Wednesday, 16 September 2020

क्या कहें बात कोई बात नही

2122 1122 22/112

क्या कहें बात कोई बात नही
खुश नुमा शह्र के हालात नही

मुब्तिला लोग यहां है सब ही
हादसा  कोई  नयी  बात नही

हर कदम वक्त   दगा   देता है
आदमी की तो ये औकात नही

अब के आए हैं परिंदे छत पे
नासमझ  जानते ये जात नही

आज मेंहदी लगी है हाथों में 
इस बहाने  से  मुलाकात  नही

रात है स्याह  रहे क्या हो गया 
चांद के  सामने  औकात नही

जिंदगी  रोज  उलझ पड़ती है
जीने खातिर  तो ये हैहात नही

आंखें हरदम है बरसती रहती
शहर में  यूँ कहीं बरसात नही

अब जरूरत के तलब जारी है
जिंदगी ये  कोई  सौगात नही

रात  गुजरी है  अमावस जैसे
इससे  काली  कोई  रात नही

रोते  हंसते भले ही गुजरी है 
इससे बेहतर तो कोई बात नही

Tuesday, 15 September 2020

कट गई यूँ ही जिन्दगी अपनी

2122 1212 22
कट  गई  यूँ  ही जिन्दगी अपनी
बस  नजर  आयी बेबसी अपनी 

हम  तरसते  रहे  हंसी  के  लिए 
मुँह  छुपाये  रही   खुशी  अपनी 

जिनसे  उम्मीद थी वफाओ की
उसने  की  खूब  दुश्मनी अपनी

वो      फरेबो  का    कारबारी है
मात  खाती  है  सादगी   अपनी

वो तो उल्फत को खेल कहते है 
हम  जिसे  समझे बंदगी अपनी

हाल  दिल  के  बयां है  चेहरे से
हमको  मालूम  है  कमी अपनी 

इक हंसी को था  जिंदगी  माना
सौप दी  उसको ही हंसी अपनी

ठहर गये थे जरा हम कि माजरा क्या है

1212 1122 1212 22 
ठहर  गये  थे   जरा  हम   कि  माजरा  क्या है 
क्यूँ   सहमे सहमे  से हैं लोग फिर हुआ क्या है

क्यूँ   ढूंढता   है  फिरे   आज  शहर  सारा  ही 
ऐ  जिंदगी  तुझे  जीने  का  तौर नया   क्या है

किसी  से   कोई  यहाँ   बोलता  नही  है  कुछ 
दिलों  के  दरमियाँ  देखो  ये  फासला  क्या है

यूँ   मानिए   तो   यहां   सारे   लोग   अपने हैं 
न  मानिएगा  तो    आपस  में  राब्ता   क्या है

यूँ  हमने  देखा  है  बारिश  में  भीगता  सुरज 
मगर  न  जानते  हैं  हम  कि  तर्जबा  क्या है

कि  सुब्ह  शाम  में   ही   जिंदगी  तमाम हुई 
हैं बेखबर कि ये जीवन का फलसफा क्या है

जमात   जात   मिले   शहर   में   मेरे  मौला
बताओ   आदमी   होने  का   रास्ता  क्या है

कितने अरमान हुए दफ्न रोज सीने में

2122 1122 1212 22 
कितने  अरमान   हुए  दफ्न   रोज  सीने में
यार  मुश्किल  है  बहुत जिंदा रहके जीने में

यूँ  उसूलों  के  जनाजे निकलते  हैं हर दिन 
खुश्बू  आती नही गैरत  की  अब  पसीने में

देखा साहिल पे  खड़े हो के हमने तुफां को 
हम  न  डूबे  कभी  मौजों के इस सफीने में

खैरियत है  यूँ तो  सब  मुल्क में मेरे साहब 
लुत्फ़  आता  है  सियादत को खून पीने मे

भुख से कैसे हो समझौता बेबसी का मियां 
दर्द  सीने  का   झलकता  है   आबबीने में 

देख  फेहरिस्त  तकाजों की सोचता है मन
पहली  तारीख  क्यूँ  है आती हर महीने में

या खुदा अब जरा हालात को बेहतर कर दे

2122 1122 1122 22 
या  खुदा  अब  जरा  हालात  को   बेहतर  कर दे
दूर  कर  खौफ़   दिलों  से   हंसी   मंजर    कर दे/1/

दिल  है  बेचैन     बहुत     रोज   तमाशा   करके
दोहरे  किरदार  से   फ़ारिग   मुझे   रहबर  कर दे/2/

मन  ये  उकता  सा  गया  है  बड़ा  रह कर घर में
फिर  से  माहौल  को  पहले  सा  ही  सुंदर कर दे/3/

रोज  इक  हादसा   बरपा  है  कहर  बन के  यहाँ 
अब  तो   ये   खौफ़ जदा   दौर   मुअत्तर   कर दे/4/

ना   दिखा   और   बिलखती   हुई   तस्वीर  कोई
छीन  ले   आंख  से    बीनाई  तू   पत्थर   कर दे/5/

हर  तरक्की   है   सुबकती   खड़ी   लाचार  यहां
अब तो फ़ाजिल से कहो साफ वो पिक्चर कर दे/6/

सोग  के  घर  में   बयानों   के  है   मातम   पसरे
ये  सियासत   कहीं  हालात   न   बदतर   कर दे/7/

नींद   आयेगी    भला   कैसे    उसे    सांझ  ढले
झूठ  के  मुंह  पे   कोई  स्याह  सी  चादर  कर दे/8/

फिर  अना  लेने  लगी  जोश  में  अंगड़ाई मियां
फिर सनक  कोई  न  रिश्तों को ही जर्जर कर दे/9/

दीद   को    तेरे    तरसती   है   निगाहें   कब से
अब  मुकम्मल   मेरी  ये  आरजू   परवर  कर दे/10/

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मंजर - दृश्य /फ़ारिग - मुक्त /मुअत्तर - खुशबूदार/
बीनाई - दृष्टि /फ़ाजिल - बहुत विद्वान /

अपनी ही साख से बिछड़ा हुआ पत्ता हूँ मैं

2122 1122 1122 22 
अपनी  ही  साख  से  बिछडा  हुआ पत्ता हूँ मै
दिल  जरा   पास  तो  आ  खूब  ही तन्हा हूँ मै

रोज ही  ख्वाब  को  बेचा  है  जरुरत  के लिए 
वक्त से   जूझता   बेबस  सा   वो  लम्हा  हूँ मै

अपने  मतलब की  सभी  बांट लेते  आपस में 
घर  पे  आता  है  जो  अखबार का  पन्ना हूँ मै

कल जो बुनियाद था घर का उसे भूले है सभी
राएगा   फालतू  सा   अब   कोई  रिश्ता  हूँ मै

शह्र में  सबने  तगाफूल है किया जिसको सदा
वो   सियासत  का   उछाला  गया   मुद्दा  हूँ मै

जैसे   पैबंद   लगा  हो  कोई    मंहगा  कपड़ा 
यूँ  समझता  हूँ  मै  खुद  को  कोई धोखा हूँ मै

जिंदगी   खुब   ही   शिद्दत  से  तपी  है अपनी 
कश्मकश  मे  ही जरा फिर भी तो उलझा हूँ मै

चुभती   जह्न   में   है   कहकहो  की  आवाजें 
दायरों  में   ही   बंधी   सोच  मे   फिरता  हूँ मै

मिलती नही कहीं भी खुशी है उधार में

221 2121 1221 212 

मिलती  नही   कहीं  भी   खुशी  है   उधार में
लाखों   मिलेंगे    आपको     बेबस   कतार में /1/

बर्बादियों  में   मेरे   तो   वो   भी   शरिक  था
गुजरी  है   उम्र   जिसके   फकत  इंतेजार  में/2/

कीमत  हमेशा   ख्वाब  की   ज्यादा  रही  मेरे
औकात    कब    रहे    हैं    मेरे   इख्तियार में/3/

गहरी  कही  है   जो  भी  कही   बात  यार  ने
रख्खा है  क्या  भला  कहो  नफरत में  रार में/4/

हर शख़्स उलझनों में ही उलझा हुआ है जब
फुर्सत है  कौन  जिसके  है  नफरत विचार में/5/

ताजिर  नफरतों  के  कुछ करते हैं मुझपे तंज
निखरा  हूँ   और   तप  के  मैं  यूँ  बार बार में/6/

रिश्तों  के  दरमियाँ    न  यूँ   दीवार   किजिए
है  लुत्फ़  इक  अलग   जरा  अपनों से हार में/7/

रख्खे  है   सर  पे   हाथ    मेरा  श्याम सांवरा
चलती  है     जिंदगी      इसी    दारोमदार  में/8/

सर छिपाने को ठिकाना ढूंढता है

2122 2122 2122
सर  छिपाने  को    ठिकाना      ढूंढता है
अब   परिंदा     आशियाना      ढूंढता है/1/

