Wednesday, 21 October 2015

थक गये जिंदगी की शरारत लिखते लिखते

थक गए जिंदगी की शरारत लिखते लिखते
उमर बीत गई अपनी वसीयत  लिखते लिखते

बच्चे बड़े होने लगे अब घर छोटा लगने लगा
कागज कम पडने लगे जरूरत लिखते लिखते

बस खत मे ही पुछ लेते है वो हाल कैसा है
आंसू छलक आते है गुरबत लिखते लिखते

मां की ममता अमरबेल सी बढती ही जाती है
औलादे भूल जाती है अदायत लिखते लिखते

दास्ताने रसुख बंद कर दैरो हरम की अब तो
कई हाथ कजा हो गए इबारत लिखते लिखते

अरसा गुजर गया उस गली से हमको गुजरे
फिर याद आ गये वो मोहब्बत लिखते लिखते

जमाने भर की उंगलिया उठती रही है हम पर
परेशां हो गये हम वाजबियत  लिखते लिखते

आज भी चमक जाती है निगाहे उन्हे  सोच कर
अब भी मचल जाती है तबीयत लिखते लिखते

Sunday, 18 October 2015

दिल तो बहुत मिले मगर दिलबर नही मिले

दिल तो बहुत मिले मगर दिलबर नही मिले
इन आंखो को चाहतो के मंजर नही मिले

दोजख के रास्ते तो दिखाते है सब मगर
जन्नत की ओर जाने को रहबर नही मिले

यूँ तो मकां बहुत है तेरे शहर मे फिर भी
लायक मगर कोई भी हमे घर नही मिले

मिले बहुत जहां मे हमदम से भी जियादा
दम तक जो साथ देते वो बसर नही मिले

फुटपाथ पर भी होती बसर है जिंदगी कुछ
मेरे देश के नुमाइंदे कभी बेघर नही मिले

अकीदते इंसान की बुतो मे जान भर रही
हम सजदे मे थक गये वो पत्थर नही मिले

Sunday, 11 October 2015

उन घरों के किस्से अखबारो मे नही आते

उन घरो के किस्से अखबारो मे नही आते
भुखे पेट होकर भी जो बाजारो मे नही आते

डबडबा जाती है आंखे रास्ता ताकते तकते
दूर गये वो अपने जब त्योहारो मे नही आते

चीख निकल गई हमारी तो जुल्म हो गया
कत्ल करके भी वो गुनहगारो मे नही आते

चंद मौकापरस्ती के इर्द गिर्द घुमती रहती है
शरीफुन् नफ्स कोई सरकारो मे नही आते

मुफलिस बस्तियों पर मेहर है निजाम की
खंडहर मे रहने वाले लाचारो मे नही आते

हमारे भी शहर मे ख्वाहिशमंद बेशुमार है
सभी के हुनर लेकिन इश्तेहारो मे नही आते

Thursday, 8 October 2015

हंसी दिल पे मलाल रखते है

हंसी दिल पे मलाल रखते है
वो शख्सियत कमाल रखते है

जवाब खुद कभी बन न सके
जुबां पे फजूल सवाल रखते है

करते है जो बाते अम्न चैन की
शहर मे हरदम बवाल रखते है

करते है जमाने की झंडाबरदारी
खुद की बिरादरी बेहाल रखते है

कहते है जो बेईमानी हराम है
कहां वो कमाई हलाल रखते है

सीखाते है वो जीने का सलीका
वो खुद ही बेढंगी चाल रखते है

सभी की गुजरती मेरे शहर मे
हैसियत सभी बहरहाल रखते है

Wednesday, 7 October 2015

जिंदगी की शरारत अच्छी नहीं लगती

जिंदगी की शरारत अच्छी नही लगती
नसीब की गफलत अच्छी नही लगती

रईसी के हिस्से ही क्यूँ सारी खुशीयाँ
क्या गरीब को ये दौलत अच्छी नही लगती

भाषण से सियासत के मतलब सध जाते हैं
उन्हे आवाम की हुकूमत अच्छी नही लगती

मजलूमो पर डंडे से जोर आजमाइश
किसी को भी शराफ़त अच्छी नही लगती

दिखावे की बंदगी अच्छी नहीं लगती

दिखावे की बंदगी अच्छी नही लगती
ये झूठी जिंदगी अच्छी नही लगती

हमने तो फरेब कभी सीखा नही
लोगो को सादगी अच्छी नहीँ लगती

उन बस्तियों मे पसरा रहता है अंधेरा
