खूब चर्चा है मिरे किरदार का
है अजब किस्सा दिले खुद्दार का
हाथ न फैलाए तंगदस्ती में भी
हर समय रुतबा रखा दस्तार का
भुख पे रोटी पे चर्चा ही नही
इक बड़ा मुद्दा है ये सरकार का
चार दीवारी है इक छत है यहाँ
फ़ाएदा क्या इक नये दीवार का
कोई झगड़ा कोई भी ना बतकही
क्या सबब आपस में फिर तकरार का
इस कदर है हादसे मेरे मुल्क में
तर ब तर है हर सफा अखबार का
कद्र कोई है नही जज्बात की
तजकिरा अब हो कहाँ लाचार का
रोज की ये बात है अब तो यहां
है सरापा दर्द मंद बीमार का
राएगा है चमचमाती जिंदगी
है उजाला चांद में उधार का
बेच देते हैं खुशी हो या के गम
है यही उसूल इस बाजार का
भुख ना रोटी ना मुद्दा है यहाँ
दैर है मुद्दा यहां सरकार का
सुर्खियां है आज ये अखबार में
जिक्र गलती से हुआ लाचार का
दीद की हसरत नही बाकी रही
है फकत उम्मीद अब त्यौहार का
No comments:
Post a Comment