थक गया  दर दर भटक कर उम्र भर वो
अब  सुकूं  का     शामियाना    ढूंढता है/2/

धूप में  झुलसाता  है  वो  जिस्म अपना
ठोकरों  में       आबो दाना      ढूंढता है/3/

शाम  को    घर  लौटता  वो   है  पशेमां
फिर    सुनाने   को    बहाना    ढूंढता है/4/

मुतमईन   किरदार   मेरा  है   न  मुझसे
वो  नया   हर  दिन   फसाना   ढूंढता है/5/

कौन अब समझाए दिल को दे तसल्ली
दोस्त  ये   अब  तक   पुराना   ढूंढता है/6/

जो  गया  वो  लौट कर   आता  नही है
जान कर  भी  क्या  जमाना    ढूंढता है/7/

घरों ही घर मिले दीवार देखने के लिए

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घरों   ही   घर   मिले  दीवार  देखने  के लिए
कि  रह   गये   यही  संस्कार  देखने  के लिए/1/

बस एक धोखा ही खालिस खरा मिले है यहाँ 
मिलावटी  है   सभी   प्यार   देखने  के  लिए /2/

सुखनवरो  के  दिलों  को  खंगाला जब हमने
कुछ अधजले  मिले  अशआर देखने के लिए/3/

बला   का    दर्द    उढ़ेला    है   गज्ल गोई में
कि  कौन  कितना है गमख्वार देखने के लिए/4/

कभी  जो  जिंदगी  की  धूप  ने  सताया  मुझे
निकल  पड़ा   मैं  भी  खुद्दार  देखने  के लिए/5/

जमात   जात   है    पर  आदमी    नदारद  है
कहाँ  को  जाएं   ये   दिलदार  देखने के लिए/6/

बड़ा   अजीब   है   किस्सा   मेरी   तबाही का
न  आए   दोस्त  भी   बीमार  देखने  के  लिए/7/

तलाश  करती  हैं   उम्मीद   अपने  ही  टूकड़े
ठिठक  ठिठक  के  ही हर बार देखने के लिए/8/

आग पानी में मुहब्बत नही होने वाली

2122 1122 1122 22 
आग   पानी   में   मुहब्बत   नही   होने   वाली
ये   असंभव   सी   शरारत   नही   होने   वाली/1/

लाख  कर  ले  तू  उगाने  के  जतन शम्स यहां
सुब्ह  अब  इतनी  भी  उजलत नही होने वाली/2/

करके भयभीत  झुका सकते हो दुनिया लेकिन
इस  तरह   आपकी   इज्जत  नही  होने  वाली/3/

मामला   चाहे   वो   संगीन   रहे   कितना   भी
मुल्क  में    बंद   सियासत   नही   होने   वाली/4/

शाख  से  अपनी  बिछड़ कर कहाँ रह पाया वो
फूल  की  कल  से   अयादत  नही  होने  वाली/5/

ये  अंधेरा  रहे  कायम  चाहे  जब तक भी यहाँ
रात  से   कोई    शिकायत   नही   होने   वाली/6/

जिसको हर शख़्स में बस हिंदू मुसलमान दिखे
ऐसे  किरदार  की   खिदमत  नही  होने  वाली/7/

ख्वाहिशें  कर लो  मुकम्मल जो अधूरी हैं अभी
मौत  के   पास  तो   मोहलत  नही  होने  वाली/8/

सुधारों अब दशा भगवान तेरे दर्शन की ख्वाहिश है

1222 1222 1222 1222 
सुधारों   अब   दशा  भगवन   तेरे   दर्शन  की  ख्वाहिश है
पड़े  हैं    सुने   सब  मंदिर   तेरे   कीर्तन  की   ख्वाहिश है/1/

हुए    बेचैन   अब    घर   में   ही    रह  हम   बंदियों  जैसे
खुले   वातावरण  में  अब   जरा   विचरण की ख्वाहिश है/2/

भरा  है   मन    बहुत     संवेदना हिन    देख   लोगों   को
व्यथित मन में  बहुत अब  शोर की  क्रंदन की ख्वाहिश है/3/

हुई  क्यूँ   ऐसी  ये  दुनिया   भला  कारण है  क्या  इसका
इसी पर  अब मनन की  और गहन चिंतन की ख्वाहिश है/4/

जगत    जकड़ा    हुआ    अज्ञानता  के     घोर  अंधेरों में
उजालों  की  नयी  किरणों के  अब सृजन की ख्वाहिश है/5/

अजब  सी  इक  हवा  का  डर  है   पसरा  सबके हृदय में
सभी  खुशहाल  और   भयमुक्त हो  ये मन की ख्वाहिश है/6/

तेरे   चरणों   में   ही    दिन  रात    मेरे    जैसे   हों   गुजरे
तेरे  दर  पर  ही  निकले  दम   मेरे  जीवन की ख्वाहिश है/7/

मनाएँ   फिर   तेरा   उत्सव    बड़े    हर्ष और उल्लासों से
तू कर दे पहले सी दुनिया ये अब जन जन की ख्वाहिश है/8/

नही  हो    भेद    रत्ती   भी    किसी   के   वास्ते    मन में
दिखे  चहुंओर  बस  सौहार्द  इस  किंचन  की ख्वाहिश है/9/

खड़े  हैं   दर  पे  तेरे   बन के  याचक   हम  प्रभू  कब से
दरस  की   लालसा   ही   बस   प्रभू   निर्धन  ख्वाहिश है/10/

नही   राधा    नही   मीरा    सुदामा    ना    मैं    उद्धव हूँ
मै  अदना  हूँ   अकिंचन  हूँ  तेरे  चरनन  की  ख्वाहिश है/11/

भंवर  में   है  फंसी   नैया   लगा   दो   पार   हे  भगवन
बड़ा  बेबस   हुआ  है  आमजन  वंदन  की  ख्वाहिश है/12/

उठी  है     हूक  सी    मन  में     तुम्हारे   द्वार  आने की
लगी  जो  प्यास  दर्शन की बुझा नयनन की ख्वाहिश है/13/

लोग ईश्वर के नही धर्म के चाकर निकले

2122 1122 1122 22
लोग   ईश्वर   के नही  धर्म  के   चाकर  निकले 
जिसको  समझे  थे  बहुमूल्य वो पत्थर निकले/1/

अब तो रंगों के भी खुश्बू के भी तय है मजहब
आदमी माथे पे अब आदमी लिख कर निकले/2/

पाक  दामन  कहाँ  किरदार  मिले  अब  कोई 
इन  जुबां  वालों  से तो  बेजुबां बेहतर निकले/3/

फिर   तमन्नाएं   बहुत   रोयी हैं   मजबूरी  पर
फिर  से  त्योहार  सहमते  हुए डर डर निकले/4/

आदमीयत   भी    पशेमान   हुई   है   फिर से
रखके पहलू में ही कुछ यार जो खंजर निकले/5/

बस  यही  सोच   बना  देती  है   मुझको गूंगा
मेरी आवाज़ से  अब कौन सा  महशर निकले/6/

घर से निकलो तो जरूरत को छिपाके निकलो
उंगलियों  पर  ही  नचाने  तुम्हें  रहबर निकले /7/

आंसूओं के हिसाब कौन रखता है

आंसूओ   के   हिसाब   कौन   रखता है 
हाथ    सुखे "  गुलाब"   कौन  रखता हैं 

होंगी    मजबूरियाँ   कोई   यकीनन  ही 
वरना  सर  पे   अजाब  कौन  रखता है

अब  न  फबती  उदासियां  है चेहरे पर 
हर  घड़ी   यूँ   नकाब   कौन  रखता है

ढुंढ  ही  लेती  हैं   ये   मुश्किले  हमको 
चाह   करके    जनाब   कौन  रखता है

अपनी ख्वाहिश है धूप बस ये मुट्ठी भर 
अपने  घर   आफताब  कौन  रखता है

बरसी  है   बेहिसाब  ही  तसल्ली  अब
इतने   झुठे    हुबाब    कौन   रखता है

शिकवे    बेचैनियां   ये  आरजू उम्मीद 
साथ   इतने   सराब   कौन    रखता है

मुस्कुराहट    सुकून   चैन   के   किस्से
दर्द  के   इतने  ख्वाब   कौन  रखता है

मंजर ही हादसों का अजीबो गरीब था

221 2121 1221 212
मन्जर  ही  हादसे  का  अजीबो गरीब  था 
निकला अदू भी वो ही जो सबसे करीब था

सौदा  न हो सका  कभी हमसे ये इश्क का
मंहगी थी उल्फतें ये दिल अपना गरीब था

मजबूरियों  बेचैनियों   का   नाम   जिंदगी 
खामोश सा निबाह भी  कितना अजीब था

सस्ती  जनाब जीस्त है  मंहगी है ख्वाहिशें 
अक्सर ये खाली जेब ही अपना नसीब था

ढुंढा  नही मिला कहीं  हमको  तो  आदमी
खोया  हुआ सा  जात  में  मेरा  हबीब  था

अंधे  सुझाते   राह है   बहरों  की   भीड़ में 
गुंगो  के मुंह से गीत  ये कितना अजीब था

