Tuesday, 15 September 2020

सिमटे है खयालों में संवाद नही करते

221 1222 221 1222 
सिमटे   है   खयालों   में   संवाद   नही   करते 
क्यूँ  जहन   असीरी  से   आजाद   नही  करते

इस  कौम  बिरादर से  भी कुछ है इतर  दुनिया
इन  सबसे  अलग  कुछ क्यूँ उस्ताद नही करते

है   फूल  यहां  खिलते   हर  रंग  के   खुश्बू के
इस  बात  पे  क्यूँ  खुद को तुम शाद नही करते

वाजिब है खयाल अपने आपस में न मिलते हों
नफरत  तो  दिलों  में  हम  आबाद  नही  करते

हो  चार   जहाँ   बर्तन   आवाज   तो   होती  है
इतने  पे   यूँ   अपना  घर   बर्बाद   नही   करते

भीगी  हो  जो  दीवारें  गिर  जाने  का  खतरा है
कमजोर   यूँ   रो  रो  हम  बुनियाद  नही  करते

हथियार   सियासत  के   है  फिरका  परस्ती  ये
मौका  न   मिले   गर   हम  उन्माद  नही  करते

इस  शहर   हमारे   भी  महरम  है  कई  लेकिन
बे वज्ह   कभी   हमको   वो   याद  नही  करते

है  दफ्न  जरूरत  की  दहलीज़ पे हर ख्वाहिश
तकदीर  से  भी  अब  हम  फरियाद  नही करते

है  मौन   जुबां  वाले    बेजुबान  की  हत्या  पर
अब   कौन   दरिंदा  है   क्यूँ   नाद   नही  करते

हम   शेर  तो  कहते  हैं   पर  खास   नही  होते
इस  वज्ह    कभी   कोई    इर्शाद   नही   करते

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