Wednesday, 30 December 2020

शहर में शोर के कारवाँ रह गये

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शहर में शोर के कारवाँ रह गये
दब गयी सिसकियाँ कहकहाँ रह गये

चांद भी खो गया तारे भी खो गये 
जीस्त में तीरगी के निशाँ रह गये 

दिल ने देखे थे कल ख्वाब कुछ आपके 
सुब्ह होते ही फिर बस धुआँ रह गये 

आये हकीकत में वो हमने देखा नही 
दीद की चाह में हम नवांँ रह गये 

रंज है बस यही उनकी नजरों में अब
जो थे बेमोल अब वो गिराँ रह गये 

है रकीब उनको सारे अजीज आज भी 
हम वफा करके भी बस फुगाँ रह गये 

अपने दिल की किताबें रही कोरी ही 
कुछ रहा बस तो खुश्क से फिजाँ रह गये

Monday, 28 December 2020

जीने का तरीका भी आता है बहुत अच्छा

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जीने का तरीका भी आता है बहुत अच्छा 
मुश्किल से रहा उसका रिश्ता है बहुत अच्छा 

ता उम्र गुजारी है बस जद्दोजहद में ही 
वो भीड़ में अपनो के तन्हा है बहुत अच्छा 

देखा है दिया जलते मुफलिसों की बस्ती में 
वो आज भी किश्तों पे जिंदा है बहुत अच्छा 

बेपर्दा है रिश्ते सब महलों में दु महलों में 
घर आज गरीबों के परदा है बहुत अच्छा 

सजदे में झुका रहता वो गाहे-बगाहे ही 
अब दैर हरम का ये चस्का है बहुत अच्छा 

बच्चों के लिए रक्खे अशआर जमा करके 
शर्मिंदा फकत देते बंदा है बहुत अच्छा 

की खूब मशक्कत पर अब हार गया दिल से 
बेटी को बिदा करते रोया है बहुत अच्छा 

बस और जरा करते गुजरी है उमर सारी
चाहत की नही हद बस रखता है बहुत अच्छा

कसमसाहट तिलमिलाहट बेबसी देखी गई

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कसमसाहट ,तिलमिलाहट  बेबसी  देखी गई
दर्द में लिपटी हुई     हर जिंदगी देखी गई

रोज ही सूरज निकलता है अँधेरा है मगर
ओंठ पर सबके उधारी की  खुशी देखी गई

आज सबके बीच पसरा एक सन्नाटा बड़ा
आज हर इक आँख में  लाचारगी  देखी गई

सर गिरे सजदे में  हैं पर दिल में है बदमाशियाँ
इस तरह की अब इबादत , बंदगी देखी गई

शहर है  झीलों का  पंछी प्यास से मरते मगर 
सब दिलों में इक अजब सी तिश्नगी देखी गई

दिल जिगर अपना नही है जान भी अपनी नही
और दूजे ठाँव में अपनी खुशी देखी गई

जाने इस शहर को हुआ क्या है

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जाने इस शहर को हुआ क्या है 
आदमीयत है गुम वजा क्या है 

साजिशो का यूं दौर चलता है 
भूल ही सब गये दुआ क्या है

खो गयी है ये जिंदगी ऐसे 
कुछ खबर ही नही कहा क्या है

जा ब जा देखिए अदावत है 
बाहमी रब्त ही रहा क्या है

हर कदम हादसो का मंजर है
खौफ़ दहशत सिवा भला क्या है 

मस्त मौला है वो कलंदर है
क्या है परवा कहाँ हुआ क्या है

बेच देते हैं अजमते अपनी
क्या खुमारी है ये नशा क्या है

मैं कोई गुजरा हुआ लम्हा नही हूँ

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मैं  कोई   गुजरा  हुआ   लम्हा   नही हूँ
हूँ   हकीकत   मैं  कोई   धोखा  नही हूँ

कशमकश जद्दोजहद कुछ इस कदर हैं 
अब तो अक्सर  खुद में मैं होता नही हूँ

खूब  गुजरी  है  तेरे  बिन  जिंदगी अब
किसने तुझसे कह दिया अच्छा नही हूँ

यूँ  तो  तेरे  बाद भी  खोया  बहुत कुछ
पर  तुझे  रोकर  मैं  फिर  रोया नही हूँ

रोक बस  पाता नही  जज्बात दिल के
दर्द  यूँ  जाहिर  कभी   करता  नही हूँ

बस वफा और सादगी  मुझमें मिलेगी
मैं  कोई  जरिया  कोई  मौका  नही हूँ

तुमने जो ढूंढा न था  अफसोस मुझमें
मैं  दिखावे  से  भरा   रूतबा   नही हूँ

गम की बस्ती के हर मकां तन्हा

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गम की बस्ती के हर मकांँ तन्हा 
इश्क में जख्म के   निशांँ तन्हा 

गुफ्तगू किस  तरह से  हो तुझसे
अब तो मिलती है हर जुबांँ तन्हा

तेरे  आने  की  हो  खबर  कैसे 
तेरे  दर   तेरा   आशियाँ  तन्हा

जिक्र करता नहीं कोई भी अब
तेरे   हर   यार   मेहरबांँ  तन्हा

तेरे जाने के बाद  क्या  ही रहा 
तेरे निस्बत है दास्ताँ तन्हा 

नेमते रुख बदल के  लौट गई
दिखता हर आदमी यहाँ तन्हा

इश्क़ में खुद को लोग भुले है 
यूँ न है दिल जिगर ये जाँ तन्हा

देख कर आदमी जी में डर आए तो

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देख कर  आदमी  जी  में  डर  आए  तो
क्या  कहें   ऐसे  हालात   गर   आए  तो

किस  तरह  दिन  गुजारें  बताओ  भला
खौफ़  में  नींद  ना   रात  भर  आए  तो

किस पे  कर  ले  भरोसा  कि है राम वो 
सब में रावण  की सूरत  नजर  आए तो

क्यूँ  न  सोती  मेरी  बदनसीबी की  रात
मेरे  हिस्से  भी   कोई   सहर   आए  तो

फायदा कुछ न  मरहम से  होता है अब
फिर लगाओ नमक जख्म भर आए तो

बोल कर  क्यूँ  वो  रिश्ते  बिगाड़े  मियां 
मौन  रह कर  जो उनमें निखर आए तो

खूब  भटके    तेरी   याद  में    रात भर
पूरी  खाली  मिली   राहगुज़र  आए तो

चलना उल्फत की राहों में बेहद संभल
हाथ  मलते   गये   जो  इधर  आए तो

अब  नजरिए  ही  छपते हैं अखबार में
कैसे  पहचाने   कोई   खबर  आए  तो

मंदिरों  मस्जिदों  में  तो  रब  ना मिला 
ढूंढ  लो  मैकदे  अब  नजर  आए  तो

कि मुश्किल वक़्त को मुश्किल बताना भूल जाते हैं

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कि  मुश्किल  वक़्त  को  मुश्किल  बताना भूल जाते हैं
जो  खुद  से   मिलते  हैं  हम   तो जमाना भूल जाते हैं/१/

उन्ही  से   पूछते   हैं   वज्ह   उनके    रूठने   की हम
सितमगर   जब  कभी    हमको   सताना भूल जाते हैं/२/

है  उलझी   इस कदर   जद्दोजहद  में   जिंदगी अपनी
कि  रोते हैं   तो     आंसू   ही    बहाना    भूल जाते हैं/३/

कुछ  उधड़े उधड़े  दिखते  हैं  हमे  रिश्तों के धागे सब 
कभी    पैबंद    इनमें    जब    लगाना    भूल  जाते हैं/४/

कि जिनके वास्ते ख्वाहिश सब अपनी दफ्न की हमने 
वो  बच्चे   फर्ज  अब अपने    निभाना   भूल  जाते हैं/५/

नये  मिल  जाते हैं  हर मोड़ पर  अब  दर्द भी अक्सर
 नये  से  मिल के  हम  भी  गम  पुराना  भूल  जाते हैं/६/

खुद अपने को तलाशेंगे अब हर दिन

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खुद अपने को  तलाशेंगे अब हर दिन 
भुला कर दुनिया  देखेंगे अब हर दिन/1/

खयालो  ने    बगावत    कर  रखी है
शरारत इसको लिक्खेंगे अब हर दिन /2/

न हो  नाराज  यूँ  हर बात  पर  दिल 
तुझे  फुर्सत  में  सोचेंगे  अब हर दिन /3/

तमन्ना   आरजू    उम्मीद   ख्वाहिश 
यकीनन  मार  डालेंगे   अब हर दिन /4/

तुम्हारे  बिन   जो  गुजरी  जिंदगी है 
तसल्ली  से   सुनाएंगे   अब हर दिन /5/

बखूब वाकिफ़  गरीबी  से  है बच्चा
अंगूठा  मुँह में  देखेंगे   अब हर दिन /6/

बिछौने  कम है  मुफलिस जानता है 
पलक पे मेहमां रक्खेंगे अब हर दिन/7/

वाकिफ़ है खूब बढ़िया वो जज्बात से मेरे

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वाकिफ़  है  खूब  बढ़िया  वो  जज्बात  से मेरे 
रहता  है  पर   डरा सा      सवालात    से  मेरे/1/

यूँ   जिंदगी में  मुश्किलें   भी  कोई  कम  नही
देता  है   बढ़ के  और   वो    औकात   से मेरे/2/

लम्हा  कहीं  पे  वक़्त से  गिरकर के खो गया 
सदमा   जुदा   नही   है  ये   जुल्मात  से  मेरे/3/

इक  आरजू   खयाल   तमन्ना   तलब   है  तू
वाक़िफ़   तमाम   शहर  है   माम्लात   से मेरे/4/

शिकवा  कोई न  गम  न गिला  ही  कोई रहा 
आंसू   भी   आशना  है   बहुत  जात  से मेरे/5/

इक दिन तो जी के देख मुआफिक मेरे कभी 
तू  भी   कभी  हो   रूबरू    हालात  से  मेरे/6/

किरदार  हर  घड़ी  यूँ  न  बदला करो  हुज़ूर 
रहने  दो  कुछ  तो  खुद में  निशानात से मेरे/7/

अंधेरों की हस्ती मिटाने की खातिर

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अंधेरो की हस्ती मिटाने की खातिर 
मैं सूरज कभी अपने घर चाहता हूँ

कभी देख ले आसमाँ मेरे बच्चे 
उजाले जरा मैं इधर  चाहता हूँ

हूँ वाकिफ बहुत ऐ खुशी तेरे कद से
तुझे करना हासिल मगर चाहता हूँ

यूँ सजदे में हर पल तेरे हम रहे हैं 
ऐ मालिक अब उसका असर चाहता हूँ

तमाम उम्र गुजरी है बस उलझनों में 
सुकुनो भरा अब सफर चाहता हूँ

अब सुना पायेंगे ना किस्सा तेरा

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अब सुना पायेंगे ना किस्सा तेरा
चाहते हैं भूलना मसला तेरा