दर्द पर आंसूओं के पहरे है

2122 1212 22 
दर्द  पर    आंसूओं   के    पहरे हैं 
आ  के  ये   कोर  पर  ही  ठहरे हैं 

चोट  चाहे   कहीं  भी  हो  लेकिन
रब्त   दिल  से   बहुत  ही  गहरे हैं 

अब सदाएं भी दे तो क्या किसको
सब   यहाँ  पर   तो   गुंगे  बहरे हैं 

कौन  से  ख्वाब  छोड़ दूँ  मैं भला
ख्वाब   सारे     बहुत    सुनहरे  हैं

जो   गुजारी   है    जिंदगी   हमने
अच्छे  अच्छे   भी   देख  सिहरे हैं 

जितने किरदार आजकल है मिले
सारे    मायूस   से    ही    चेहरे हैं

दफ्न  हर  राज  कर लिए लेकिन
दाग अब  की   कफन  पे  गहरे हैं

खुद को शायर तो कह नही सकते
बस  ये  कुछ   शे'र  से  ककहरे है

क्या है अच्छा बुरा क्या है मन के लिए

212 212 212 212 
क्या है अच्छा बुरा क्या है मन के लिए
है  कहाँ  वक्त  इतना  चयन  के   लिए

उम्र  गुजरी  है   जद्दोजहद  में  ही  बस
आदमी  जी  रहा  है  तो  धन  के  लिए

मौत का खौफ़ भी क्या अजब खौफ़ है
बस  हवा  ही  बहुत  है शिकन के लिए

कल जो कहते थे फुर्सत नही मरने की
जीने  खातिर  हैं  बैठे  भजन  के  लिए

काफियो  में  ही   उलझे  रहे   उम्र भर
कुछ  सलीका  न आया सुखन के लिए

क्या जरूरत है  नश्तर चुभाने की  अब
तल्ख  लहजा  बहुत  है  चुभन के लिए

इन दिनों  कह  रहे हैं  वो  अच्छा  बहुत
कह  रहे हैं   मगर  बस  कहन  के लिए

फर्क  कथनी  में  करनी  में  उनके मिले
कब  कहा  है   उन्होंने   मनन  के  लिए

दब   गयी   फाईलों   में    सभी   राहतें  
रह  गये   आंकड़े   आमजन   के  लिए

लाख दिल में शिकायत रखो  तुम मगर
कुछ  मुहब्बत  भी  तो हो वतन के लिए

मुल्क   की  आन  में  गर  जरूरत  पड़े
खूं  है  हाजिर  मेरा   आचमन  के लिए

बैठकर  एसी  कमरों  में लिखते  गजल
अब सुखनवर मिले बस सुखन के लिए

साफ़ मन चाहिए साफ मन के लिए

212 212 212 212 
साफ   मन  चाहिए  साफ मन के लिए
पालिए   यूँ  न   नफरत  पतन के लिए

फूल  खूशबू से  गुलशन ये गुलजार हो
है  महकना   जरूरी   चमन   के  लिए

क्या  हुआ   गर   परेशान   हैं  जिंदगी
कुछ  नया  तो  नही  आदतन  के लिए

हसरतें   उम्र  भर   ही  रहे   आंच  पर
है ये मुश्किल बहुत  आमजन के लिए

कहने  सुनने  की  बस  बात होने लगी 
कुछ कहा ना किसी ने भी मन के लिए

हक बयानी  की  बातें  बहुत  हो  चुकी
क्या किया कुछ कहो तो वतन के लिए

मुल्क को इस समय  इसकी दरकार है
ये   लहू   मेरा  लो  आचमन  के  लिए

उम्र  भर    खुश्बुओं  में   नहाता   रहा
तू   महकते  हुए   एक   तन  के  लिए

रूह  फिर  भी  महकने  न  पायी तेरी
ये  जरूरी  नही  था   बदन   के  लिए

मसअलो  के  भी  चेहरे  बदलने  लगे
अब  कहाँ  शोर  है  आमजन के लिए

झंडे बैनर को रख लो जतन कर जरा
काम  आयेंगे  ये  ही  कफ़न  के लिए

भूख    रोटी   के    मुद्दे    पुराने   हुए
अब  नये  लाओ  नारे सदन  के लिए

चांद पर तब्सिरा नही आता

2122 1212 22 
चांद   पर    तब्सिरा    नही    आता
हां  मुझे   कुछ   जरा   नही    आता

दिल  ये  कमबख्त  मिल गया तुझसे
रास    अब     दुसरा    नही    आता 

कुछ  यकीनन  कमी  है  मुझमें   जो 
लौट  कर   फिर   गया   नही  आता

उम्र    से    पहले    उम्र    देखी    है
आप  कहते  हो   क्या   नही  आता

वक्त   गुजरा  है  उसको  गुजरे  हुए 
अब    हमे    बचपना   नही   आता

लोग   अदबी   की    बात   करते हैं
पर   सलीका    जरा    नही   आता

शोर  करती  है  खामुशी  भी   बहुत
क्या  है   गर   बोलना   नही  आता

प्यार   तुझपे    तो   खूब   आता  है 
बस   मुझे    चोचला   नही    आता

क्या   बिछड़ना   जरूरी   था   तेरा
क्या   तुझे    रूठना    नही   आता

दिल से निस्बत है हर नजरिया मेरा
हाँ    मुझे    सोचना    नही   आता

हर  कदम   पर  ही   चोट  खाएं हैं
पर   कोई  भी   नशा   नही  आता

अब  तो   आते  हैं   फैसले   सीधे 
अब  कोई   मशवरा   नही   आता

चाहता  था  कि   हादसा  हो  कोई
तुझसे  मिल कर  नया  नही  आता

यूँ भी उसने बरगलाया देर तक

2122 2122 212 
यूँ  भी  उसने   बरगलाया   देर तक
आने  की  कहकर न आया देर तक

उनकी खातिर तो ये ठहरी मसखरी
इस  अदा  ने  दिल दुखाया देर तक 

कुछ  मुरादों  के  मुकम्मल  के लिए 
दर ब दर  मैं  सर  झुकाया  देर तक

की  बड़ी शिद्दत से  कोशिश बारहा 
पर  न  उसको  भूल  पाया देर तक

साथ  सुनते  थे  कभी जो गीत हम 
अब  मै  तन्हा  गुनगुनाया  देर तक

बस   जरा  सी   देर   आने  में  हुई
मां  ने  घर  में  जी  उठाया देर तक

कुछ हुनर  सिखला  दिये थे बापू ने
जिंदगी  में   काम   आया   देर तक

दर्द   को  भी  दर्द  जब  होने  लगा
देख  कर   मैं   मुस्कुराया   देर तक

झूम कर बरसे हैं बादल आज फिर 
छप्परों   ने   घर   बचाया   देर तक

एक  है   ओढ़ू  बिछाऊं  क्या  करूँ
भीगे   चादर   ने   रूलाया  देर तक

कुछ    तमन्ना   आरजू    उम्मीद में 
घिर  के  दिल ये छटपटाया देर तक

सिमटी हुई सहमी सी सकुचाई हुई गजलें

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सिमटी   हुई   सहमी   सी   सकुचाई    हुई   गजलें
अहसास    में   भीगी   सी    लरजाई   हुई   गजलें

अब   आज   नही  मिलती   लरजाई   हुई   गजलें
अब   आने   लगी   है   बस   मुरझाई   हुई  गजलें

सौ  तर्ह  की  ही  उलझन  जब  जह्न में  चलती हो
फिर    कैसे  कलम   लिक्खे   शरमाई   हुई गजलें

ढूंढे   है    जहां    मेरी    गजलों   में   तुझे  हरदम
गजलें    न    हुई    जैसे     परछाई    हुई   गजलें

दुत्कार    लताड़ों    पर    भी    साथ   नही   छोड़े
इस    तर्ह    मेरी    जानां     शैदाई    हुई    गजलें

है   शोर  शराबा   बस   कुछ  और  भला  है  क्या
इस   दौर   में   फूहड़ पन   से   गायी   हुई  गजलें

देखा   है    बहुत    मंचों   पर   नाम   दराजों   को
पढ़ते    हुए    चुपके   से    सरकाई   हुई    गजलें

हर  लफ्ज़  को  शिद्दत  से   अहसास  ओढ़ाया  है
देखा  ही   किसी  ने   कब   ठुकराई   हुई   गजलें

कथनी   और   करनी  में  जब  फर्क  मिला  बेहद
आयीं  हैं   कुछ  ऐसी  भी    भरमाई   हुई   गजलें

शिद्दत  से   निचोड़ा  है  दिल  अपना  सुखनवर ने
पर   रास   न   आयी   फिर   बिसराई  हुई  गजलें

सब  कुछ   बदल  करके   रख  देंगीं  घड़ी  भर में
इस  तौर  से    आयीं   है    गुस्साई    हुई    गजलें

अब दिल की नही कहती अब दिल से नही कहती
दरबारी    हुई    गजलें    पजीराई     हुई    गजलें

