदा हूँ मैं
लोकतंत्र का निहां मुद्दा हूँ मैं

मै समंदर पी गया हूँ देख लो
जाने कितने वक्त से प्यासा हूँ मैं

चुभते हैं तीर से अल्फाज़ अब
खामुशी से देर तक उलझा हूँ मैं

सिसकियाँ है दबी सीने में पर
सामने तो सबके ही हंसता हूँ मैं

बेरिदा से ख्वाब ओढ़े फिरता
है अयां सब साथ बे रिया हूँ मैं

फितनों का हूं मुकम्मल मुब्तिला
सर गिरां सा है शहर हादसा हूँ मैं

घर के रोटी की जुगत के वास्ते
साथ सूरज के सफर करता हूँ मै

सुर्खियां बनने न पायी जिंदगी
फब्तियां ही फब्तियां ढोया हूँ मैं

रात भर जो रात को ढोता रहा
चांद के पीछे का वो काला हूँ मैं

बांटता जो रोशनी सबको मगर
तिरगी में रह के वो दीया हूँ मैं

बे नवा का ख्वाब हूँ मैं दिल-कुशा
मुफलिसी का गिजा लुक़मा हूँ मैं

निहां - छिपा,/बेरिदा - बेलिबास /बे रिया - साफ दिल/फितनों - फसादों /मुब्तिला - गिरफ्त में /सर गिरां - नाखुश /बे नवा - दरिद्र दीन/दिल कुशा - मनोहर /गिजा - खुराक /लुक़मा - निवाला