दिल को मेरे दर्द गहरा दे गया
यूँ सितम करके फकत जाना तेरा

तेरे आने की नही उम्मीद पर
देखते हैं आज भी रस्ता तेरा

तेरी सब यादें मिटा डाली मगर
फोन से नम्बर न मिट पाया तेरा

वाकिया तकलीफ़ देता है बहुत
गैर से  सुनते  हैं  जब चर्चा तेरा

की भुलाने की बहुत कोशिश मगर
जह्न से जाता न मुस्काना तेरा

ये जो तुम हालचाल पूछते हो

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ये जो तुम हालचाल पूछते हो 
खूब मुश्किल सवाल पूछते हो

देख कर भी तबाही के मंजर
बेखबर बन कमाल पूछते हो

अश्क तन्हाई हसरतें चाहत
ना उम्मीदी बेहाल पूछते हो

शर्त जीने की खामोशी हैं यहां 
दफ्न दिल के मलाल पूछते हो

अर्जियां खुदखुशी की हाथों में 
आप ख्वाबों खयाल पूछते हो

रोज होती गुजर है फाको में 
आप खुशरू सा हाल पूछते हो

सुब्ह आयी जरा जरा करके

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सुब्ह   आई   जरा   जरा    करके
रात   गुजरी   है    थरथरा  करके/1/

धूप   लरजाई    हुई    दिखती  है
चांद  पिघला  है   तब्सिरा  करके/2/

कुछ  न हासिल  हुआ सुकून हमें 
हमने  देखा  है   इल्तिजा   करके/3/

हर  घड़ी ही  जहां की फिक्र रही 
तुझको   देखा   भी   डर-डरा के/4/

अब रवायत ही चल पड़ी है नयी 
दर्द  पाओगे   बस   वफा  करके/5/

चांद   के  पार    भी     अंधेरा है
देख  लो   पर्दा  तुम  हटा  करके/6/

दर्द  देती  है   आस  ही  अक्सर
हमने  देखा  है   तजरबा  करके/7/

खैर  ख्वाही   न  पूछती है कभी
खूब  पछताए हम तो आ करके/8/

खुद  नदारद है जिंदगी ही कहाँ
हमको  दावत  में यूँ बुला करके/9/

दरमियाँ   ऐसे  फासला  करके
मत मिलो दिल जुदा जुदा करके/10/

क्या हम बताएं क्या है रिश्तों का टूट जाना

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क्या  हम  बताएँ  क्या  है  रिश्तों  का  टूट जाना
अपना  ही  जानता  है   अपनो  का   टूट  जाना/1/

जिसने  है   जाग  कर के    रातें   कई    गुजारी
उसको  पता है  क्या  है  ख्वाबों  का  टूट जाना/2/

अपनो  से  लड़ते लड़ते  जो  खाक  हो गया है
उसको  पता  है  क्या  है  सांसों  का  टूट जाना/3/

हर  भूख      बेबसी  के      मुद्दे    हुए   नदारद 
अच्छा  नही  है   छप्पर   चुल्हो  का  टूट जाना/4/

किस तौर  हम  मुनासिब  इसको  कहें बताओ 
मुर्दों  की  बस्तियों  में   जिंदो  का   टूट  जाना/5/

मंडरा   रहे    परिंदे       मायूस   आसमाँ   पर
बेघर  जो  कर  गया  है   पेड़ों  का  टूट  जाना/6/

तरसा  जो  एक  कतरे  खातिर  वो  जानता है
उम्मीद   हसरतों   का   वादों   का  टूट  जाना/7/

होता न मुफलिसों की अब आह में असर कुछ
अच्छा  न  रब   यूँ  तेरे   बंदो  का   टूट  जाना/8/

कुछ तो  कमी  रही है  अपनी भी कोशिशों में
वरना  सहल  नही  है  सपनों  का  टूट  जाना /9/

किस्मत  को  कोसते  ही  हम  रह गये हमेशा
था  अपने  हाथ  ही  उम्मीदों  का  टूट  जाना /10/

दिखावा बंदगी अच्छी नही लगती

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दिखावा  बंदगी अच्छी नही लगती
ये झूठी जिंदगी अच्छी नही लगती

नही आता फरेबी चाल ये हमको
किसी को सादगी अच्छी नही लगती

हैं डूबी अब तलक बस्ती अंधेरों में 
सभी को रोशनी अच्छी नही लगती

बहे है झोपड़ी में तर ब तर आंसू 
उन्हे अब खुदखुशी अच्छी नहीँ लगती

बड़ा कद हो गया है दोस्तों का अब
हमारी दोस्ती अच्छी नही लगती

बदल देते हैं रस्ता देखकर हमको
अब उनकी बेरूखी अच्छी नही लगती

कहर बरपा भला कैसा कयामत सा नजारा है

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कहर  बरपा  भला  कैसा कयामत  सा  नजारा है
जिधर  देखो  उधर  दहशत भरा  माहौल  सारा है/१/

सभी  चेहरे  मिले  सहमे  दिलों  में  डर समाया है
खुदा  कैसा  समय  आया  भला ये क्या इशारा है/२/

नजर  से  शर्म  का  पानी नदारद है सभी के अब
मिटी  संवेदनाएं  अब  सभी  को  स्वार्थ  प्यारा है/३/

समर्पण  त्याग  अब बीते दिनों की बात है साहब
बहस  इस बात पर है  आज  क्या मेरा तुम्हारा है/४/

खुशी  के दौर  में अब  कौन  ईश्वर को सुमरता है
मुसीबत  के  समय  ही आदमी   ईश्वर  पुकारा है/५/

बदल जाता समय को देखकर इंसान ही अक्सर
न  जब  रस्ता  दिखे कोई  तो  ईश्वर ही सहारा है/६/

फुरसतों में उम्र भर यूँ ही गुजर होगी नही

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फुरसतों  में   उम्र  भर   यूँ  ही   गुजर  होगी नही
कुछ  किये   बिन  जिंदगी  ऐसे  बसर  होगी नही/१/

स्याह  रातों  से  भला  कब तक डरें तुम ही कहो
रात  ये  कब तक  रहेगी  क्या  सहर  होगी  नही/२/

कशमकश  जद्दोजहद  में  ही  गुजारे कब तलक 
ऐसे  तो   कोई  समस्या    मुख्तसर    होगी  नही/३/

मुश्किलों  से  भागता   कब तक  फिरेगा आदमी
आंख   मिचने  से   हकीकत  से मुकर होगी नही/४/

करता  जाता  है  गुनाहों  पर  गुनाह हर आदमी
सोचता  है  क्या  भला  रब  को खबर होगी नही/५/

चांद  तारों  के  खयालो  से  निकलिए भी  कभी
इन  मुअल्लो  से इतर  क्या  रह गुजर होगी नही/६/

है  परेशां  क्या  हुआ  जमहूर  की फितरत है ये
हुक्मरां  है   मुब्तिला  उसको  खबर  होगी नही/७/

सोचकर तो देखिये कुछ पल कभी उनको मियां
रात  ही  है  जिनके  हिस्से  में  सहर   होगी नही/८/

हाल  मत  पूछा  करो  हर  रोज  मेरा  यूँ  हुज़ूर
इस  तरह   कोई   दराज़े  तो  उमर   होगी  नही/९/

स्याह रातों से भला  कब तक लड़े  जुगनू कोई
जब तलक  सूरज  न आएगा  सहर  होगी नही/१०/

धर्म  है    इंसानियत     मेरी    यही  पहचान है
चंद  फिरको  सिरफिरो  की ये नजर होगी नही/११/

माँ   लगा  देती   डिठौना   रोज  माथे  पर  मेरे
क्या  करेगी  अब  बला  कैसे  महर  होगी नही/१२/

सुकून के पल दो पल गरज थी ये फुरसतों का भला करें क्या

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सुकून के पल दो पल गरज थी ये फुरसतों का भला करें क्या
नसीब ही  अपना  जब है सोया  दवा करें क्या दुआ करें क्या

तमाम  रिश्ते   बदलते  देखे  हैं   वक़्त  के  साथ साथ  हमने
करे जो  मतलब से  नातेदारी  भला  बताओ  वफा  करें क्या

लो सज गए फिर से हसरतों के लुभाते बाजार हर कदम पर
विवश हैं बच्चे की जिद के आगे  कोई बताए  मना करें क्या

बड़ी सी  बिंदी  सजा के  माथे पे  रात  कैसी  निखर  रही है
उधार की  रोशनी में  इतरा  रहा  गजब  चांद  का  करें क्या

ये कच्चे रिश्ते,  ये बासी चाहत,  ये अपनापन,है लगे अधूरा 
हमारे  हिस्से  में  ये  ही  सौगात आई  अक्सर बता करें क्या

न  दायरों  में   समेट  सकते  हो   मेरा  किरदार  है  अजूबा 
है एक पल में खिला ये चेहरा  औ दूसरे पल बुझा करें क्या

आदमी बात पर ही अपनी खरा कुछ तो रहे

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आदमी  बात पर ही अपनी खरा कुछ तो रहे
दौर अच्छा हो या जितना हो बुरा कुछ तो रहे/1/

दिल तसल्ली  के लिए  जेब में बटुआ तो रहे
अब वो खाली ही रहे या के भरा कुछ तो रहे/2/

जह्न  से  जागा  हुआ  एक  तो  इंसान  मिले 
जिस्म से  चाहे हो  जिंदा या मरा कुछ तो रहे/3/

कोई  आवाज़  तो  मजलूम की आवाज बने
चाहे  बेख़ौफ़  रहे   चाहे  डरा  कुछ  तो  रहे/4/

बरहना जिस्म को  दरकार कब़ा की है मियां
ज़ाफ़रानी  हो  वो  चाहे  हो हरा कुछ तो रहे/5/

मांगता  क्यूँ  मैं  फिरूँ  बात बिना बात दुआ
जिम्मेदारी वो खुदा की भी जरा कुछ तो रहे/6/

जाम उल्फत के जरा मुझको पिला दो कोई

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जाम  उल्फत  के  जरा  मुझको पिला दो कोई
इक नजर   देख  लो   ये प्यास  मिटा  दो कोई/1/

खूब  तरसा  हूँ  मैं    ताउम्र    मुहब्बत के लिए
कुछ हंसी ख्वाब इन आंखों को दिखा दो कोई/2/

अब  तो  बाजार  में  बिकते  हैं  मुखौटे ज्यादा
आईना    बेचने  वाले    को    बता    दो  कोई/3/

अब  खरीदार  नही  मिलते  कहीं  भी  सच के 
झूठ  का  फिर   बड़ा  बाजार   लगा  दो कोई/4/

