भंगार कह मां से उलझ जाते थे उन्ही चीजो को आज सहेजे जाते है
कुछ सामान पडे है बंद कमरे मे रिश्तो को उनके बहुत करीब पाते है
दरारो से झांकती है यादे पुरानी बीते हुये लम्हे दिल को लुभाते है
भरा भरा आंगन हंसता बचपन वो गुजरे दिन बहुत याद आते है
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