Wednesday, 19 September 2018

जिंदगी लाचार है औ कुछ नहीं

जिंदगी    लाचार है   औ कुछ नही
थोड़ी सी   बेजार  है  औ कुछ नही

वो  तसल्ली,    राहतें,   सुकून,  वो
बस यही   उधार है    औ कुछ नही

चिंदी  चिंदी   ख्वाहिशें   सब हो गई
नौ ब नौ  अगयार  है   औ कुछ नही

अपने मतलब का  सभी ने रख लिया
कल के हम अखबार है औ कुछ नहीं

आज भी  मां बाप   के संग  रहते हैं
अपने  ये  संस्कार है  औ  कुछ नहीं

उम्र  भर  का  है असासा   बस यही
अपने  सर  दस्तार है  औ कुछ नहीं

कोई   मतलब  है    नही  हालात से
नाम की  सरकार  है  औ  कुछ नहीं

बाकि तो  सब  ठीक है  मेरे मुल्क में
थोड़े  बस   गद्दार है   औ  कुछ नहीं

अश्क   निहां है   मगर   आंखों से ये
दर्द   आश्कार   है   औ    कुछ नहीं

Monday, 17 September 2018

जईफी को छिपाया जा रहा है

जईफी को छिपाया जा रहा है
खिजाबों सा लगाया जा रहा है

शकल में पोत कर चूना वगैरह
जवां खुद को बताया जा रहा है

बुजूर्गियत फकत अहसास ही है
जहाँ सर पे उठाया जा रहा है

महज चंद लम्हे की ये जिंदगी है
सिकन माथे पे लाया जा रहा है

अजब दस्तूर है ये दुनिया का
जतन कल का बनाया जा रहा है

खबर पल की नही है कोई पर भी
जहन में ख्वाब लाया जा रहा है

जुबां पर रख कर जहर की पोटली को
हमी को आजमाया जा रहा है

जतन किए है बड़े हमनें तभी तो
हमे बकरा बनाया जा रहा है

शहर भुखा है तेरे दीद का ही
भला क्यूँ यूं सताया जा रहा है

रवायतें निभाया जा रहा है
बेजा ही मुस्कुराया जा रहा है

तनाबें बांध लिए जिंदगी के
अजल की ओर जाया जा रहा है

तेरी गली में मकां आलिशान बाकी है

तेरी गली में मकां आलिशान बाकी है
मेरी बस्ती में टूटे से मकान बाकी है

भूखे भूखे से बशर है अभी वहीं पर ही
तुम्हारे सामने ढेरों पकवान बाकी है

चखा नही जो कभी भूख तुम क्या जानो
भरा भरा सा ये मन है जबान बाकी है

कभी खुशी तो कभी की ये जिंदगी ही है
मजा तु भी ले ले काफी उडान बाकी है

तेरी गलियों में आते हैं मसखरे सारे
हमारे गांव में हंसी का जहान बाकी है

किताब कौन सी पढाई तुमको गई जो
जहीन होने के ना ही निशान बाकी है

कसर कहां रह गई जो तवील है इतनी
मुसीबतों की उमर इम्तिहान बाकी है

खरीद के रख लिया है खुशियों को तो
गमों के आज भी थोड़े दुकान बाकी है

मखौल बन कर रह गई है जिंदगी लोगों
लेकिन अब तक इसमें मुस्कान बाकी है

अभी बचा है लोगों के आंख में पानी
यहीं कहीं पे मेरा हिंदूस्तान बाकी है

Sunday, 16 September 2018

दर्द सीने का बयां हो जाएगा

दर्द सीने का बयां हो जाएगा
मामला ये जुर्म का हो जाएगा

जो कभी हम बोलने पे आ गए
जो सुनेगा हकबका हो जाएगा

बोलना भी है जरुरी सा कभी
दर्द दब के घाव सा हो जाएगा

कोई जब राजी नहीं हो सुनने
हादसा भी देखना हो जाएगा

चीखती है जिंदगी तो क्या हुआ
शोर ये सब ही धुंआ हो जाएगा

मुश्किलें तो हर कदम पे है खड़ी
उनपे भारी हौसला हो जाएगा

चांद पिघलता रहा कतरा कतरा
रात भर में वो फना हो जाएगा

आंच पर है जिंदगी की हसरतें
ख्वाब झुलसा झुलसा हो जाएगा

दोस्त बेशक बा वफा बन जाए भी
बेहतर हम सा कहाँ हो पाएगा

मुश्किलों में जिंदगी जो जी गया
जीना मरना साथ का हो जाएगा

Saturday, 15 September 2018

करो चरागां शहर को वो आ रहे होंगे

करो चरागां  शहर को वो आ रहे होंगे
रवायतें  वो  जरा सी  निभा  रहे होंगे

मेरी बस्ती से अंधेरा कभी नहीं मिटता
वो  जूगनू  मेरे  खातिर   ला  रहे होंगे

कभी देखो तो उतर कर गरीब बस्ती में
बेचारगी  में भी  वो   मुस्कुरा  रहे होंगे

कभी ठहर के  नही मोड़ पे देखा उसने
दुआएं   राह में  जादू   बिछा  रहे होंगे

मुझे न फुरसत मजहब तलाश करने की
शह्र ए आली  मेरा फतवा  ला रहे होंगे

तमाम  उम्र  गुजरती  रही  सवालों  में
तमाम  उम्र   हमें   आजमा  रहे  होंगे

हमारे  साथ  निभाना  नही  उन्हें आया
चलो  किसी से  सही वो निभा रहे होंगे

ये पोशिदा सी कहानी से जिंदगी गुम है
खुशी  जरा सी  ढेरों गम  बुला रहे होंगे

Wednesday, 12 September 2018

खामखां है दर ब दर का आदमी

खामखां है दर ब दर का आदमी
ना ही घर का ना सफर का आदमी

इस कदर उलझा हुआ है रिश्तों में
वो है अपने से जुदा सा आदमी

जिंदगी में जिंदगी को ढुंढता
जिंदगी भर उलझा सा आदमी

वो जरुरत की मुकम्मल धूर है
घर में सबका हाथ खर्चा आदमी

ख्वाहिशों को दफ्न कर जीता है वो
मुस्कुराहट में छिपा सा आदमी

हसरतों की भीड़ में सहमा खड़ा
वो जरूरतों में उलझा आदमी

बेचता है रोज खुद को हाट में
टूकड़ो में वो बंटा सा आदमी

आंच पर हस्ती हैं उसकी हर घड़ी
जलती अंगीठी में बैठा आदमी

चीखता है वो कोई सुनता नही
अंधे बहरो के शह्र का आदमी

पीसता है खुद को पुरी उम्र वो
भींच मुट्ठी का पसीना आदमी

घोंसलों से आशियाने का सफर
जी के मरता मर के जीता आदमी

दैर की हो बात या की हो हरम
सबमें आधा आधा उलझा  आदमी

खौफ उसको नियति का भी नही
बन गया है खुद खुदा सा आदमी

जिंदगी ये अजनबी सी हो गई

जिंदगी ये अजनबी सी हो गई
हर खुशी ही खुदखुशी सी हो गई

हसरतें औ ख्वाहिशें सब उड़ गए
रोशनी भी तिरगी सी हो गई

चांद तारों का सफर भुला ये दिल
सिसकियाँ सुन के लोरी सो गई

अतड़ियां जब ऐठी है भुख से
जंग उसूलों से हमारी हो गई

मुश्किलों से सामना ऐसा हुआ
चैन अपना नींद अपनी खो गई

साजिशें ही साजिशें है सब तरफ
नेमतें जो उनपे भारी हो गई

मसखरे से हो गये हैं हम यहां
जिंदगी भी मसखरी सी हो गई

Monday, 10 September 2018

आदतों से जुदा नही होता

आदतों से जुदा नही होता
वक्त हरदम यक सा नही होता

हादसा आम हो गया होता
साथ मेरे जो दुआ नही होता

वक्त करता वफाई जो हमसे
फासला दरमियां नही होता

दायरों में बंधा रहा हरदम
ख्वाहिशों का जहां नही होता

देखकर दुनिया के रंजो गम
चैन से जीना नही होता

सिलसिला थमता ही नहीं है अब
मुश्किलों का ढोना नही होता

क्या इसी को है जिंदगी कहते
टूटे मन से जीना नही होता

मसखरा बस रह गया हूँ मैं
रोज अब कहकहां नही होता

क्या होता है क्या नही होता

क्या होता है क्या नही होता
इश्क में बस वफा नही होता

लोग अपनी गरज से है मिलते
कोई ऐसे सगा नही होता

इश्क की दुनिया ये कैसी है
जिक्र वफाओं का नही होता

चांद छिपा है बादलों पीछे
रात वो बरहना नही होता

वक्त से जब भी सामना हुआ
क्यूँ कभी ये सगा नही होता

क्या इसी को है जिंदगी कहते
सांस चलती पता नहीं होता

हो गयें हैं हादसे इतने
अब ये लगता नया नहीं होता

सिसकियाँ ही सिसकियाँ है
कहकशां बारहा नही होता

सामना मुश्किलों से होता है
रोज मरना ऐसा नहीं होता