मूंगफली  आए  नयी  जितनी  भी  बाजारों में
सस्ते   होते   नही   बादाम   दिखा   दो   कोई/5/

फिर तो औलाद भी देती है अलहदा सा सबक
कुछ जियादा  जरा जी कर तो  दिखा दो कोई/6/

मौके  ईमान  के   दुश्मन   की   तरह   होते हैं
इस  नये  दौर  को   ये  बात   सुना  दो   कोई/7/

फिर से गुलजार हो गुलशन मेरा  खुश्बू बिखरे
नफरतें  दिल  से  यहाँ  सबके  मिटा  दो कोई/8/

खुद  अंधेरे  में   है  वो  सबको  उजाले  देकर
इक  दिया  दीप  तले  भी  तो  जला  दो कोई/9/

इस जहां आने से अब  बेटियाँ  कतराने  लगी
खौफ़  ये  उनके  दिलों  से  तो  हटा  दो कोई/10/

रिश्तों को खास  बना  देती है  हद से  ज्यादा
एक   छोटी  सी  ही  परवाह  जता   दो  कोई/11/

एक चाहत थी कोई शख्स तो अपना होता

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एक  चाहत  थी  कोई   शख्स  तो अपना  होता
दिल  जिगर  जान  का  अपना भी मसीहा होता/1/

खोये  हम   रहते  जहाँ   शाम  सहर आठ पहर
कोई    ऐसा   भी    जमाने  में   ठिकाना   होता/2/

मेरी  भी   सबसे   निभी   होती   बड़े   अच्छे से
हाँ  में  हाँ   मैने   अगर   सबके  मिलाया  होता/3/

बात  करता  है   बड़े  जोर  से    लेकिन हल्की
सुनते  उसकी  भी  जो  किरदार से पुख्ता होता/4/

कितनी बेहिस है ये कुर्सी की तलब देखो मियां
कुछ  तो  इंसानियत  का  मान भी रक्खा होता/5/

हमको  मालूम  है  हस्सास  यूँ  होने  के  सबब
गर  हकीकत  ये  जो  होता  बड़ा अच्छा होता/6/

शोर  जितने  भी  हैं  परदे  पे  है कागज पर है
गर  जो  होता  वो  हकीकत  यूँ न चीखा होता/7/

शेर  की   खाल   पहन   देखिए  गीदड़  आये
काश   ये  रोष   दिखावा   नही   सच्चा  होता/8/

याद  जमहूर  की   यूँ  ही  तो  न  आयी  होगी 
कुछ  न  होता  जो  चुनावों  का न मौका होता/9/

ज़िंदगी  एक  दफ़ा  कर  ले  सितम  जितने तू 
हमसे   अब  रोज   नही   ऐसा  तमाशा  होता/10/

बेबसी   देख   न   पाता   कोई   बाहर   वाला
घर  की  चौहद्दी  का  जो कद जरा ऊंचा होता/11/

उसकी उल्फत भी फरेबी ही रही उसकी तरह 
प्यार  करता  जो  अगर  लौट  वो आया होता/12/

मजा बोलिए क्या है इन नफरतों में

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मजा   बोलिए    क्या  है  इन नफरतों में
धरा  क्या  है  कुछ  भी दिली फासलों में/1/

जहाँ  में    मुहब्बत     लुटाते चलो  बस
अजी   गौर    मत    किजिए बातिलों में/2/

उसे   ही    मिले   है    सदा  रंजो गम ये
सहेजा  है   रिश्तों  को   जिसने दिलों में/3/

दिया  रब  ने  फुर्सत  से  फुर्सत के लम्हे
हर इक आदमी  फिर  भी है उलझनों में/4/

सरेआम   ही    लूट    सी    अब मची है
नही  फर्क   कुछ   शाह और रहजनों में/5/

है  गिनती  के   बेशक  मेरे  यार लेकिन
पर  है   खूब       जिंदादिली   दोस्तों में/6/

वफाओं  में   मैने   कमी  कुछ नही  की
मुरव्वत   उन्होंने    न   की   आंसूओं में/7/

न  सह  पाओगे  दर्द  कह कर सितमगर
किया  नाम  शामिल   मेरा  बुजदिलों में/8/

जरूरी  है  दौलत  भी  जीने के  खातिर
नही   पेट   भरता   है   बस   वायदों में/9/

जहाँ    कोई    उम्मीद    होती   नही है
वहाँ  भी   मुझे   रब   मिला  पत्थरो में/10/

बही  जा  रही आंखें अम्मा की अविरल 
है  हलचल  बहुत  इन दिनों  सरहदों में/11/

वही  वहशियाना   नया   क्या   हुआ है
बस इक नाम और जुड़ गया है दुखों में/12/

हमी  पे  बरसने  लगे  अब  वो   पत्थर
अता  की  जिन्हें  धड़कनें   वलवलों में/13/

है  शामिल  मेरा  भी लहू इस जमीं पर 
न  गिनती  करो   तुम  मेरी  दुश्मनों में/14/

हर इक जिंदगी में बहुत सी है  उलझन
रहा  कौन  बाकी  है  इन   मुश्किलों में/15/

मियां   आपकी   हुक्मरानी   है   बेजा
गिना सकते  उपलब्धियां  उंगलियों में/16/

ढूंढ लेते सियासत हो हर बात पर

212 212 212 212 
ढूंढ  लेते    सियासत    हो   हर  बात  पर
मौन   रहते   हो     मुद्दों  पे     हालात पर

क्यूँ   डराते  हो    मासूम    जज्बात    पर
जोर   देते    हमेशा   हो    क्यूँ   जात  पर

ऐसे     हालात    को     बेतुकी   बात  को
मै   नही   मानता     मै     नही     जानता

हर खबर  आज  लथपथ  सनी सी  मिली
रक्त   में  ही   नहाकर    खुशी   हर  चली

हर कदम  हादसों  की है  महफिल  सजी
पर  सियासत  को  बस है  सियासत पड़ी

ऐसे   जमहूर   को      अहले  दस्तूर  को
मै   नही    मानता     मै    नही    जानता

साफ  सुथरी    छवि  से    सरोकार  क्या
सध रहा जब है  मतलब तो किरदार क्या

क्या  हमे  करना  कहता  है  संसार  क्या
मिल गया मुझको हक मेरा अब यार क्या

ऐसे  बाजार  को   मत के  अधिकार  को
मै  नही    मानता       मै   नही    जानता

क्या खता हो गयी क्यूँ गिले हो गये

212 212 212 212
क्या   खता  हो  गयी  क्यूँ  गिले  हो  गये
कह   रहे   लोग  हमको       बुरे   हो गये/1/

फुरसतों   के   ये    लम्हे   कहर   ढा  रहे
अच्छे  खासे   भी   अब  सरफिरे  हो गये/2/

बात  दिल  की  कही हमने दिल से मियां
आप   क्यूँ   इस तरह   अनमने   हो  गये/3/

दोष  होता  नही  गलतियों  का  ही  बस
गल्तफहमी    में  भी    फासले    हो गये/4/

वक्त   रहता   नही   है   कहीं  टीक  कर
कल  जो  अपने  थे  अब  गैर के हो गये/5/

था  न  मुमकिन  बदलना  यूँ हालात को 
मन  बदल  कर  फिर हम ही नये हो गये/6/

जिंदगी   से   तो   अनबन  रही  उम्र भर
मौत   से   भी    बहुत  से  गिले  हो  गये/7/

देख   उनको    हुई   है    उदासी   बहुत
क्या  थे  कल  आज क्या देखिए हो गये/8/

है  वो   रहजन   नया  है  सलीका  नया
तौर   अब   रहजनी   के   नये   हो  गये/9/

कुछ  उजालों  में  उनको  गये  भूल हम
वज्ह   से   जिनके  रोशन  दिये  हो गये/10/

देख कर रुख  बदलती हवाओं की अब 
जो   पराये   भी  थे   वो   सगे  हो  गये/11/

रहती  है   फिक्र   बंदो  की   अपने उसे
रब   को   नाराज   मत  सोचिए हो गये/12/

कब तलक हो सियासत की बातें मियां
छोड़िए   सब     पुराने    धड़े  हो  गये/13/

बे वजह यूँ निकलिए न घर से

212 212 212 2
बे वजह   यूँ     निकलिए   न घर से
कुछ   डरा      किजिए इस कहर से/1/

इक   वबा  ने   मचाया  है कोहराम
दुनिया  दहशत  में  है  इस खबर से/2/

जा ब जा   है    गिरी    सोच   वाले
बचना    हमको  है    ऐसे  जहर से/3/

रह   गये   फिर   टंगे   खूंटियों  पर 
कुछ  उसूल आजमाईश  के  डर से/4/

हो   गयी   है     हमे   भी  मुहब्बत
अब   बचाओ   हमे    बद नजर से/5/

इक  दफ़ा  हंस  के देखा जो उसने
काम  से   हम  गये   उस   पहर से/6/

रूठने   की    तमन्ना   है    खुद से
अब   सितमगर   हुए   बे असर से/7/

अब  के   बिछड़े   लहू  ही  बहेगा
बह  गये    अश्क   सारे    इधर से/8/

इक  दरिंदा   सभी   के  है  भीतर
कुछ भी  कम वो नही  जानवर से/9/

है  अभी   तो   बहुत  दूर  मंजिल
थक गये क्या तुम अपने सफर से/10/

चुक  गये  हम  लकीरों  से  वरना
हम  भी  करते  वफा  मोतबर  से/11/

वबा - महामारी/जा ब जा - हर जगह /मोतबर - विश्वास

बे वजह ही कभी तूफ़ान उठा लेते हैं

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बे वजह   ही    कभी    तूफान    उठा   लेते हैं
आए   रिश्तों  पे   तो   नुकसान   उठा   लेते हैं/1/

जान   कमजोर    हमें   टूट   न    जाए   बच्चे
सोच  हम   वज्न    के   सामान   उठा   लेते हैं/2/

अच्छे  लोगों  की  जरूरत है बहुत उसको भी
तब  ही  जल्दी   उन्हें  भगवान   उठा   लेते हैं/3/

खुद  को   आजाद   खयालात   बताने   वाले
बात  बिन  बात  ही   संविधान   उठा   लेते हैं/4/

क्या हो हासिल जो बिरादर से ही तकरार करें
हम  यही  सोच  के    अपमान    उठा  लेते हैं/5/

इक  कहर  है   ये  वबा   दुसरी है भूख कहर
रोज  इसी    खौफ़ से   दिल जान उठा लेते हैं/6/

फायदा  आपकी  इस नेक दिली का हर कोई
आपसे    मिलने   के    दौरान    उठा  लेते हैं/7/

सेंधमारी   है   हुई     पेट   पे     सीधे   सबके
शाह    खैरात   में    जिंदान    उठा    लेते  हैं/8/

खूब शातिर हैं वो लफ्फाज मिजाजी हैं मियां
झूठी  खबरों  से   वो   तावान   उठा   लेते हैं/9/

