Sunday, 30 September 2018

शिकायत खुशामद सजा चाहते थे

शिकायत  खुशामद   सजा  चाहते थे
मुहब्बत  में  अपनी   वफा  चाहते थे

सुना  है  हवाएँ   बदल  सी  गयी  है
शहर में  सबा  हम    सिफा चाहते थे

ये अपनी मुहब्बत  असर कर गयी थी
न  होना   कहाँ  वो    मेरा  चाहते थे

वहां  चांद  टहनी  पे  बैठा  हुआ  था
बढ़ा  हाथ  उसको   छुना  चाहते  थे

उफ़क से चला औ उरुज आसमाँ तक
ऐ सूरज   ठहर जा   जरा   चाहते थे

जईफ़ी में  सूरज   डूबा  जा   समंदर
शफ़क़  सांझ   हम  देखना  चाहते थे

इबादत  जियारत  सभी  छोड़कर हम
तेरी  दीद    सजदा   तेरा    चाहते थे

तुम्हारे   शहर से   गुजर   हो  रही थी
चले   आते   तुम   मिलना   चाहते थे

तन्हाई के   मरहम   क़मर  रात   तारे
हमारे थे   महरम     भला   चाहते थे

मुक़द्दस   लियाकत   सदाकत  वफाएं
फकत हम  मुहब्बत में  क्या  चाहते थे

No comments:

Post a Comment