तेरी पनाह में मेरे ये जिस्मों जान रहे

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तेरी   पनाह  में   मेरे   ये  जिस्मों  जान  रहे
न  हो  जमीन   या   चाहे  न  आसमान  रहे

न  इल्तिजा  न  गुजारिश  है  कोई और मेरी
बस  एक  तू  ही  खयालों में शब बिहान रहे

जुदा  न  होना  कभी   चाहे  जो  सजा देना
सफर  के  वक्त  तू है  बस  ये इत्मीनान रहे

तू   मेरे    पास    रहे    इसलिए    जरूरी है 
तमाम   उम्र  ही    चलता  ये  इम्तिहान  रहे

कुछ और बात भले हो न हो किसी से कोई
मेरी  जुबां  पे   तेरा   हर  घड़ी  बखान  रहे

हर  एक   कतरा   तेरा  नाम ही पुकारे बस 
अगरचे    जिस्म    सरापा    लहूलुहान  रहे

तमन्ना आरजू उम्मीद धोखा चीज क्या है जी

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तमन्ना   आरजू   उम्मीद   धोखा  चीज  क्या  है जी
गुमां  जाता  रहा  मेरा  कि   रिश्ता चीज  क्या है जी/1/

जरूरत  ने  भगाया इस कदर  है  उम्र  भर  मुझको
भुला  बैठा  तसल्ली क्या है सपना चीज क्या है जी/2/

मै  बस  जद्दोजहद में  कश्मकश में  ही  रहा उलझा
कभी भी जान  न पाया  कि  जीना चीज क्या है जी/3/

जुबां कुछ  और दिल में और  दोहरेपन जो जीता है
भला  कैसे  वो  बतलाए नजरिया  चीज क्या है जी/4/

मेरी अम्मा  मेरी अम्मा जो कह कर कल झगड़ते थे
बड़े   होकर  वही  कहते हैं  अम्मा चीज क्या है जी/5/

कहीं  आंधी  कहीं  बारिश  कहीं  पर हादसा बरपा
हजारों   राह   महशर  के  करोना चीज क्या है जी/6/

संभलता  एक  ही  हमसे  नही  किरदार  है अपना
तुम्हारे  वास्ते  दस  बीस  होना  चीज  क्या  है  जी/7/

मचा लो  शोर भी  कितना  चला लो प्रोपेगेंडा कुछ
खबर है मुल्क को खालिस बनना चीज क्या है जी/8/

जो  अपनी  ही  कहानी  में  रहा गुमनाम है हरदम
भला  कैसे  बतायेगा  कि किस्सा चीज क्या है जी/9/

बहुत  कुछ  जान  पाने में रहा नाकाम हूँ अब तक
पिता  होते तो बतलाते  ये दुनिया चीज क्या है जी/10/

बस इतना बहुत हौसला कर लिखा है

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बस इतना बहुत   हौसला  कर   लिखा है
हर इक जा पे उनको  सितमगर लिखा है/1/

शिकायत अब इस बात पर भी है उनको 
कि हमने  तआर्रूफ  कमतर    लिखा है/2/

कहीं   भूख   लाचारियाँ   बस   लिखीं है
जरूरत  से  ज्यादा   कहीं  पर  लिखा है/3/

तकाजो   की  भट्टी    सुलगते  है  अरमां 
भला   किसने   ऐसा   मुकद्दर   लिखा है/4/

फकत  चार  दीवारे   और   बामो  दर है
न  खुशियां  न  आंसू  मयस्सर  लिखा है/5/

नदारद    सभी    रब्त     जज्बात   सारे
जरूरत   ने  ही  बस  उसे  घर  लिखा है/6/

जिधर   देखिए    बस    दरिंदे    दिखे हैं
घरों  घर   यहां   आदमी  भर   लिखा है/7/

चला  था  जहाँ   जीतने   सरफिरा  इक
किताबों  में  उसको   सिकंदर  लिखा है/8/

न  मरती   यहां  पर   है   उम्मीद   कोई
तभी  इस  जगत  को  चराचर  लिखा है/9/

जरा   सख्त   करने    लगे   फैसले  वो
तो अखबार ने  उनको हिटलर लिखा है/10/

खुशी हो कि गम  भर ही आती है आंखे
तभी    शायरों   ने    समंदर    लिखा है/11/

कोई  भी  न  इतना   मुकम्मल  हुआ है
लिखा जिसने जो भी नया पर लिखा है/12/

जरा सा  भरम  भी तो  रहने दो दिल में
कुछ अच्छा सा हमने  यहाँ पर लिखा है/13/

हुए मजबूर क्या क्या देखने को

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हुए  मजबूर   क्या  क्या  देखने  को
कभी  तू  भी  चला  आ  देखने  को/1/

तमाशा  इक  नया   हर  रोज  ही  है 
तरसती  आंखे   अच्छा   देखने  को/2/

जमीं  तरसी है  बारिश के लिए  ज्यूँ
यूँ   तरसे   हम   उजाला  देखने को/3/

हैं चिपकी खिड़कियों पर ही निगाहें 
भला  सा  कुछ   नजारा  देखने को/4/

जिधर भी  देखिये  महशर  है बरपा
यही  क्या  रह  गया  था  देखने को/5/

बड़ा  होना  बहुत  मुश्किल है प्यारे
पड़े   है   घर   समूचा   देखने   को/6/

तमन्ना    आरजू    उम्मीद    धोखा
है  क्या  इसके  अलावा  देखने को/7/

वही   दो   चार   जुमले    हैं  पुराने
मिला कुछ भी नया क्या देखने को/8/

बड़ी  जद्दोजहद  के  बाद   जाकर 
मिला  है  आज  मौका  देखने  को/9/

जो  पेश आती  है तस्वीरें जहाँ की
नही  चाहा  था   ऐसा   देखने  को/10/

बदलते  दौर  बदली  है   सियासत
मिले क्या क्या नजरिया देखने को/11/

हमल में ठीक था नवजात बनकर
बशर आया क्यूँ  दुनिया देखने को/12/

नही मिलता यहां पर  आदमी बस
दरो  दर  है   फरिश्ता   देखने को/13/

रवायत  है   चलन   दस्तूर   है  ये
नफस  बेबस  खुदाया  देखने  को/14/

सुकून चैन का कब से है इंतजार मुझे

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सुकून   चैन   का   कब   से   है  इंतजार  मुझे
भटक   रहा  हूँ   कहीं   तो   मिले  करार  मुझे/1/

कदम  कदम  पे  ही  मिलती  रही है  हार मुझे
हर  एक   मौज   खुशी  है  मिली  उधार  मुझे/2/

तमाम   उम्र   ही    जद्दोजहद    में   गुजरी  है
खुलूसे  दिल  से   मुकद्दर   कभी  पुकार  मुझे/3/

कभी  तो  मुझको  भी  मौका  दे मुस्कुराने का
सता   रहे  हैं   यूँ   दिन  रात  गम  हजार मुझे/4/

तरीके   तौर    रवायत    निभाने   के   खातिर
तलाश  करते  हैं   शिद्दत  से   रोज  यार  मुझे/5/

जले   है    हाथ   मेरे    तो    चरागां   करने में
हो   अपने  आप   में  भी   कैसे  एतबार  मुझे/6/

रजा   बगैर   भी   आते   हैं   वो    खयालो में 
नही  है  दिल पे अब इतना भी इख्तियार मुझे/7/

पकड़ के उंगली मेरी चल रहे थे जो कल तक
समझ  रहे  हैं  वो  बच्चे  ही  अब  गवांर मुझे/8/

कदम  कदम  पे   नजर  आयी  भूख  बेकारी
दिखाई  दी  न   कहीं  पर   कभी  बहार  मुझे/9/

मेरी  कलम  से  निकलते हैं रंजो गम ही सदा 
समझते   जहन  जदा   लोग  है  बिमार  मुझे/10/

लिखूं क्या उसके लिए जिसकी मैं लिखावट हूँ 
हुआ है  खुश  वो पिता  हर समय संवार मुझे/11/

जुगनूओ से ही अंधेरों को मिटाने वाले

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जुगनूओ से ही अंधेरों  को  मिटाने  वाले
है  कहां  आज  भला  बात  बनाने वाले

क्या  भला  साथ  निभाएंगे भुलाने वाले
राह में  छोड़ के  जाएंगे  वो  जाने वाले

लद गए दिन वो वफाओ के निभाने वाले
अब कहाँ मिलते हैं वो शख्स पुराने वाले

रात  भर  राह में  बैठे  थे  चरागां  करके
पर  खबर ही  न लगी कौन थे आने वाले

ये  हवाओं  में  अभी  गर्द नजर  आती है
क्या  शहर  छोड़  चुके  शोर  मचाने वाले

इक दिया  रोज  मुंडेरों पे  जला करता था
जाने  क्या  बल्ब से घर अपने सजाने वाले

ईंट  गारो  से  भला  कौन  यहां  मिलता है
घर  में  रिश्ते  है  जरा  खास  पुराने  वाले