कुछ नही सूझता जब  जोर मशक्कत  करके
चांद  तारों   से  ही    उन्वान    उठा    लेते हैं/10/

पल में  किरदार  बदल  लेते  हैं  दौलत वाले
रोज  हम   एक  ही   पहचान   उठा   लेते हैं/11/

वबा - महामारी
जिंदान - कैद बंदिशें
तावान - मुआवजा
उन्वान - विषय

फिरदौस की राहों में शरर देख रहा हूँ

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फिरदौस   की   राहों  में   शरर   देख  रहा हूँ
शैतानी    गुनाहों    का   कहर   देख   रहा हूँ /१/

खैरात भी  अब  मिलने  लगे  देख  के चेहरा
आवाक  मैं   आबिद  का  हुनर  देख  रहा हूँ/२/

रहती  है  जहाँ  खुश्बू  ही  बस  वो हैं लुटाती
मैं   बेटियों   की   ऊंची   डगर   देख  रहा हूँ/३/

परवाह   नही   जान  की  बस  पैसे  कमाने
यूँ  उलझे   हुए    सारे   बशर    देख  रहा हूँ/४/

इक  ओर   लदी   रेशमी   इक ओर से नंगी
दुनिया  के  मै  ये  दोहरे   मिरर  देख रहा हूँ/५/

लंबी है  ये फेहरिस्त बहुत शिकवे गिलों की
मैं  मौन   की   आहों  का असर देख रहा हूँ/६/

पर  लगते  परिंदे  तो  चले  अपने  सफर में
खालिक की छलकती सी  नजर देख रहा हूँ/७/

परछाई   तलक   छोड़    चली  देख अंधेरा
बुनियाद  के  हिलने  का  कहर  देख रहा हूँ/८/

मुंह  मोड़ने  के वास्ते सब  इतना तकल्लुफ़
वाजिब  से  बहाने   की  डगर  देख  रहा हूँ/९/

तस्वीर  से  करने  लगे  हैं  बातें  मियां  अब 
खामोश  हैं  लब  सारे   जिधर  देख रहा हूँ/१०/

बस अपने सिवा सबको समझती है ये मुर्दा
दुनिया  का  मै  ये  जोशे हुनर  देख  रहा हूँ/११/

मुद्दत  से  भरम  पाले   हुए  जी रहा  था मैं
मुझको  नही  था  देखना  पर  देख  रहा हूँ/१२/

फिरदौस - जन्नत
शरर - अंगारे
इबलीस - शैतान
खैरात - भीख
आबिद - इबादत करने वाले
मिरर - आइना
खालिक - निर्माण कर्ता
तकल्लुफ़ - औपचारिकता शिष्टाचार

तुम्हारे वास्ते मुश्किल नही था

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तुम्हारे    वास्ते      मुश्किल   नही था
तुम्हारा   पर   जरा  भी दिल नही था/1/

अगर  तुम  चाहते  तो  निभ ही जाता
मैं   चाहत  में  मगर  शामिल नही था/2/

हैं    बदले  बदले    से   सरकार  मेरे 
यूँ  लहजा  पहले तो चोटिल नही था/3/

वो  खुद कर लेता है हर फैसला अब
वो अब से पहले तो आदिल नही था/4/

वो  रहता  है  मुझी  में  सांस बनकर
मैं  ही  उसके जहन दाखिल नही था/5/

बदल   लेता  है   रस्ता   देख हमको 
वो  इतना  तो  कभी बेदिल नही था/6/

वो  सजदे में  इबादत में था शामिल
मगर   मेरा   कभी   मंजिल नही था/7/

न  बदला मैंने नंबर फिर भी अपना
यूँ  तो  उम्मीद  माशा तिल  नही था/8/

समझता  था    बखूबी   बेबसी  वो
जरा  मगरूर  था  जाहिल  नही था/9/

सिसकता था जफा करके बहुत वो 
सितमगर था मगर कातिल नही था/10/

नजर  आते  न  अब  मंजर  सुहाने
नजारत  यूँ  कभी बोझिल नही था/11/

वो  दुश्मन  है  मेरा  महबूब  भी है
मैं इतना पहले तो  क़ाइल नही था/12/

दुखाता है  वो अक्सर ही मेरा दिल
बहुत था शाद  जब माइल नही था/13/

ये आंसू और ये हिचकी और आहें
कभी इस तर्ह मैं  बिस्मिल नही था/14/

आदिल - जज /क़ाइल -प्रभावित /माइल - आसक्त /बिस्मिल - घायल

खौफ़ तर मंजर है सारा देखिए

2122 2122 212
खौफ़ तर    मंजर   है    सारा देखिए 
है  बहुत    दिलकश   नजारा देखिए/1/
 
बस  जरा  अंगड़ाई  कुदरत ने  है ली 
कांप  उट्ठा    जग      इशारा  देखिए /2/

देख  ली  हमने   बहुत   सी मस्तियाँ
अब  सबक   ईश्वर   के  द्वारा देखिए/3/

गल्तियां  हमसे  हुई  जो  अब तलक
खामियाजा    है      करारा    देखिए/4/

और  तो  सब   खैरियत  है मुल्क  में
बस   सियादत   है   नकारा   देखिए/5/

कश्मकश    जद्दोजहद   में  उम्र भर 
आदमी   खुद  से   ही   हारा देखिए /6/

शक्लों सुरत  से   भले   लगते  मगर
गर्दिशों   में   है      सितारा    देखिए/7/

मान  हर  रिश्तों  का  रखने के लिए 
कांधे  पर   ढोया    बिचारा   देखिए /8/

अपनी हर खुशियां जरूरत के लिए 
बीच   चौराहे   पे      मारा    देखिए /9/

टूट  चकनाचूर  हुआ अब के जिगर 
कैसे   संभलेगा    दोबारा     देखिए/10/

है  बड़ी   लाचार   बेबस     जिंदगी
पर  नही    कोई     हमारा   देखिए/11/

पूछते हो  हाल  क्या  है  बस मियां 
कैसे   होता  है     गुजारा    देखिए/12/

मर्म  जाने  ही  बिना  वो  कह  गये
हाल   बेहतर   है   तुम्हारा  देखिए/13/

दौरे फुर्सत का तमाशा देखिए

2122 2122 212 
दौरे  फुर्सत    का   तमाशा    देखिए
रोज  मुमकिन  है   जरा सा   देखिए/1/

दर्द  में  कुछ  और  इजाफा  हो गया
हर  कोई  अब  है   डरा  सा  देखिए/2/

सर  पे   रक़्साँ    बेबसी   लाचारियाँ
और  उस  पर  भी  दिलासा  देखिए/3/

ताकती   उम्मीद   दर   शामों  सहर
हासिली  में   बस    हताशा   देखिए/4/

झूठ  मक्कारी   मिले  हैं  हर  कदम
राज  इनका   अच्छा  खासा  देखिए/5/

कुर्सियों   पर   जम   गये  हैं  शोहदे
कैसे  गफलत   हो  खुलासा  देखिए/6/

हम  नही  हैं   पर    हमारे  नाम पर
हैं  पुरा   संसद    भरा  सा    देखिए/7/

चल गया  फिर से  नया कानून कह
हम  गरीबों   पर    गड़ासा   देखिए/8/

फिक्र  में  है  हुक्मरां मत फिक्र कर 
आप  बस  उनका  शलाशा  देखिए/9/

रोटियों  पर   भूख  पर   चर्चा  नही
रह  गया  मसला  ठगा  सा  देखिए/10/

कट गया  फिर से  तरक्की के लिए 
है  शजर  कितना  रूँआसा  देखिए /11/

क्यूँ   परिंदे    आसमां    मंडरा  रहे
पेड़  पर   था   घोंसला  सा  देखिए/12/

अब कोई  आता  नही  है इस डगर
राहे  उल्फत  है   सूना  सा  देखिए/13/

कद से तो  छोटा  बहुत  है आदमी
फिर भी ख्वाहिश बेतहाशा देखिए/14/

इंसानियत से बढ़ के खसारा कोई नही

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इंसानियत   से   बढ़ के   खसारा   कोई नही
इस  राह    रंजो गम  है   नजारा   कोई नही/1/

जद्दोजहद  यूँ  चाहे तू जितनी भी कर मियां
रहमो  करम     बगैर    गुजारा    कोई  नही/2/

गिरते  रहे   संभलते  रहे   अपने  आप हम
हम  जैसा   तो  नसीब  का  मारा कोई नही/3/

जुगनू   तलाश   करते  रहे  हम  उजालों में
इस  वास्ते    भले  ही    इजारा    कोई नही/4/

आंखों  में  सहमे सहमे  से  मंजर ठहर गये 
बोझिल थे ख्वाब फिर भी उतारा कोई नही/5/

फिर  फुरसतों की  आंच में मुद्दे पिघल गये
राहत    सुकून    चैन    इशारा   कोई  नही /6/

मौका  मिला  जिसे भी निचोड़ा है शौक से 
दुनिया में  मुफलिसी  का सहारा कोई नही /7/

भीतर से  घात  पर  है  तो बाहर से यार है
हर  शख़्स  पर  यकीन  खुदारा कोई नही/8/

हर आदमी है सोच से ज्यादा ही होशियार
अब आजकल कहीं भी बिचारा कोई नही/9/

इजारा - ठेका पट्टा लाइसेंस

आदमी बा वफ़ा नही होता

2122 1212 22
आदमी     बा  वफा     नही  होता
गलतियों   से      जुदा   नही होता/1/

जाविदाँ    है    कहाँ    कोई रिश्ता 
अपना   अपने    सिवा  नही होता/2/

रंज  है        दर्द  है        उदासी है
इश्क  में   और   क्या   नही  होता /3/

हर  कदम    मौत    ताकती   बैठी
बेवजह     हादसा      नही    होता/4/

चलते   रहते   हैं   काफिले   यूँ ही
वक्त   से   कुछ   बड़ा   नही होता/5/

फर्क    तारों   के   टूटने  पर  कुछ 
आसमां   को     जरा  नही   होता/6/

कह  गये   हम    उन्हें   खुमारी में 
तू  खुदा  है      खुदा   नही   होता/7/

होश  आया  कहा  जब  उसने  ये
वो   खुदा   एक   का   नही  होता/8/

दर्द   का     कैसे   होगा   अंदाजा
जब   तलक  तजरबा  नही  होता/9/

घुमते    रहते    हो    खयालो   में
पैर  में    दर्द   क्या    नही   होता/10/

कुछ नजरिए की बात भी है मियां 
दोष   नजरों   ही का   नही  होता/11/

खत्म   होते  हैं     गल्त फहमी से
दोष   रिश्तों  ही  का   नही  होता/12/

किसने देखा है किसे कौन कुचल कर आया

2122 1122 1122 22 
किसने   देखा   है   किसे  कौन कुचल कर आया
ऐसा   लगता   है  कि  हर  कोई उछल कर आया/1/

