मुद्दआ मुफलिसी का था उसे मजहबी बताते है
कलम किस पर उठाना था कलम किस पर उठाते है
वो बच्चा भुख से बिलख रहा सरे बाजार था
उसे अखबार की तस्वीर मे हंसता दिखाते है
हुकुमत को नही खबर जमीनी हकीकत की
वो बस रिपोर्टो के दम पर सरकार चलाते है
आवाम बनती रहती है सियासतदानो की मोहरे
वोटो की खातिर आज सब उन्हे मुद्दा बनाते है
कभी परवाह नही की उन मजलूम बस्ती की
चुनाव आते ही कुछ लोग वहा घुमने जाते हैं
बेवजह बेवक्त जो बाते बहुत खुब करते है
जब उनकी जरूरत होती है वो छुट्टी मनाते है
अंधेरे बहुत है फिर भी सुरज रोज निकलता है
धुप ठहरी कहां देखे बिना बस तोहमत लगाते है
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