Tuesday, 15 September 2020

पड़े हैं महिनों से घर पर बिचारे

पड़े  हैं   महिनों   से    घर  पर   बिचारे
तड़पने  लगे   अब   तो   शौहर  बिचारे

गुजर  हो  रही   जब  कि  बीवी  भरोसे 
दिखाएं  भला  क्या   वो   तेवर  बिचारे

चमकते थे  सोने के जैसे  जो कल तक
हुए  आज   पीतल  के   जेवर   बिचारे

मिले झिड़कियाँ सुब्ह से शाम तक बस
पड़े   हाथ   कानों  में   धर कर  बिचारे

हर इक शौक पर अब तो ताला लगा है
करे   रोक   कैसे    तलब पर    बिचारे

उछल कूद  फितरत  रही  आदमी  की
है  बदनाम   फोकट  में   बंदर   बिचारे

यूँ  घर  में  भी आफत  हुई जान की है
उधर   है   पड़े   सूने    दफ्तर   बिचारे

लिखे  जा रहे  बस  है शामों सहर तक
निठल्ले   पड़े   हैं    सुखनवर   बिचारे

No comments:

Post a Comment