फिर   न  उठ  जाए  मेरी ओर  कहीं उंगली कोई 
अब  कि  आंखों में  मेरे  अश्क संभल कर आया/2/

एक  उम्मीद    ज़रा   रोशनी   की   बनती दिखी
देखने    शह्र   ये   सारा   ही   मचल कर आया/3/

अस्ल   किरदार   भला   कैसे  हो  पहचान मियां
हर  दफ़ा  इक  वो  नया  चेहरा बदल कर आया/4/

वक़्त   के  साथ   बदल   जाते  हैं अहबाब सभी
चांद  भी  अब कि दफ़ा  देखो पिघल कर आया/5/

खुश्बू   किरदार  की  बिखरी है यूँ इफ़रात मियां
मेरा   दुश्मन  भी    मेरे  पास   पहल  कर आया/6/

वो   मेरी  मौत  की   ख़्वाहिश   है  लिए सीने में
उसकी   गलियाँ   मैं   कई बार टहल कर आया/7/

आदमी    भूखे   न  मर  जाए    वबा  से  पहले 
इन दिनों ये भी नया  ख़ौफ़  निकल कर  आया /8/

इस  क़दर   इश्क़    हुआ   मुझसे  परेशानी को 
ढूंढते  मुझको  वो  घर  तक मेरे चल कर आया/9/

मिलने-जुलने से तो परहेज़ करो कुछ दिन तक
ऐसी  बातों  पे  भला  कौन  अमल  कर  आया/10/

देखता   ही   मैं   रहा   रास्ता   हर  वक़्त  मगर
वक़्त  हर  बार   मेरा  वक़्त   निगल  कर  आया/11/

Thursday, 1 October 2020

ज़िन्दगानी तरसती नहीं चाहिए

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ज़िन्दगानी    तरसती    नहीं    चाहिए
मौत  भी   इतनी   सस्ती  नहीं चाहिए

 ढूंढता   ही   रहा   हूँ   मैं   इंसानियत 
आदमियों   की   बस्ती   नहीं  चाहिए

देख ली मौजे दुनिया की सच्चाई सब
झूठ  है  सब  ये  मस्ती   नही  चाहिए

खुद को ही  ढूंढने की  जो नौबत पड़े
मेरे  मालिक  वो  हस्ती  नही  चाहिए

आदमी  आदमी  को  न   पहचाने वो
मर्म   की   तंगदस्ती    नही    चाहिए

क्या खता हो गयी क्यूँ गिले हो गये

212 212 212 212
क्या   खता  हो  गयी  क्यूँ  गिले  हो  गये
कह   रहे    लोग   हमको     बुरे   हो गये

फुरसतों   के   ये    लम्हे   कहर   ढा  रहे
अच्छे  खासे   भी   अब  सरफिरे  हो गये

बात  दिल  की  कही हमने दिल से मियां
आप   क्यूँ   इस तरह   अनमने   हो  गये

दोष  होता  नही  गलतियों  का  ही  बस
गल्तफहमी    में  भी    फासले    हो गये

वक्त   रहता   नही   है   कहीं  टीक  कर
कल  जो  अपने  थे  अब  गैर के हो गये

था  न  मुमकिन  बदलना  यूँ हालात को 
मन  बदल  कर  फिर हम ही नये हो गये

जिंदगी   से   तो   अनबन  रही  उम्र भर
मौत   से   भी    बहुत  से  गिले  हो  गये

देख   उनको    हुई   है    उदासी   बहुत
क्या  थे  कल  आज क्या देखिए हो गये

है  वो   रहजन   नया  है  सलीका  नया
तौर   अब   रहजनी   के   नये   हो  गये

कुछ  उजालों  में  उनको  गये  भूल हम
वज्ह   से   जिनके  रोशन  दिये  हो गये

देख कर रुख  बदलती हवाओं की अब 
जो   पराये   भी  थे   वो   सगे  हो  गये

रहती  है   फिक्र   बंदो  की   अपने उसे
रब   को   नाराज   मत  सोचिए हो गये

कब तलक हो सियासत की बातें मियां
छोड़िए   ये      पुराने      धड़े  हो  गये

हर गुलसिताँ है राएगा गर तितलियाँ न हो

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हर  गुलसिताँ  है  राएगा  गर  तितलियाँ न हो
मतलब  नही  है  जिंदगी   जो  मस्तियाँ न हो

मिलते  हैं   यार   रोज   बहुत  यूँ तो  आदमी
क्या  फायदा  है  जीने  का गर हमनवाँ न हो

गर   मुश्किलात   झेले   नही  दर्द  जाने क्या  
बेकार   है   हयात   जो   मजबूरियां   न   हो

सच्चाई  की  डगर  है  बहुत   कांटो  से  भरी
संभव  है  सीधी  राह  में  ये  सख्तियाँ  न हो

इक  जंग  रोज  लड़  रही सबकी ही जिंदगी
मुमकिन  है  सबके तन पे मगर वर्दियाँ न हो

कुछ दाग  फिर से  चांद पे  आए नजर मियां
मुमकिन  नही  है  उसपे कहीं फब्तियाँ न हो

मरता  नही  है  कोई  भी  अब  शर्म  से यहां
मिलता न कोई  जिसमें ये खुदगर्जियाँ न हो

दुनिया  जहां  की  फिक्र  न परवाह यार की
दुश्मन  मिले  हजार   ही   पर  बे कराँ न हो

मसला  शुरू  हुआ ही था की खत्म हो गया
खबरें वो बन न सकती हैं गर  सुर्खियां न हो

महबूब   ऐसा   चाहिए    हो   सादगी   भरा 
नखरे  मिजाज  नाज  न  हो शोखियाँ न हो

हालात  इस कदर  हुए  बदतर हैं आजकल
हर  बागबां  है  सोचता  गुलशन जवाँ न हो

ठंडी  हवाएं  आसमाँ   कुछ  धूप  भी  मिले 
रौनक नही वो घर में जहाँ खिड़कियाँ न हो

Wednesday, 16 September 2020

क्या कहें बात कोई बात नही

2122 1122 22/112

क्या कहें बात कोई बात नही
खुश नुमा शह्र के हालात नही

मुब्तिला लोग यहां है सब ही
हादसा  कोई  नयी  बात नही

हर कदम वक्त   दगा   देता है
आदमी की तो ये औकात नही

अब के आए हैं परिंदे छत पे
नासमझ  जानते ये जात नही

आज मेंहदी लगी है हाथों में 
इस बहाने  से  मुलाकात  नही

रात है स्याह  रहे क्या हो गया 
चांद के  सामने  औकात नही

जिंदगी  रोज  उलझ पड़ती है
जीने खातिर  तो ये हैहात नही

आंखें हरदम है बरसती रहती
शहर में  यूँ कहीं बरसात नही

अब जरूरत के तलब जारी है
जिंदगी ये  कोई  सौगात नही

रात  गुजरी है  अमावस जैसे
इससे  काली  कोई  रात नही

रोते  हंसते भले ही गुजरी है 
इससे बेहतर तो कोई बात नही

Tuesday, 15 September 2020

कट गई यूँ ही जिन्दगी अपनी

2122 1212 22
कट  गई  यूँ  ही जिन्दगी अपनी
बस  नजर  आयी बेबसी अपनी 

हम  तरसते  रहे  हंसी  के  लिए 
मुँह  छुपाये  रही   खुशी  अपनी 

जिनसे  उम्मीद थी वफाओ की
उसने  की  खूब  दुश्मनी अपनी

वो      फरेबो  का    कारबारी है
मात  खाती  है  सादगी   अपनी

वो तो उल्फत को खेल कहते है 
हम  जिसे  समझे बंदगी अपनी

हाल  दिल  के  बयां है  चेहरे से
हमको  मालूम  है  कमी अपनी 

इक हंसी को था  जिंदगी  माना
सौप दी  उसको ही हंसी अपनी

ठहर गये थे जरा हम कि माजरा क्या है

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ठहर  गये  थे   जरा  हम   कि  माजरा  क्या है 
क्यूँ   सहमे सहमे  से हैं लोग फिर हुआ क्या है

क्यूँ   ढूंढता   है  फिरे   आज  शहर  सारा  ही 
ऐ  जिंदगी  तुझे  जीने  का  तौर नया   क्या है

किसी  से   कोई  यहाँ   बोलता  नही  है  कुछ 
दिलों  के  दरमियाँ  देखो  ये  फासला  क्या है

यूँ   मानिए   तो   यहां   सारे   लोग   अपने हैं 
न  मानिएगा  तो    आपस  में  राब्ता   क्या है

यूँ  हमने  देखा  है  बारिश  में  भीगता  सुरज 
मगर  न  जानते  हैं  हम  कि  तर्जबा  क्या है

कि  सुब्ह  शाम  में   ही   जिंदगी  तमाम हुई 
हैं बेखबर कि ये जीवन का फलसफा क्या है

जमात   जात   मिले   शहर   में   मेरे  मौला
बताओ   आदमी   होने  का   रास्ता  क्या है

कितने अरमान हुए दफ्न रोज सीने में

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कितने  अरमान   हुए  दफ्न   रोज  सीने में
यार  मुश्किल  है  बहुत जिंदा रहके जीने में

यूँ  उसूलों  के  जनाजे निकलते  हैं हर दिन 
खुश्बू  आती नही गैरत  की  अब  पसीने में

देखा साहिल पे  खड़े हो के हमने तुफां को 
हम  न  डूबे  कभी  मौजों के इस सफीने में

खैरियत है  यूँ तो  सब  मुल्क में मेरे साहब 
लुत्फ़  आता  है  सियादत को खून पीने मे

भुख से कैसे हो समझौता बेबसी का मियां 
दर्द  सीने  का   झलकता  है   आबबीने में 

देख  फेहरिस्त  तकाजों की सोचता है मन
पहली  तारीख  क्यूँ  है आती हर महीने में

या खुदा अब जरा हालात को बेहतर कर दे

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या  खुदा  अब  जरा  हालात  को   बेहतर  कर दे
दूर  कर  खौफ़   दिलों  से   हंसी   मंजर    कर दे/1/

दिल  है  बेचैन     बहुत     रोज   तमाशा   करके
दोहरे  किरदार  से   फ़ारिग   मुझे   रहबर  कर दे/2/

मन  ये  उकता  सा  गया  है  बड़ा  रह कर घर में
फिर  से  माहौल  को  पहले  सा  ही  सुंदर कर दे/3/

रोज  इक  हादसा   बरपा  है  कहर  बन के  यहाँ 
अब  तो   ये   खौफ़ जदा   दौर   मुअत्तर   कर दे/4/

ना   दिखा   और   बिलखती   हुई   तस्वीर  कोई
छीन  ले   आंख  से    बीनाई  तू   पत्थर   कर दे/5/