सो गए सुनते ही फटकार फकत गुरबत के
तिफ्ल  ने   देखे   नही  लाड़ लड़ाने  वाले

अब  परिंदे  भी   वहां  आने  से कतराते हैं
ताक  में   रहते  सदा   जाल बिछाने  वाले

शाख पे चांद वो अटका जो जरा पल पर को
थाम  कर   बैठ  गए  दिल  ये  जमाने  वाले

रात  बैठी    है   इंतजार   सहर   का  करते
रह  गए   जाने  कहाँ   रात  को  लाने  वाले

जो  यहां   बोते   मुहब्बत   थे  उगाते  खुश्बू
अब  नजर  आते  न  वो   अम्न  जगाने वाले

रूठ  तो  जाए  मगर  आज  ये  डर लगता है
अब  नही  रहते   यहां  कल  से  मनाने  वाले

अब के  त्योहार  में  बच्चों  को  नये  कपडे़ दूं
सोंचते   रह     ये  गये    रोज   कमाने  वाले

जगमगाते    हुए    दीयों से    शहर   रौशन है
देख  पाए    न    तले     दीप     जलाने वाले

कैसे   मै   भेज दूँ   दुख्तर को   यूं  तन्हा तन्हा 
चार  कांधे   भी   न    डोली  के   उठाने  वाले

आस   रहती  है   जईफी  मे   जरा   मीठे  की
बोल   कड़वे  ही मिले   दिल को   दुखाने  वाले

खूब   मायूस  से   दिखते  हैं   यहाँ   सब  चेहरे
है   नदारद   ये   शहर   से   ही   हंसाने   वाले

तमन्ना आरजू उम्मीद थे रुतबा थे बाबूजी

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तमन्ना    आरजू    उम्मीद    थे    रुतबा   थे   बाबूजी
मेरी  हिम्मत   मेरी  ताकत   मेरा  जज्बा  थे   बाबूजी/1/

मेरे  साहस  थे   मेरे   हौसला  थे   डर   गुजारिश   थे
मेरे   रहबर   मेरे   प्रेरक   मेरी   दुनिया   थे   बाबूजी/2/

सफलता  की   कहानी  के   रहे   आधार   वो  हरदम
मेरी   नाकामियों  पर   इक  बड़ा   परदा  थे  बाबूजी/3/

बड़े  बरगद  के  मानिंद  सायबानी  का  रहा अहसास
निगहबानी  का   जीता-जागता   किस्सा  थे  बाबूजी/4/

वो  इक  बुनियाद  थे   मजबूत   थामे  थे  समूचा  घर
जरूरत के  मुताबिक  सबका  ही  हिस्सा  थे  बाबूजी/5/

विरासत में  मिली है  हमको तो  तहजीब की  तालीम
सलीका  के   अदब  के   पाठशाला  सा  थे   बाबूजी/6/

भले  ही  आज   जूते  मैं   पहन  लेता  हूँ   उनके  पर
मेरे  कद  से   तजरबे  में   बहुत   ज्यादा  थे   बाबूजी/7/

कभी  कोई    कमी   महसूस    न   होने   वो   देते  थे
हर इक ख्वाहिश मुकम्मल होने के जरिया थे बाबूजी/8/

फटी   बनियान   की    हर  छेद   देती   है   गवाही ये
कि  अपने  वास्ते  किस  हद से  लापरवा  थे  बाबूजी/9/

कमाई    ओढ़    रख्खी  है    मेरे   दिन रात   खर्चों ने
मगर  इक  संतुलित जीवन का अफसाना थे बाबूजी/10/

कभी घर तो  कभी बच्चों के  खातिर रोज ही खुद का
किया    सौदा    सरे बाजार   जब   जिंदा  थे बाबूजी/11/

कहकहों की राहों में सिसकियाँ दबी सी है

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कहकहों  की  राहों में  सिसकियाँ दबी सी है 
रिश्तों  के  निबाहों में    तल्खियां  दबी सी है/1/

गुजरे  इन  हयातों  के   तरजबे  नये हर दिन 
वक्त  के  ये  लम्हों  में  शोखियां  दबी  सी है/2/

शोर  दिल के  बाहर तो खूब सुनते हैं लेकिन 
क्यूँ  दिलों के  भीतर  खामोशियां दबी सी है/3/

बदचलन  सी  आवारा  नींदें शब भटकती है 
मन में  ख्वाब  के  कुछ  बेचैनियां दबी सी है/4/

फिर लिबास तहजीबी ओढ़े फिरते हैं दर दर 
अपने दिल में अब तक नादानियां दबी सी है/5/

दर्द   दे  के    पुछे  है   हाल  चाल   कैसा  है 
हर  सवाल पर  उनके  फब्तियां  दबी  सी है/6/

गर्द झाड़ कर दिल के  शिकवे सब मिटाने है
फुरसतों  पे  कितनी  मजबूरियां  दबी  सी है/7/

वक्त  से   छिपा  लम्हें   पोटली  में   रख्खे है 
हर  ही  लम्हों  में  ही   दुश्वारियां  दबी  सी है/8/

मुल्क के बिखरे से हालात ने सोने न दिया

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मुल्क  के  बिखरे से  हालात  ने  सोने  न  दिया 
भीगे  भीगे   हुए   जज्बात  ने   सोने   न  दिया /1/

क्यूँ फिजाओं मे फकत जहर सा घोले हो मियां 
राएगा   बेजा    बयानात    ने   सोने   न  दिया /2/

आशना   कौन   भला   है   यहाँ   इक  दुसरे से 
फासले  धर  के  मुलाकात  ने    सोने  न  दिया /3/

है  कहीं  रोशनी  जगमग  तो  अंधेरा  है   कहीं 
ऐसे   चुभते   से   सवालात  ने   सोने  न  दिया /4/

राह  तकते  है  सभी  मुल्क  में  बरखा के लिए 
हमको  आंखो  की  ये  बरसात ने सोने न दिया/5/

कोई  रिश्तो  ने   मुरव्वत   न  कभी  की  हमसे
हमको  ये  तौर   बिना  बात  ने  सोने  न  दिया /6/

उलझी  उलझी  सी  मुकद्दर  की  लकीरें भी है 
कुछ  नसीबों  के   करामात  ने  सोने  न  दिया/7/

देख    हैरान     परेशान      हैं    बाजारो    को 
इक  कदर   मंहगे  से   सौगात   सोने  न  दिया /8/

जितने  पास  आते  हैं  हम  दूर  चली  जाती है 
ऐसी  खुशियां  भरी   खैरात  ने  सोने  न  दिया/9/

रूह से चल जिस्म तक होती बगावत देखिए

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रूह से  चल  जिस्म तक  होती  बगावत देखिये 
दिल से दिल के दरमियाँ  कैसी अदावत देखिये /1/

किस  कदर  मायूस  तेरे   शहर  से  हम लौटे है
तेरे  दर  तुझसे  न  मिलने की  मलालत देखिये/2/

तेरी रूसवाई का अहसास अश्क को भी हो रहा
सुख  गई  आंखे ही  रिश्तों की नजाकत देखिये/3/

आशनाई    मे   तेरी   मशहूर   इतने   हम   हुए
और खबर तुझको नही हद ही जलालत देखिये/4/

जब  मिले  खामोश  गुजरे  हैं  वो  कतराते हुए 
हाल   फिर  पूछे  रकीबो  से   अदायत  देखिये/5/

क्या खबर  दैरो हरम  उसको ही जाना है खुदा
आस्ताने   भूले   सारे   क्या   अकीदत  देखिये/6/

है  सजी  महफिल  वहां पर  और सन्नाटा यहां 
भेज  न्यौता भी  रहे  हैं  क्या  शराफ़त  देखिये/7/

रूठते नही है अब कि कौन फिर मनाएगा

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रुठते  नही  है  अब   कि   कौन  फिर  मनायेगा 
पूछने   उदासियों  की   कौन   फिर  से  आयेगा /1/

बांध  रख्खा  है  घरों  से   कुछ  रुहानी  रब्त  ने
वरना  दर  दिवार  से  ही  कौन  मिलने  जायेगा /2/

बैठा    दर्द    पहलू   में   ही  जैसे   कोई  यार है
इतनी   कुर्बतें   भला   यूँ  कौन  अब  निभायेगा/3/

यूँ  नुमाइशें  तो  हम  न  करते  अपने जख्म की
रिसते  जख्म  पर  दवा  भी कौन अब लगायेगा/4/

है   कोई  तो   रात  और  भी  ये  रात  बाद इक
चांद  से  भला   ये  बात   कौन  अब   बतायेगा /5/

जब  लगा  कि  जिंदगी को पढ लिया पुरी तरह 
खुद  ही  खुद  पे  हंस पड़े  यूँ कौन बरगलाएगा/6/

पर कतर के धर दिये हैं ख्वाहिशों के हमने अब
पर"   बगैर    ये   परिंदे   कौन   अब  उडायेगा/7/

जीने का सीधा सरल रस्ता नही है मांगते

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जीने  का   सीधा  सरल   रस्ता  नही  है  मांगते
कोई  वो  आफात  भी   सस्ता  नही  है   मांगते

