Wednesday, 16 September 2020

क्या कहें बात कोई बात नही

2122 1122 22/112

क्या कहें बात कोई बात नही
खुश नुमा शह्र के हालात नही

मुब्तिला लोग यहां है सब ही
हादसा  कोई  नयी  बात नही

हर कदम वक्त   दगा   देता है
आदमी की तो ये औकात नही

अब के आए हैं परिंदे छत पे
नासमझ  जानते ये जात नही

आज मेंहदी लगी है हाथों में 
इस बहाने  से  मुलाकात  नही

रात है स्याह  रहे क्या हो गया 
चांद के  सामने  औकात नही

जिंदगी  रोज  उलझ पड़ती है
जीने खातिर  तो ये हैहात नही

आंखें हरदम है बरसती रहती
शहर में  यूँ कहीं बरसात नही

अब जरूरत के तलब जारी है
जिंदगी ये  कोई  सौगात नही

रात  गुजरी है  अमावस जैसे
इससे  काली  कोई  रात नही

रोते  हंसते भले ही गुजरी है 
इससे बेहतर तो कोई बात नही

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