हर  तरक्की   है   सुबकती   खड़ी   लाचार  यहां
अब तो फ़ाजिल से कहो साफ वो पिक्चर कर दे/6/

सोग  के  घर  में   बयानों   के  है   मातम   पसरे
ये  सियासत   कहीं  हालात   न   बदतर   कर दे/7/

नींद   आयेगी    भला   कैसे    उसे    सांझ  ढले
झूठ  के  मुंह  पे   कोई  स्याह  सी  चादर  कर दे/8/

फिर  अना  लेने  लगी  जोश  में  अंगड़ाई मियां
फिर सनक  कोई  न  रिश्तों को ही जर्जर कर दे/9/

दीद   को    तेरे    तरसती   है   निगाहें   कब से
अब  मुकम्मल   मेरी  ये  आरजू   परवर  कर दे/10/

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मंजर - दृश्य /फ़ारिग - मुक्त /मुअत्तर - खुशबूदार/
बीनाई - दृष्टि /फ़ाजिल - बहुत विद्वान /

अपनी ही साख से बिछड़ा हुआ पत्ता हूँ मैं

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अपनी  ही  साख  से  बिछडा  हुआ पत्ता हूँ मै
दिल  जरा   पास  तो  आ  खूब  ही तन्हा हूँ मै

रोज ही  ख्वाब  को  बेचा  है  जरुरत  के लिए 
वक्त से   जूझता   बेबस  सा   वो  लम्हा  हूँ मै

अपने  मतलब की  सभी  बांट लेते  आपस में 
घर  पे  आता  है  जो  अखबार का  पन्ना हूँ मै

कल जो बुनियाद था घर का उसे भूले है सभी
राएगा   फालतू  सा   अब   कोई  रिश्ता  हूँ मै

शह्र में  सबने  तगाफूल है किया जिसको सदा
वो   सियासत  का   उछाला  गया   मुद्दा  हूँ मै

जैसे   पैबंद   लगा  हो  कोई    मंहगा  कपड़ा 
यूँ  समझता  हूँ  मै  खुद  को  कोई धोखा हूँ मै

जिंदगी   खुब   ही   शिद्दत  से  तपी  है अपनी 
कश्मकश  मे  ही जरा फिर भी तो उलझा हूँ मै

चुभती   जह्न   में   है   कहकहो  की  आवाजें 
दायरों  में   ही   बंधी   सोच  मे   फिरता  हूँ मै

मिलती नही कहीं भी खुशी है उधार में

221 2121 1221 212 

मिलती  नही   कहीं  भी   खुशी  है   उधार में
लाखों   मिलेंगे    आपको     बेबस   कतार में /1/

बर्बादियों  में   मेरे   तो   वो   भी   शरिक  था
गुजरी  है   उम्र   जिसके   फकत  इंतेजार  में/2/

कीमत  हमेशा   ख्वाब  की   ज्यादा  रही  मेरे
औकात    कब    रहे    हैं    मेरे   इख्तियार में/3/

गहरी  कही  है   जो  भी  कही   बात  यार  ने
रख्खा है  क्या  भला  कहो  नफरत में  रार में/4/

हर शख़्स उलझनों में ही उलझा हुआ है जब
फुर्सत है  कौन  जिसके  है  नफरत विचार में/5/

ताजिर  नफरतों  के  कुछ करते हैं मुझपे तंज
निखरा  हूँ   और   तप  के  मैं  यूँ  बार बार में/6/

रिश्तों  के  दरमियाँ    न  यूँ   दीवार   किजिए
है  लुत्फ़  इक  अलग   जरा  अपनों से हार में/7/

रख्खे  है   सर  पे   हाथ    मेरा  श्याम सांवरा
चलती  है     जिंदगी      इसी    दारोमदार  में/8/

सर छिपाने को ठिकाना ढूंढता है

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सर  छिपाने  को    ठिकाना      ढूंढता है
अब   परिंदा     आशियाना      ढूंढता है/1/

थक गया  दर दर भटक कर उम्र भर वो
अब  सुकूं  का     शामियाना    ढूंढता है/2/

धूप में  झुलसाता  है  वो  जिस्म अपना
ठोकरों  में       आबो दाना      ढूंढता है/3/

शाम  को    घर  लौटता  वो   है  पशेमां
फिर    सुनाने   को    बहाना    ढूंढता है/4/

मुतमईन   किरदार   मेरा  है   न  मुझसे
वो  नया   हर  दिन   फसाना   ढूंढता है/5/

कौन अब समझाए दिल को दे तसल्ली
दोस्त  ये   अब  तक   पुराना   ढूंढता है/6/

जो  गया  वो  लौट कर   आता  नही है
जान कर  भी  क्या  जमाना    ढूंढता है/7/

घरों ही घर मिले दीवार देखने के लिए

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घरों   ही   घर   मिले  दीवार  देखने  के लिए
कि  रह   गये   यही  संस्कार  देखने  के लिए/1/

बस एक धोखा ही खालिस खरा मिले है यहाँ 
मिलावटी  है   सभी   प्यार   देखने  के  लिए /2/

सुखनवरो  के  दिलों  को  खंगाला जब हमने
कुछ अधजले  मिले  अशआर देखने के लिए/3/

बला   का    दर्द    उढ़ेला    है   गज्ल गोई में
कि  कौन  कितना है गमख्वार देखने के लिए/4/

कभी  जो  जिंदगी  की  धूप  ने  सताया  मुझे
निकल  पड़ा   मैं  भी  खुद्दार  देखने  के लिए/5/

जमात   जात   है    पर  आदमी    नदारद  है
कहाँ  को  जाएं   ये   दिलदार  देखने के लिए/6/

बड़ा   अजीब   है   किस्सा   मेरी   तबाही का
न  आए   दोस्त  भी   बीमार  देखने  के  लिए/7/

तलाश  करती  हैं   उम्मीद   अपने  ही  टूकड़े
ठिठक  ठिठक  के  ही हर बार देखने के लिए/8/

आग पानी में मुहब्बत नही होने वाली

2122 1122 1122 22 
आग   पानी   में   मुहब्बत   नही   होने   वाली
ये   असंभव   सी   शरारत   नही   होने   वाली/1/

लाख  कर  ले  तू  उगाने  के  जतन शम्स यहां
सुब्ह  अब  इतनी  भी  उजलत नही होने वाली/2/

करके भयभीत  झुका सकते हो दुनिया लेकिन
इस  तरह   आपकी   इज्जत  नही  होने  वाली/3/

मामला   चाहे   वो   संगीन   रहे   कितना   भी
मुल्क  में    बंद   सियासत   नही   होने   वाली/4/

शाख  से  अपनी  बिछड़ कर कहाँ रह पाया वो
फूल  की  कल  से   अयादत  नही  होने  वाली/5/

ये  अंधेरा  रहे  कायम  चाहे  जब तक भी यहाँ
रात  से   कोई    शिकायत   नही   होने   वाली/6/

जिसको हर शख़्स में बस हिंदू मुसलमान दिखे
ऐसे  किरदार  की   खिदमत  नही  होने  वाली/7/

ख्वाहिशें  कर लो  मुकम्मल जो अधूरी हैं अभी
मौत  के   पास  तो   मोहलत  नही  होने  वाली/8/

सुधारों अब दशा भगवान तेरे दर्शन की ख्वाहिश है

1222 1222 1222 1222 
सुधारों   अब   दशा  भगवन   तेरे   दर्शन  की  ख्वाहिश है
पड़े  हैं    सुने   सब  मंदिर   तेरे   कीर्तन  की   ख्वाहिश है/1/

हुए    बेचैन   अब    घर   में   ही    रह  हम   बंदियों  जैसे
खुले   वातावरण  में  अब   जरा   विचरण की ख्वाहिश है/2/

भरा  है   मन    बहुत     संवेदना हिन    देख   लोगों   को
व्यथित मन में  बहुत अब  शोर की  क्रंदन की ख्वाहिश है/3/

हुई  क्यूँ   ऐसी  ये  दुनिया   भला  कारण है  क्या  इसका
इसी पर  अब मनन की  और गहन चिंतन की ख्वाहिश है/4/

जगत    जकड़ा    हुआ    अज्ञानता  के     घोर  अंधेरों में
उजालों  की  नयी  किरणों के  अब सृजन की ख्वाहिश है/5/

अजब  सी  इक  हवा  का  डर  है   पसरा  सबके हृदय में
सभी  खुशहाल  और   भयमुक्त हो  ये मन की ख्वाहिश है/6/

तेरे   चरणों   में   ही    दिन  रात    मेरे    जैसे   हों   गुजरे
तेरे  दर  पर  ही  निकले  दम   मेरे  जीवन की ख्वाहिश है/7/

मनाएँ   फिर   तेरा   उत्सव    बड़े    हर्ष और उल्लासों से
तू कर दे पहले सी दुनिया ये अब जन जन की ख्वाहिश है/8/

नही  हो    भेद    रत्ती   भी    किसी   के   वास्ते    मन में
दिखे  चहुंओर  बस  सौहार्द  इस  किंचन  की ख्वाहिश है/9/

खड़े  हैं   दर  पे  तेरे   बन के  याचक   हम  प्रभू  कब से
दरस  की   लालसा   ही   बस   प्रभू   निर्धन  ख्वाहिश है/10/

नही   राधा    नही   मीरा    सुदामा    ना    मैं    उद्धव हूँ
मै  अदना  हूँ   अकिंचन  हूँ  तेरे  चरनन  की  ख्वाहिश है/11/

भंवर  में   है  फंसी   नैया   लगा   दो   पार   हे  भगवन
बड़ा  बेबस   हुआ  है  आमजन  वंदन  की  ख्वाहिश है/12/

उठी  है     हूक  सी    मन  में     तुम्हारे   द्वार  आने की
लगी  जो  प्यास  दर्शन की बुझा नयनन की ख्वाहिश है/13/

लोग ईश्वर के नही धर्म के चाकर निकले

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लोग   ईश्वर   के नही  धर्म  के   चाकर  निकले 
जिसको  समझे  थे  बहुमूल्य वो पत्थर निकले/1/

अब तो रंगों के भी खुश्बू के भी तय है मजहब
आदमी माथे पे अब आदमी लिख कर निकले/2/

पाक  दामन  कहाँ  किरदार  मिले  अब  कोई 
इन  जुबां  वालों  से तो  बेजुबां बेहतर निकले/3/

फिर   तमन्नाएं   बहुत   रोयी हैं   मजबूरी  पर
फिर  से  त्योहार  सहमते  हुए डर डर निकले/4/

आदमीयत   भी    पशेमान   हुई   है   फिर से
रखके पहलू में ही कुछ यार जो खंजर निकले/5/

बस  यही  सोच   बना  देती  है   मुझको गूंगा
मेरी आवाज़ से  अब कौन सा  महशर निकले/6/