कश्मकश  जद्दोजहद  में   ही  गुजरती  जिंदगी 
पर  कभी   अखबार  में    चर्चा  नही  है  मांगते

रूखी-सूखी   ही  सही   दो  जून की  रोटी मिले 
रब  से   फरमाईश  कोई   बेजा  नही  है मांगते

खुशियाँ उस आंगन बरसती  रहती है हर मर्तबा 
बेटी  की  कीमत  पे  जो   बेटा  नही  है  मांगते

फिर  गुजरता  है  तसल्ली  से  बुढ़ापा  बाप का 
बेटे   गर  आपस  में  लड़  हिस्सा नही है मांगते

रिश्तों की बुनियाद में गर हो मुहब्बत और यकीं 
वो   कभी   भूले  से भी  धोखा  नही  है  मांगते

देख   डाले    जिंदगी  में  हमने  सारे  धूप छांव 
अब   मुकद्दर  से  कोई    मौका  नहीं है   मांगते

एक अहसास कभी दिल से मिटाया न गया

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एक  अहसास  कभी  दिल से मिटाया न गया
जाने  वो  कौन  था  अपना या पराया न गया/1/

वो  खयालो  मे  तो  आते  ही  रहे हैं अक्सर
पर हकीकत में तो उनसे कभी आया न गया/2/

दिल में क्या उनके है ये तो वो ही जानेंगे मगर 
हमसे वो शख्स कभी  दिल से भुलाया न गया/3/

उम्र भर  जिन पे  की  है जां  ये निछावर हमने
हाले-दिल  उनको  कभी हमसे बताया न गया/4/

हम  कभी  रूबरू  न हो ये रजा उनकी ही थी
फिर  भी  बाजार में चेहरा क्यूँ छुपाया न गया/5/

मेरी  बर्बादियों  के  चर्चे  वो  करता  है  बहुत 
मुझसे  तो  उनका  कोई  राज सुनाया न गया/6/

जो  थी  नाराजगी  ना  मौत  से  भी  दूर  हुई
कब्र  पर  आ के ही दो  फुल  चढाया न गया/7/

सुखे फूल के जैसे रिश्ते खुश्बू से मिलवाएं कौन

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सुखे  फुल  के   जैसे  रिश्ते   खुशबू  से  मिलवाएं  कौन
कुछ  अहसास   सिरहाने  रख्खे  नींदो  में  सुलाए  कौन

तिनका  पत्ता   खुशबू  सब  ही   आंधियों  में   उड जाते 
दर्द   दिलो  मे  पसरा  है  जो  आंधी  तक  ले जाए कौन

दिन   ढलते  ही   आवारा   बन   मारा  मारा    फिरता है
काली  चादर   ओढ़  के  सोया   सूरज  को  जगाये कौन

दु पहरी  में    साया  अपना   कद  से   ऊंचा   हो   जाता 
बाद  दु पहरी  साये  को  फिर खुद से ही  मिलवाए कौन

धुंए  में  हरदम  जलती  है  मां  की  आंखें  सच  ये  नहीं
बेटों  की  तकलीफ  में  भी   बहते  हैं अश्क बताये कौन

बाप ने चिपका ली चेहरे पर फिर से उधार की खुशियां है 
माँ  के  पल्लू   में  छिप  रोती   बेटी  को  समझाये  कौन

क्या बताएँ क्या हुआ है अब खुशी को

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क्या  बताएँ  क्या हुआ है  अब खुशी को 
कैसे  दें  इल्ज़ाम  कुछ  भी  इस सदी को/1/

गल्तियां   कुछ तो   यकीनन    ही  हुई है 
जो   भुगतना   पड़   रहा  है  आदमी को/2/

गर  बनाना  है   सहल    जीने  का  रस्ता 
गौर  करना   छोड़  दो  तुम  बतकही को/3/

क्या  हुआ   हालात   बिगड़े  हैं   जरा तो
अहमियत  मत दो जरा भी खुदखुशी को/4/

प्यास समंदर को भी लग सकती कभी है
क्या खयाल आया कभी भी ये किसी को/5/

वक्त  कुरियर  से  कहो  तो  भेज  दें  हम
अब  बहाने  मत  करो   तुम  वापसी  को/6/

कर  लिया  बर्बाद  हिस्सा  उम्र  का  इक
और  कितना  दें  तवज्जो  अजनबी  को/7/

चांद  है   मिट्टी  का  इक   धेला   सरीखा
ये  मगर   कहना  नही   तुम  चांदनी  को/8/

हमने  माना था  अहम दिल की लगी को
अहमियत  तुमने  मगर  दी  दिल्लगी को/9/

लग   रहा   उनींदी    सा   सूरज    सवेरे
रात भर  ताका  किये  हैं  क्या किसी को/10/

रात   सिरहाने    खड़े   थे   ख्वाब   सारे
पर इजाजत  थी  न  आने की किसी को/11/

अब  नही  आते   कहीं  छत  पर   परिंदे
दाने  भी  रखते  नही   देखा  किसी  को/12/

जिंदगी  है     बे बहर    बे काफिया   सी
ना मुकम्मल  सा  मिला मिसरा खुदी को/13/

बात होती है अब कहां कोई

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बात  होती  है  अब कहां कोई
कुछ भी करता नही बयां कोई

सब  लिये फिरते आग सीने मे
इश्क  पाले था कल जहां कोई

हर  कदम  झूठे और फरेबी हैं 
ढुंढे  सच  के  कहां मकाँ कोई 

ख्वाब  पलते हैं रोज आंखो मे
पर  न ताबीर की है दुकां कोई 

बे वजह   है  तलाश  दैर हरम 
रब  मिले  ना मिले निशां कोई 

जाने क्या बेबसी थी उनकी भी
यूँ  न   होता  है   पशेमां   कोई

सवालों से पहले जवाब आ गया

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सवालों   से   पहले   जवाब  आ  गया
हर  इक   चेहरे  पर   नकाब  आ  गया

गुनाहों   की   ताकीद    से   पहले   ही
गुनाहों   का    लब्बोलुआब  आ   गया

गया  था   जो  रोटी  कमाने  को  कल
फकत  भूख  लेकर   जनाब आ  गया

नदारद  है   आंखों   से    नींदें    कहीं
बिचारा सा बन कर के ख्वाब आ गया

बड़ा     बदनसीबी     भरा     दौर   है
हर  उम्मीद  पर  ही  सराब  आ  गया

मशक्कत  मुसलसल  ही  चलती रही
तभी  कुछ  नया सा खिताब आ गया

अभी  गम  सुखाने  को  डाले  ही  थे
कहाँ  से  भटकता  सिहाब  आ  गया

कही  पर   करोना   कहीं   जलजला
कही  राह  चलते   अजाब  आ  गया

जो कुदरत पे अब तक  बसर ने किये
वो  सारे  सितम का  हिसाब आ गया

लहू   में   सनी    आ   रही    रोटियाँ
गरीबी  का  देखो   शबाब  आ   गया

न  थी   बेहिसी   पहले  इतनी  कभी
भला  वक्त अब  क्यूँ खराब आ गया

तरसते थे जिस वक्त को कल तलक
वो फुर्सत  समय  बे हिसाब आ गया

बड़ा  ही  अजब  दौर   आया  मियां
सभी  को  मजा  लाजवाब आ गया

तमन्ना आरजू उम्मीद कुछ जाया नही जाता

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तमन्ना  आरजू  उम्मीद  कुछ   जाया   नही   जाता
मुहब्बत  गर हो शिद्दत से तो  झुठलाया नही जाता

खयालो  में  तो  वो  आते ही रहते हैं मियां अक्सर
हकीकत  में  मगर  उनसे  कभी  आया नही जाता

है उनके दिल में क्या अब ये भला कैसे बताएँ हम
मगर  हमसे  कभी वो शख़्स  बिसराया नही जाता

किये ताउम्र जिनपे  हमने न्योछावर दिलों जां सब
हमारे  हाल पर  आंसू भी  छलकाया  नही  जाता

कभी हम  रूबरू  ना हो  रजा उनकी ही ऐसी थी
तो फिर बाजार में हमसे  क्यूँ कतराया नही जाता

मजे लेकर  वो  वहशत पे  हमारी  करता है  चर्चा
कभी  भी  राज  उनके हमसे बतलाया नही जाता

हमारी  मौत  भी  नाराजगी  न  खत्म   कर  पायी
चढ़ाने  कब्र  पे  दो  फूल  तक  आया  नही जाता

कभी हमको यूँ जीने का तरीका क्यूँ नही मिलता

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कभी  हमको  यूँ  जीने  का  तरीका  क्यूँ  नहीं मिलता 
फकत गिरके फिर उठने का ये मौका क्यूँ नहीं मिलता

तसल्ली  चैन  राहत  औ र  सुकूं  भी  तो कभी मिलते
कभी  कुछ  दर्द  अश्कों के  अलावा  क्यूँ नहीं मिलता

