पड़े हैं महिनों से घर पर बिचारे
तड़पने लगे अब तो शौहर बिचारे
गुजर हो रही जब कि बीवी भरोसे
दिखाएं भला क्या वो तेवर बिचारे
चमकते थे सोने के जैसे जो कल तक
हुए आज पीतल के जेवर बिचारे
मिले झिड़कियाँ सुब्ह से शाम तक बस
पड़े हाथ कानों में धर कर बिचारे
हर इक शौक पर अब तो ताला लगा है
करे रोक कैसे तलब पर बिचारे
उछल कूद फितरत रही आदमी की
है बदनाम फोकट में बंदर बिचारे
यूँ घर में भी आफत हुई जान की है
उधर है पड़े सूने दफ्तर बिचारे
लिखे जा रहे बस है शामों सहर तक
निठल्ले पड़े हैं सुखनवर बिचारे
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