घर से निकलो तो जरूरत को छिपाके निकलो
उंगलियों  पर  ही  नचाने  तुम्हें  रहबर निकले /7/

आंसूओं के हिसाब कौन रखता है

आंसूओ   के   हिसाब   कौन   रखता है 
हाथ    सुखे "  गुलाब"   कौन  रखता हैं 

होंगी    मजबूरियाँ   कोई   यकीनन  ही 
वरना  सर  पे   अजाब  कौन  रखता है

अब  न  फबती  उदासियां  है चेहरे पर 
हर  घड़ी   यूँ   नकाब   कौन  रखता है

ढुंढ  ही  लेती  हैं   ये   मुश्किले  हमको 
चाह   करके    जनाब   कौन  रखता है

अपनी ख्वाहिश है धूप बस ये मुट्ठी भर 
अपने  घर   आफताब  कौन  रखता है

बरसी  है   बेहिसाब  ही  तसल्ली  अब
इतने   झुठे    हुबाब    कौन   रखता है

शिकवे    बेचैनियां   ये  आरजू उम्मीद 
साथ   इतने   सराब   कौन    रखता है

मुस्कुराहट    सुकून   चैन   के   किस्से
दर्द  के   इतने  ख्वाब   कौन  रखता है

मंजर ही हादसों का अजीबो गरीब था

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मन्जर  ही  हादसे  का  अजीबो गरीब  था 
निकला अदू भी वो ही जो सबसे करीब था

सौदा  न हो सका  कभी हमसे ये इश्क का
मंहगी थी उल्फतें ये दिल अपना गरीब था

मजबूरियों  बेचैनियों   का   नाम   जिंदगी 
खामोश सा निबाह भी  कितना अजीब था

सस्ती  जनाब जीस्त है  मंहगी है ख्वाहिशें 
अक्सर ये खाली जेब ही अपना नसीब था

ढुंढा  नही मिला कहीं  हमको  तो  आदमी
खोया  हुआ सा  जात  में  मेरा  हबीब  था

अंधे  सुझाते   राह है   बहरों  की   भीड़ में 
गुंगो  के मुंह से गीत  ये कितना अजीब था

दर्द पर आंसूओं के पहरे है

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दर्द  पर    आंसूओं   के    पहरे हैं 
आ  के  ये   कोर  पर  ही  ठहरे हैं 

चोट  चाहे   कहीं  भी  हो  लेकिन
रब्त   दिल  से   बहुत  ही  गहरे हैं 

अब सदाएं भी दे तो क्या किसको
सब   यहाँ  पर   तो   गुंगे  बहरे हैं 

कौन  से  ख्वाब  छोड़ दूँ  मैं भला
ख्वाब   सारे     बहुत    सुनहरे  हैं

जो   गुजारी   है    जिंदगी   हमने
अच्छे  अच्छे   भी   देख  सिहरे हैं 

जितने किरदार आजकल है मिले
सारे    मायूस   से    ही    चेहरे हैं

दफ्न  हर  राज  कर लिए लेकिन
दाग अब  की   कफन  पे  गहरे हैं

खुद को शायर तो कह नही सकते
बस  ये  कुछ   शे'र  से  ककहरे है

क्या है अच्छा बुरा क्या है मन के लिए

212 212 212 212 
क्या है अच्छा बुरा क्या है मन के लिए
है  कहाँ  वक्त  इतना  चयन  के   लिए

उम्र  गुजरी  है   जद्दोजहद  में  ही  बस
आदमी  जी  रहा  है  तो  धन  के  लिए

मौत का खौफ़ भी क्या अजब खौफ़ है
बस  हवा  ही  बहुत  है शिकन के लिए

कल जो कहते थे फुर्सत नही मरने की
जीने  खातिर  हैं  बैठे  भजन  के  लिए

काफियो  में  ही   उलझे  रहे   उम्र भर
कुछ  सलीका  न आया सुखन के लिए

क्या जरूरत है  नश्तर चुभाने की  अब
तल्ख  लहजा  बहुत  है  चुभन के लिए

इन दिनों  कह  रहे हैं  वो  अच्छा  बहुत
कह  रहे हैं   मगर  बस  कहन  के लिए

फर्क  कथनी  में  करनी  में  उनके मिले
कब  कहा  है   उन्होंने   मनन  के  लिए

दब   गयी   फाईलों   में    सभी   राहतें  
रह  गये   आंकड़े   आमजन   के  लिए

लाख दिल में शिकायत रखो  तुम मगर
कुछ  मुहब्बत  भी  तो हो वतन के लिए

मुल्क   की  आन  में  गर  जरूरत  पड़े
खूं  है  हाजिर  मेरा   आचमन  के लिए

बैठकर  एसी  कमरों  में लिखते  गजल
अब सुखनवर मिले बस सुखन के लिए

साफ़ मन चाहिए साफ मन के लिए

212 212 212 212 
साफ   मन  चाहिए  साफ मन के लिए
पालिए   यूँ  न   नफरत  पतन के लिए

फूल  खूशबू से  गुलशन ये गुलजार हो
है  महकना   जरूरी   चमन   के  लिए

क्या  हुआ   गर   परेशान   हैं  जिंदगी
कुछ  नया  तो  नही  आदतन  के लिए

हसरतें   उम्र  भर   ही  रहे   आंच  पर
है ये मुश्किल बहुत  आमजन के लिए

कहने  सुनने  की  बस  बात होने लगी 
कुछ कहा ना किसी ने भी मन के लिए

हक बयानी  की  बातें  बहुत  हो  चुकी
क्या किया कुछ कहो तो वतन के लिए

मुल्क को इस समय  इसकी दरकार है
ये   लहू   मेरा  लो  आचमन  के  लिए

उम्र  भर    खुश्बुओं  में   नहाता   रहा
तू   महकते  हुए   एक   तन  के  लिए

रूह  फिर  भी  महकने  न  पायी तेरी
ये  जरूरी  नही  था   बदन   के  लिए

मसअलो  के  भी  चेहरे  बदलने  लगे
अब  कहाँ  शोर  है  आमजन के लिए

झंडे बैनर को रख लो जतन कर जरा
काम  आयेंगे  ये  ही  कफ़न  के लिए

भूख    रोटी   के    मुद्दे    पुराने   हुए
अब  नये  लाओ  नारे सदन  के लिए

चांद पर तब्सिरा नही आता

2122 1212 22 
चांद   पर    तब्सिरा    नही    आता
हां  मुझे   कुछ   जरा   नही    आता

दिल  ये  कमबख्त  मिल गया तुझसे
रास    अब     दुसरा    नही    आता 

कुछ  यकीनन  कमी  है  मुझमें   जो 
लौट  कर   फिर   गया   नही  आता

उम्र    से    पहले    उम्र    देखी    है
आप  कहते  हो   क्या   नही  आता

वक्त   गुजरा  है  उसको  गुजरे  हुए 
अब    हमे    बचपना   नही   आता

लोग   अदबी   की    बात   करते हैं
पर   सलीका    जरा    नही   आता

शोर  करती  है  खामुशी  भी   बहुत
क्या  है   गर   बोलना   नही  आता

प्यार   तुझपे    तो   खूब   आता  है 
बस   मुझे    चोचला   नही    आता

क्या   बिछड़ना   जरूरी   था   तेरा
क्या   तुझे    रूठना    नही   आता

दिल से निस्बत है हर नजरिया मेरा
हाँ    मुझे    सोचना    नही   आता

हर  कदम   पर  ही   चोट  खाएं हैं
पर   कोई  भी   नशा   नही  आता

अब  तो   आते  हैं   फैसले   सीधे 
अब  कोई   मशवरा   नही   आता

चाहता  था  कि   हादसा  हो  कोई
तुझसे  मिल कर  नया  नही  आता

यूँ भी उसने बरगलाया देर तक

2122 2122 212 
यूँ  भी  उसने   बरगलाया   देर तक
आने  की  कहकर न आया देर तक

उनकी खातिर तो ये ठहरी मसखरी
इस  अदा  ने  दिल दुखाया देर तक 

कुछ  मुरादों  के  मुकम्मल  के लिए 
दर ब दर  मैं  सर  झुकाया  देर तक

की  बड़ी शिद्दत से  कोशिश बारहा 
पर  न  उसको  भूल  पाया देर तक

साथ  सुनते  थे  कभी जो गीत हम 
अब  मै  तन्हा  गुनगुनाया  देर तक

बस   जरा  सी   देर   आने  में  हुई
मां  ने  घर  में  जी  उठाया देर तक

कुछ हुनर  सिखला  दिये थे बापू ने
जिंदगी  में   काम   आया   देर तक

दर्द   को  भी  दर्द  जब  होने  लगा
देख  कर   मैं   मुस्कुराया   देर तक

झूम कर बरसे हैं बादल आज फिर 
छप्परों   ने   घर   बचाया   देर तक

एक  है   ओढ़ू  बिछाऊं  क्या  करूँ
भीगे   चादर   ने   रूलाया  देर तक

कुछ    तमन्ना   आरजू    उम्मीद में 
घिर  के  दिल ये छटपटाया देर तक

सिमटी हुई सहमी सी सकुचाई हुई गजलें

221 1222 221 1222
सिमटी   हुई   सहमी   सी   सकुचाई    हुई   गजलें
अहसास    में   भीगी   सी    लरजाई   हुई   गजलें

अब   आज   नही  मिलती   लरजाई   हुई   गजलें
अब   आने   लगी   है   बस   मुरझाई   हुई  गजलें

सौ  तर्ह  की  ही  उलझन  जब  जह्न में  चलती हो
फिर    कैसे  कलम   लिक्खे   शरमाई   हुई गजलें

ढूंढे   है    जहां    मेरी    गजलों   में   तुझे  हरदम
गजलें    न    हुई    जैसे     परछाई    हुई   गजलें

दुत्कार    लताड़ों    पर    भी    साथ   नही   छोड़े
इस    तर्ह    मेरी    जानां     शैदाई    हुई    गजलें

है   शोर  शराबा   बस   कुछ  और  भला  है  क्या
इस   दौर   में   फूहड़ पन   से   गायी   हुई  गजलें

देखा   है    बहुत    मंचों   पर   नाम   दराजों   को
पढ़ते    हुए    चुपके   से    सरकाई   हुई    गजलें

हर  लफ्ज़  को  शिद्दत  से   अहसास  ओढ़ाया  है
देखा  ही   किसी  ने   कब   ठुकराई   हुई   गजलें

कथनी   और   करनी  में  जब  फर्क  मिला  बेहद
आयीं  हैं   कुछ  ऐसी  भी    भरमाई   हुई   गजलें

शिद्दत  से   निचोड़ा  है  दिल  अपना  सुखनवर ने
पर   रास   न   आयी   फिर   बिसराई  हुई  गजलें