मिला  जो  भी  वो था लबरेज़  ही  बस रंजो गम से यूँ 
कहीं   कोई  बसर  भी  मुस्कुराता   क्यूँ  नहीं  मिलता

उसूलों  पर   गुजर   होती   रही   है   जिंदगी   अपनी 
कहीं  कोई  जमीरों  का  भी  जागा  क्यूँ  नहीं मिलता

यूँ  ही   बे लुत्फ़   बे मतलब   नकारा  बे मुरव्वत  सा
मुझे  कुछ  भी  मुकम्मल  सा  इरादा क्यूँ नहीं मिलता

गिरह खुलती रही हर सांस पर हर दिन हर इक लम्हा 
मेरे  भीतर   कोई   ऐसा   तमाशा   क्यूँ  नहीं  मिलता

मुकद्दर   चांद   का   बिल्कुल  हमारे  जैसा  लगता है 
वो  तन्हा  रहता है  लेकिन  वो तन्हा क्यूँ नही मिलता

सुलगते   रहते  हैं  अरमां  महक  आती  ही  रहती है 
भला कब  खाक होंगे  कुछ पता सा क्यूँ नहीं मिलता

सिमटे है खयालों में संवाद नही करते

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सिमटे   है   खयालों   में   संवाद   नही   करते 
क्यूँ  जहन   असीरी  से   आजाद   नही  करते

इस  कौम  बिरादर से  भी कुछ है इतर  दुनिया
इन  सबसे  अलग  कुछ क्यूँ उस्ताद नही करते

है   फूल  यहां  खिलते   हर  रंग  के   खुश्बू के
इस  बात  पे  क्यूँ  खुद को तुम शाद नही करते

वाजिब है खयाल अपने आपस में न मिलते हों
नफरत  तो  दिलों  में  हम  आबाद  नही  करते

हो  चार   जहाँ   बर्तन   आवाज   तो   होती  है
इतने  पे   यूँ   अपना  घर   बर्बाद   नही   करते

भीगी  हो  जो  दीवारें  गिर  जाने  का  खतरा है
कमजोर   यूँ   रो  रो  हम  बुनियाद  नही  करते

हथियार   सियासत  के   है  फिरका  परस्ती  ये
मौका  न   मिले   गर   हम  उन्माद  नही  करते

इस  शहर   हमारे   भी  महरम  है  कई  लेकिन
बे वज्ह   कभी   हमको   वो   याद  नही  करते

है  दफ्न  जरूरत  की  दहलीज़ पे हर ख्वाहिश
तकदीर  से  भी  अब  हम  फरियाद  नही करते

है  मौन   जुबां  वाले    बेजुबान  की  हत्या  पर
अब   कौन   दरिंदा  है   क्यूँ   नाद   नही  करते

हम   शेर  तो  कहते  हैं   पर  खास   नही  होते
इस  वज्ह    कभी   कोई    इर्शाद   नही   करते

ऐ मुकद्दर मेरे मैं तेरा कुसूरवार भी हूँ

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ऐ  मुकद्दर    मेरे   मै   तेरा   कुसूर वार   भी हूँ 
जो  दिया  उससे  जियादा का तलबगार भी हूँ 

मेरी  औकात  से  बढ़ कर   रहीं ख्वाहिश मेरी
बेलगामों  सी   जरूरत  का   करजदार  भी हूँ

होशियारी   से   तो    ता उम्र   रहा  नावाकिफ 
और  खुद  पे  है  गुमां  कि मै  समझदार भी हूँ

घर  में   उम्मीदें   तका   करती  है   रस्ता  मेरा
मुंतजिर   बेबसों   का   यूँ   मैं  गुनहगार भी हूँ

चाहे   बे फिक्र    बे परवाह    नकारा   कह लो
पर बहुतों का मै  हिम्मत भी हूँ जिम्मेदार भी हूँ 

मेरे  खातिर  भी  मुकर्रर है  जमीं  दो गज कहीं 
अपनी उस मिल्कियत का ही मै जमीदार भी हूँ

कोई  शिकवा   न  गिला  जिंदगी  में  है  बाकी 
अपनी  ही  हरकतो  से कुछ तो मैं बेजार भी हूँ

कश्मकश  जद्दोजहद  उम्र  तलक   चलते  रहे
बस   जरा और    जरा और   हवसकार  भी हूँ

खार हर तरफ है क्या करे गुलाब का

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खार  खार   हर  तरफ  है   क्या   करे   गुलाब  का 
चल  रहा  है  दौर   नफरतों  का   और   इताब  का

मुश्किलों   के   दौर    चल   रही    सियासतें   यहाँ
वक्त   ये   नही  है   कोई    गुजरे   अहतिसाब  का

क्या  मिला है  बोलिए तो  किसको  दिल खरास से
मन   खराब   ही   है   हासिली   दिले  खराब   का

मिल  के  करना  होगा  सामना  वबा  की  मार का
तब  ही  मिट  सकेगा  मुल्क  से  वजूद अजाब का

क्या  हुआ  बदल  गया  जो  वक्त  के  हिसाब  वो
खुल के आखिर आ गया जो मन में था जनाब का

फिर  रहे  हैं   ओढ़  कर   नकाब  लोग  चेहरे  पर
मोल   बढ़  गया   बहुत  है  आजकल  नकाब का

शहर  में  है  अजनबी  से  अपने भी कुछ आशना
क्या   मगर  ही   फायदा  है  उनके  दस्तियाब का

मानते   तो   है   मगर    मानते   भी    कुछ   नही
क्या   भला   है   तुक   कहो   ऐसे  इंतिखाब  का

राह    ताकते    गुजर   गयी   उमर   निगाह   की
और   अब   न   होगा    इंतजार    माहताब   का

ख्वाहिशें  सुलग  सुलग  के  खाक  हो  रही  यहां
पर  गुरूर  है  कि   कम  न  होता  है  जनाब  का

है    जहां    जरूरतें    वही    कभी    उगा   नही
काम  गर  न  आए  करना  क्या है आफताब का

कहाँ तक सिये अब रफूगर बिचारे

कहाँ  तक   सिये  अब  रफूगर  बिचारे
फटे  हाल   जर जर   है  मंजर  बिचारे

कहीं  दब  गयी   कहकहों  में   उदासी
न रो भी सके  खुल  के  जोकर  बिचारे

हुए  मस्त मौला  हर  इक  आदमी अब
दिखाएं  क्या  रस्ता  ये   रहबर  बिचारे

मिटी  हाथ  धो  धो  के  हाथो की रेखा
भला   क्या    करेंगे    मुकद्दर   बिचारे

बनावट  की  कीमत  बढ़ी आजकल है
पड़े    मेहराबों    पे     गौहर     बिचारे

नजारत  को  मिलते  नही आदमी अब
तरसने  लगे   अब   हैं   मंजर   बिचारे

हर  इक  शख़्स  ही  दर्द  में है  सरापा
कहाँ   तक    उकेरे   मुसव्वर   बिचारे

कड़ी  धूप  है  सर पे  सूरज है गम का
किधर  जाए  साए  को  लेकर  बिचारे

गया  भूल  क्या रब  बनाकर  मुझे  या
कहीं  और  हैं   मुझसे  बढ़कर  बिचारे

यहां   शर्त   जीने  की   टेढ़े   बनो  जी
जो   सीधे   रहे  हैं   गये   मर   बिचारे