कुछ को वहां रोशनी अच्छी नही लगती

मुफलिसो की झोपड़ी आंसूओ से तर है
उनकी ये बेकसी अच्छी नहीँ लगती

यारो के कद अब ऊँचे हो गये है
उन्हे हमारी दोस्ती अच्छी नही लगती

सनम की गली से गुजरते नही अब
उनकी बेरूखी हमे अच्छी नही लगती

भंगार कह मां से उलझ जाते थे

भंगार कह मां से उलझ जाते थे
उन्ही चीजो को आज सहेजे जाते है

कुछ सामान पडे है बंद कमरे मे
रिश्तो को उनके बहुत करीब पाते है

दरारो से झांकती है यादे पुरानी
बीते हुये लम्हे दिल को लुभाते है

भरा भरा आंगन हंसता बचपन
वो गुजरे दिन बहुत याद आते है

मुद्दआ मुफलिसी का था उसे मजहबी बताते हैं

मुद्दआ मुफलिसी का था उसे मजहबी बताते है
कलम किस पर उठाना था कलम किस पर उठाते है

वो बच्चा भुख से बिलख रहा सरे बाजार था
उसे अखबार की तस्वीर मे हंसता दिखाते है

हुकुमत को नही खबर जमीनी हकीकत की
वो बस रिपोर्टो के दम पर सरकार चलाते है

आवाम बनती रहती है सियासतदानो की मोहरे
वोटो की खातिर आज  सब उन्हे मुद्दा बनाते है

कभी परवाह नही की उन मजलूम बस्ती की
चुनाव आते ही कुछ लोग वहा घुमने जाते हैं

बेवजह बेवक्त जो बाते बहुत खुब करते है
जब उनकी जरूरत होती है वो छुट्टी मनाते है

अंधेरे बहुत है फिर भी सुरज रोज निकलता है
धुप ठहरी कहां देखे बिना बस तोहमत लगाते है

कभी मिलता है तो सादगी की बात करता है

कभी मिलता है तो सादगी की बात करता है
मेरा किरदार भी जिंदगी की बात करता है

यूँ तो लगता है जमाने से रूठा रूठा सा
फिर भी इबादत की बंदगी की बात करता है

अंधेरो मे गुजारी है जिसने तमाम हयात
उजाले चाहता है वो रोशनी की बात करता है

चाक जिगर है वो फटेहाल है बदहवास है
पर चेहरा हंसमुख है दिल्लगी की बात करता है

उम्र दराज़ी मे भी क्या आशिकी सुझती है
जिंदगी की सांझ मे मौशूकी की बात करता है

लम्हो की शरारत बाकी है

लम्हो की शरारत बाकी है
वक्त की नजाकत बाकी है

जुबां से बयां नही होती
दिल मे मोहब्बत बाकी है

कुछ लिहाज है जमाने का
आंखो मे लरजत बाकी है

पोशीदगी भी जरूरी है
इतनी तो शराफ़त बाकी है

पहचानते है हमे भी कुछ
शहर मे इज्जत बाकी है

यार फिरते है नमक लिए
उनके भी तोहमत बाकी है

सुबह सवेरे

मुह चिढाती झांकती
चौखट की दरारो से
धुप सुबह की

सुरज की
किरणे भी
छप्पर के
सुरागो से
झोपडी मे घुसने को
आतुर है

जैसे किसी नये दिन का
संदेश ले के आया है
कोई

नई सुबह फिर वही
ख्वाहिशें
फिर वही
जरूरते

फिर से आज
कुछ ख्वाब
दफ्न करने होंगे
सीने मे

जरूरतो की कीमत पर
कुछ मुस्कान
फिर से गायब
हो जायेगी आज

जब मिले बस वही बेकार की बाते

जब मिले बस वही बेकार की बाते
बेसबब बेफिजूल तकरार की बाते

अब नही होती चर्चा अम्न चैन की
अरसे से सुनी नही प्यार की बाते

फिजायें भी अब बेरंग सी लगे
नही होती कही गुलजार की बाते

उस बस्ती मे चुल्हे अवकाश पर है
कैसे हो वहां कोई त्योहार की बाते

फुटपाथ पर यूँ बसर हो रही है
सुनते थे कभी घर बार की बाते

बदल जाते लोग सुबहो शाम मे
क्या करे वहा किरदार की बाते

हुकुमत तो बस वादे खिलाती है
खोखली है ये सरकार की बाते

रसुखदारो की बस चलती यहां
नही सुनी जाती लाचार की बाते