सब  कुछ   बदल  करके   रख  देंगीं  घड़ी  भर में
इस  तौर  से    आयीं   है    गुस्साई    हुई    गजलें

अब दिल की नही कहती अब दिल से नही कहती
दरबारी    हुई    गजलें    पजीराई     हुई    गजलें

तेरी पनाह में मेरे ये जिस्मों जान रहे

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तेरी   पनाह  में   मेरे   ये  जिस्मों  जान  रहे
न  हो  जमीन   या   चाहे  न  आसमान  रहे

न  इल्तिजा  न  गुजारिश  है  कोई और मेरी
बस  एक  तू  ही  खयालों में शब बिहान रहे

जुदा  न  होना  कभी   चाहे  जो  सजा देना
सफर  के  वक्त  तू है  बस  ये इत्मीनान रहे

तू   मेरे    पास    रहे    इसलिए    जरूरी है 
तमाम   उम्र  ही    चलता  ये  इम्तिहान  रहे

कुछ और बात भले हो न हो किसी से कोई
मेरी  जुबां  पे   तेरा   हर  घड़ी  बखान  रहे

हर  एक   कतरा   तेरा  नाम ही पुकारे बस 
अगरचे    जिस्म    सरापा    लहूलुहान  रहे

तमन्ना आरजू उम्मीद धोखा चीज क्या है जी

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तमन्ना   आरजू   उम्मीद   धोखा  चीज  क्या  है जी
गुमां  जाता  रहा  मेरा  कि   रिश्ता चीज  क्या है जी/1/

जरूरत  ने  भगाया इस कदर  है  उम्र  भर  मुझको
भुला  बैठा  तसल्ली क्या है सपना चीज क्या है जी/2/

मै  बस  जद्दोजहद में  कश्मकश में  ही  रहा उलझा
कभी भी जान  न पाया  कि  जीना चीज क्या है जी/3/

जुबां कुछ  और दिल में और  दोहरेपन जो जीता है
भला  कैसे  वो  बतलाए नजरिया  चीज क्या है जी/4/

मेरी अम्मा  मेरी अम्मा जो कह कर कल झगड़ते थे
बड़े   होकर  वही  कहते हैं  अम्मा चीज क्या है जी/5/

कहीं  आंधी  कहीं  बारिश  कहीं  पर हादसा बरपा
हजारों   राह   महशर  के  करोना चीज क्या है जी/6/

संभलता  एक  ही  हमसे  नही  किरदार  है अपना
तुम्हारे  वास्ते  दस  बीस  होना  चीज  क्या  है  जी/7/

मचा लो  शोर भी  कितना  चला लो प्रोपेगेंडा कुछ
खबर है मुल्क को खालिस बनना चीज क्या है जी/8/

जो  अपनी  ही  कहानी  में  रहा गुमनाम है हरदम
भला  कैसे  बतायेगा  कि किस्सा चीज क्या है जी/9/

बहुत  कुछ  जान  पाने में रहा नाकाम हूँ अब तक
पिता  होते तो बतलाते  ये दुनिया चीज क्या है जी/10/

बस इतना बहुत हौसला कर लिखा है

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बस इतना बहुत   हौसला  कर   लिखा है
हर इक जा पे उनको  सितमगर लिखा है/1/

शिकायत अब इस बात पर भी है उनको 
कि हमने  तआर्रूफ  कमतर    लिखा है/2/

कहीं   भूख   लाचारियाँ   बस   लिखीं है
जरूरत  से  ज्यादा   कहीं  पर  लिखा है/3/

तकाजो   की  भट्टी    सुलगते  है  अरमां 
भला   किसने   ऐसा   मुकद्दर   लिखा है/4/

फकत  चार  दीवारे   और   बामो  दर है
न  खुशियां  न  आंसू  मयस्सर  लिखा है/5/

नदारद    सभी    रब्त     जज्बात   सारे
जरूरत   ने  ही  बस  उसे  घर  लिखा है/6/

जिधर   देखिए    बस    दरिंदे    दिखे हैं
घरों  घर   यहां   आदमी  भर   लिखा है/7/

चला  था  जहाँ   जीतने   सरफिरा  इक
किताबों  में  उसको   सिकंदर  लिखा है/8/

न  मरती   यहां  पर   है   उम्मीद   कोई
तभी  इस  जगत  को  चराचर  लिखा है/9/

जरा   सख्त   करने    लगे   फैसले  वो
तो अखबार ने  उनको हिटलर लिखा है/10/

खुशी हो कि गम  भर ही आती है आंखे
तभी    शायरों   ने    समंदर    लिखा है/11/

कोई  भी  न  इतना   मुकम्मल  हुआ है
लिखा जिसने जो भी नया पर लिखा है/12/

जरा सा  भरम  भी तो  रहने दो दिल में
कुछ अच्छा सा हमने  यहाँ पर लिखा है/13/

हुए मजबूर क्या क्या देखने को

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हुए  मजबूर   क्या  क्या  देखने  को
कभी  तू  भी  चला  आ  देखने  को/1/

तमाशा  इक  नया   हर  रोज  ही  है 
तरसती  आंखे   अच्छा   देखने  को/2/

जमीं  तरसी है  बारिश के लिए  ज्यूँ
यूँ   तरसे   हम   उजाला  देखने को/3/

हैं चिपकी खिड़कियों पर ही निगाहें 
भला  सा  कुछ   नजारा  देखने को/4/

जिधर भी  देखिये  महशर  है बरपा
यही  क्या  रह  गया  था  देखने को/5/

बड़ा  होना  बहुत  मुश्किल है प्यारे
पड़े   है   घर   समूचा   देखने   को/6/

तमन्ना    आरजू    उम्मीद    धोखा
है  क्या  इसके  अलावा  देखने को/7/

वही   दो   चार   जुमले    हैं  पुराने
मिला कुछ भी नया क्या देखने को/8/

बड़ी  जद्दोजहद  के  बाद   जाकर 
मिला  है  आज  मौका  देखने  को/9/

जो  पेश आती  है तस्वीरें जहाँ की
नही  चाहा  था   ऐसा   देखने  को/10/

बदलते  दौर  बदली  है   सियासत
मिले क्या क्या नजरिया देखने को/11/

हमल में ठीक था नवजात बनकर
बशर आया क्यूँ  दुनिया देखने को/12/

नही मिलता यहां पर  आदमी बस
दरो  दर  है   फरिश्ता   देखने को/13/

रवायत  है   चलन   दस्तूर   है  ये
नफस  बेबस  खुदाया  देखने  को/14/

सुकून चैन का कब से है इंतजार मुझे

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सुकून   चैन   का   कब   से   है  इंतजार  मुझे
भटक   रहा  हूँ   कहीं   तो   मिले  करार  मुझे/1/

कदम  कदम  पे  ही  मिलती  रही है  हार मुझे
हर  एक   मौज   खुशी  है  मिली  उधार  मुझे/2/

तमाम   उम्र   ही    जद्दोजहद    में   गुजरी  है
खुलूसे  दिल  से   मुकद्दर   कभी  पुकार  मुझे/3/

कभी  तो  मुझको  भी  मौका  दे मुस्कुराने का
सता   रहे  हैं   यूँ   दिन  रात  गम  हजार मुझे/4/

तरीके   तौर    रवायत    निभाने   के   खातिर
तलाश  करते  हैं   शिद्दत  से   रोज  यार  मुझे/5/

जले   है    हाथ   मेरे    तो    चरागां   करने में
हो   अपने  आप   में  भी   कैसे  एतबार  मुझे/6/

रजा   बगैर   भी   आते   हैं   वो    खयालो में 
नही  है  दिल पे अब इतना भी इख्तियार मुझे/7/

पकड़ के उंगली मेरी चल रहे थे जो कल तक
समझ  रहे  हैं  वो  बच्चे  ही  अब  गवांर मुझे/8/

कदम  कदम  पे   नजर  आयी  भूख  बेकारी
दिखाई  दी  न   कहीं  पर   कभी  बहार  मुझे/9/

मेरी  कलम  से  निकलते हैं रंजो गम ही सदा 
समझते   जहन  जदा   लोग  है  बिमार  मुझे/10/

लिखूं क्या उसके लिए जिसकी मैं लिखावट हूँ 
हुआ है  खुश  वो पिता  हर समय संवार मुझे/11/

जुगनूओ से ही अंधेरों को मिटाने वाले

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जुगनूओ से ही अंधेरों  को  मिटाने  वाले
है  कहां  आज  भला  बात  बनाने वाले

क्या  भला  साथ  निभाएंगे भुलाने वाले
राह में  छोड़ के  जाएंगे  वो  जाने वाले

लद गए दिन वो वफाओ के निभाने वाले
अब कहाँ मिलते हैं वो शख्स पुराने वाले

रात  भर  राह में  बैठे  थे  चरागां  करके
पर  खबर ही  न लगी कौन थे आने वाले

ये  हवाओं  में  अभी  गर्द नजर  आती है
क्या  शहर  छोड़  चुके  शोर  मचाने वाले

इक दिया  रोज  मुंडेरों पे  जला करता था
जाने  क्या  बल्ब से घर अपने सजाने वाले

ईंट  गारो  से  भला  कौन  यहां  मिलता है
घर  में  रिश्ते  है  जरा  खास  पुराने  वाले

सो गए सुनते ही फटकार फकत गुरबत के
तिफ्ल  ने   देखे   नही  लाड़ लड़ाने  वाले

अब  परिंदे  भी   वहां  आने  से कतराते हैं
ताक  में   रहते  सदा   जाल बिछाने  वाले

शाख पे चांद वो अटका जो जरा पल पर को
थाम  कर   बैठ  गए  दिल  ये  जमाने  वाले

रात  बैठी    है   इंतजार   सहर   का  करते
रह  गए   जाने  कहाँ   रात  को  लाने  वाले

जो  यहां   बोते   मुहब्बत   थे  उगाते  खुश्बू
अब  नजर  आते  न  वो   अम्न  जगाने वाले

रूठ  तो  जाए  मगर  आज  ये  डर लगता है
अब  नही  रहते   यहां  कल  से  मनाने  वाले

अब के  त्योहार  में  बच्चों  को  नये  कपडे़ दूं
सोंचते   रह     ये  गये    रोज   कमाने  वाले

जगमगाते    हुए    दीयों से    शहर   रौशन है
देख  पाए    न    तले     दीप     जलाने वाले

कैसे   मै   भेज दूँ   दुख्तर को   यूं  तन्हा तन्हा 
चार  कांधे   भी   न    डोली  के   उठाने  वाले

आस   रहती  है   जईफी  मे   जरा   मीठे  की
बोल   कड़वे  ही मिले   दिल को   दुखाने  वाले

खूब   मायूस  से   दिखते  हैं   यहाँ   सब  चेहरे
है   नदारद   ये   शहर   से   ही   हंसाने   वाले