Tuesday, 15 September 2020

मंजर ही हादसों का अजीबो गरीब था

221 2121 1221 212
मन्जर  ही  हादसे  का  अजीबो गरीब  था 
निकला अदू भी वो ही जो सबसे करीब था

सौदा  न हो सका  कभी हमसे ये इश्क का
मंहगी थी उल्फतें ये दिल अपना गरीब था

मजबूरियों  बेचैनियों   का   नाम   जिंदगी 
खामोश सा निबाह भी  कितना अजीब था

सस्ती  जनाब जीस्त है  मंहगी है ख्वाहिशें 
अक्सर ये खाली जेब ही अपना नसीब था

ढुंढा  नही मिला कहीं  हमको  तो  आदमी
खोया  हुआ सा  जात  में  मेरा  हबीब  था

अंधे  सुझाते   राह है   बहरों  की   भीड़ में 
गुंगो  के मुंह से गीत  ये कितना अजीब था

No comments:

Post a Comment