शिकायत खुशामद सजा चाहते थे
मुहब्बत में अपनी वफा चाहते थे
सुना है हवाएँ बदल सी गयी है
शहर में सबा हम सिफा चाहते थे
ये अपनी मुहब्बत असर कर गयी थी
न होना कहाँ वो मेरा चाहते थे
वहां चांद टहनी पे बैठा हुआ था
बढ़ा हाथ उसको छुना चाहते थे
उफ़क से चला औ उरुज आसमाँ तक
ऐ सूरज ठहर जा जरा चाहते थे
जईफ़ी में सूरज डूबा जा समंदर
शफ़क़ सांझ हम देखना चाहते थे
इबादत जियारत सभी छोड़कर हम
तेरी दीद सजदा तेरा चाहते थे
तुम्हारे शहर से गुजर हो रही थी
चले आते तुम मिलना चाहते थे
तन्हाई के मरहम क़मर रात तारे
हमारे थे महरम भला चाहते थे
मुक़द्दस लियाकत सदाकत वफाएं
फकत हम मुहब्बत में क्या चाहते थे
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