कोई तो बताओ कुछ हल मसलओ के
दुआओं  में  है  यूँ तो  कई  सर बिचारे

पड़े हैं महिनों से घर पर बिचारे

पड़े  हैं   महिनों   से    घर  पर   बिचारे
तड़पने  लगे   अब   तो   शौहर  बिचारे

गुजर  हो  रही   जब  कि  बीवी  भरोसे 
दिखाएं  भला  क्या   वो   तेवर  बिचारे

चमकते थे  सोने के जैसे  जो कल तक
हुए  आज   पीतल  के   जेवर   बिचारे

मिले झिड़कियाँ सुब्ह से शाम तक बस
पड़े   हाथ   कानों  में   धर कर  बिचारे

हर इक शौक पर अब तो ताला लगा है
करे   रोक   कैसे    तलब पर    बिचारे

उछल कूद  फितरत  रही  आदमी  की
है  बदनाम   फोकट  में   बंदर   बिचारे

यूँ  घर  में  भी आफत  हुई जान की है
उधर   है   पड़े   सूने    दफ्तर   बिचारे

लिखे  जा रहे  बस  है शामों सहर तक
निठल्ले   पड़े   हैं    सुखनवर   बिचारे

हुए हैं बहुत फिर से दर दर बिचारे

हुए  हैं   बहुत  फिर  से   दर दर  बिचारे
करें  अब  तो  अफसोस  पत्थर  बिचारे

निकल  तो  पड़े  हैं  मुसाफत में लेकिन
कदम  दर  कदम  खाते  ठोकर  बिचारे

ये  मुश्किल  भरा  दौर  आया  है   ऐसा
रहे    कोस    अपना    मुकद्दर   बिचारे

कहां   तो   गये  थे   कमाने   को   रोटी
मगर   लौटे   हैं   भूख    लेकर   बिचारे

थे  आंखों में  सपने  सुहाने  से  कल के
कहाँ  जाए  अब  उनसे  डर कर बिचारे

जमीं  बेच  पुरखों  की   थे  शहर  आए
गवां  आज  सब कुछ  है दर दर बिचारे

चले  तो   हैं  आए   मगर   दूर  है   घर
वहीं  पर  थे  इससे  तो  बेहतर  बिचारे

फकत खाक होने की खातिर उमर भर
चले  जा  रहे   सब   यहां  पर   बिचारे

भला  कौन  लड़  पाए  अपने  मुकद्दर
गये    आए    कितने  सिकंदर  बिचारे

उठाते  नही   जो  कदम   देख  कर के
यकीनन  वो  खाते  हैं   ठोकर   बिचारे

न जाने हो क्या फैसला जीस्त का कल
बिताते  हर  इक  लम्हा हंस कर बिचारे

रहम  कर  ऐ मौला  गरीबी  पे  कुछ तो
सरापा  है   आंसू  से   सर सर   बिचारे

फटी  एक  ही   रह  गयी   पास   इनके
क्या  ओढ़े  बिछाए  क्या  चादर बिचारे

खुदा  मेरे  हिस्से  की  कम  कर दे रोटी
मगर   कोई   सोये   न   रोकर   बिचारे

तमाम उम्र  के है  असासा  ये अशआर
उलझते  है  आपस  में  अक्सर  बिचारे

कहीं  गर   बिके  तो  बताना   गजल ये
कि   बच्चे   हैं   भूखे    मेरे  घर  बिचारे

क्या पता अब कि धोखा नही आएगा

क्या पता  अब कि धोखा नही आएगा
सोचते  क्या  हो   मौका  नही  आएगा

बाज फितरत से अपनी वो आ जाएगा
यूँ  सहल  तो   भरोसा   नही   आएगा

लोग  आदत  से  अपनी  यूँ  मजबूर हैं
है  न  मुमकिन  दोबारा  नही   आएगा

पीठ  पर  वार  करना है उसका शगल
सामने  से  वो   सहसा   नही   आएगा

सावधानी    बरतना    जरूरी    ही  है
बोल  कर  कोई  मसला  नही  आएगा

सीख लो खोल कर  आंखें सोना  सदा
हर  दफा   इत्तिला   ना   नही आएगा

खूब  शातिर  है  दुश्मन संभलिये जरा
लौट कर   वक्त   गुजरा  नही  आएगा

यूँ  गया   शहर  से   जाने  वाला मियां
जैसे फिर  वो  कभी क्या नही आएगा

कहते  हैं   आदमी  वो   भला  है मगर
उसकी सोहबत से  शुहरा नही आएगा

हार  मत  मानिए   मुश्किलों  से  कभी
हौसला  देख   मसला   नही   आएगा

एक  लम्हा   गुजरता   नही  बिन   तेरे
हिज्र  हमको   गवारा   नही    आएगा

बाद  मरने  के  भी  ख्वाब  बाकी  रहे
कब्र  में  अब   इजारा   नही   आएगा

असहमत भी होकर हैं सहमत करें क्या

असहमत  भी  होकर हैं सहमत करें क्या
किसी  से  किसी  की शिकायत करें क्या

तेरे  दर्द  की   और   खिदमत   करें  क्या
न होती  अब हमसे  हिफाजत   करें क्या

तुझे  दिल   दुखाने  की   आदत  पड़ी है
तेरी  हरकतों  की   मजम्मत   करे   क्या

तवज्जो  नही  अब  वो   देते  हैं   हमको
ये फितरत है उनकी तो तोहमत करें क्या

अब  उनसे   कोई  भी   तवक्को  नही है
बड़े  बद मिजाजी  है   चाहत  करें  क्या

परेशां   तो   फिलहाल    हर   आदमी है
कोई कुछ भी कहने की जहमत करे क्या

शिकस्ता  हर  इक  मन  नजर आ रहा है 
मुसीबत    बड़ी  है   जहानत   करे  क्या

हर इक    शख़्स    टूटा  हुआ है  सरापा
कहाँ  तक   सुधारे    मरम्मत   करे  क्या

दिखाई   न    दे     गर  बुलंदी से  धरती
बताओ  भला   ऐसी  शोहरत  करे क्या

है   मुद्दत   से   खाली   पड़ा मेरा दामन
किसी से भी चाहत की  शिद्दत करें क्या

गर इंसा से  इंसा के  दिल तक  न पहुंचे
कोई  भी  भला  वो  मुहब्बत  करे  क्या

मुंडेरो  पे   रख्खा   दिया   फड़फड़ाया
चली  फिर  हवाएं   है आदत  करें क्या

महकने  लगी  खुश्बुओं से  सहर आज
खयालों में  उनकी  न सोहबत करें क्या

है  साहिल  पे  डूबी   सभी  कश्तियाँ है
वो  गिर्दाब  की  अब मलामत करें क्या

है  चिपके हुए  खिड़कियों पे ही  मंजर
यूँ   बेचारगी   है   नजारत   करें   क्या

गुजर  जाएगा   वक्त  ये  भी   यकीनन
अब इतने ही खातिर यूँ मन्नत करे क्या

कह जो दें आबरू इज्जत ही उतर जाएगी

2122 1122 1122 22

कह   जो  दें  आबरू  इज्जत  ही  उतर  जाएगी
मौन   रहने   पे   तबीयत    ही   न   मर  जाएगी

लोग  कहते  हैं  मिडिल क्लास  जमाने  में  जिसे
उसकी    फरियाद    भला  कैसे   उधर   जाएगी

कोई    इमदाद    की    उम्मीद   नही है  कुछ भी
आस   करते   हुए    बस    उम्र   गुजर   जाएगी

जिंदगी  लोन  पे  है  खुशियां  हर इक  लोन पे है
सांसे   गिरवी   है   तकाजो  से   बिखर   जाएगी

हाथ   फैलाते   हुए    सामने    आती   है   अना
हाथ   पर   हाथ    धरे   भूख   न   पर   जाएगी

दौरे   हालात    इजाजत    ही    नही     देते   हैं
कब  तलक  यूँ  ही   बिलखते  ये  उमर  जाएगी

मेरी   थाली  में   नही   चांद  उतर   पाया  कभी
अब  के  भी  ईद    मेरी   यूँ  ही   गुजर  जाएगी

वक्त  मुश्किल  है  बहुत   हाल   बुरा  है   साहब
मौत   के   बाद   ही क्या  तुझको  खबर जाएगी

मेरे   छोटे   से     समंदर   का     किनारा    टूटा
मसनदे  साही   की   कब   नजरे  इधर  जाएगी

ठोकरें   खूब   लगी     पर   न   पुकारा    पहले
आज    टूटने   पे   मेरी   हस्ती  ही  मर जाएगी

ये न हो पाया न कर पाये वो कुछ मिल न सका
बस  यही   सोचते   ये  जीस्त   गुजर    जाएगी

तंग दस्ती    है    मेरी    तर्ह    मेरी  किस्मत भी
गर्दिशे   दौर   में    जल्दी   ही    बिखर जाएगी

मान   रख्खा   है   मेरे   रब  ने   गरीबी का मेरे
तारीखें  मौन   यूँ   रह   और    सुधर   जाएगी

फासला ये जो दरमियानी है

2122 1212 22
फ़ासला ये जो दरमियानी है 
कल जो गुज़री है वो कहानी है

जिंदगी ख़्वाब या हक़ीक़त है 
जो भी है रस्म तो निभानी है

कल मुलाक़ात हो गई उनसे
जिनसे पहचान कुछ पुरानी है 

आ गयी सामने फिर आंखो के 
याद बिसरी बहुत सुहानी है

दर्द ही उम्र भर निभाएगा
हर खुशी अब हुई बेगानी है 

फिर बिछड़ जाएंगे यकीनन वो
जिनसे चाहत बड़ी पुरानी है 

हम अकेले नही बीमार उनके 
सारी दुनिया लगे दीवानी है

पहले किस्तों में मौत आयी है
खुदकुशी बाद की कहानी है

Saturday, 5 September 2020

हमें दिल लगाने इजाजत नही है

122 122 122 122

हमे  दिल  लगाने      इजाजत  नही है
हमारे  लिए      ये  मोहब्बत     नही है/1/

निगाहे तो  मिलती  इधर भी है लेकिन
किसी दिल मे रहने की किस्मत नही है/2/

वफाओं  के बदले  मिले  बस  वफा  ही 
जहाँ  में   अब ऐसी  शराफत   नही है/3/

ये  अश्कों का दरिया बहा है अचानक 
हमे  यूँ तो   रोने  की   आदत   नही है/4/

खुशी जीस्त से छीन लो चाहे जितनी 
अजल  के  तो   पाले  मुरव्वत  नही है/5/

रविश हमने  दुनिया की देखी है सारी 
हमें  और अब   कोई    चाहत  नही है/6/