Monday, 28 March 2016

जमाने का रंग नही देखा तो क्या देखा

जमाने का रंग नही देखा तो क्या देखा
लोगों का ढंग नही देखा  तो क्या देखा

मेले में आये शक्लें देखी और लौट गये
खुशी औ उमंग नही देखा तो क्या देखा

कैसे होती है बसर जिंदगी मुफलिसी में
बेबस हाथ तंग नही देखा तो क्या देखा

हसरतों औ जरूरतों में तकरार जारी है
तुमने ये जंग नही देखा   तो क्या देखा

मतलब की यारी औ जरूरत के सलाम
बेफिक्र मलंग नही देखा   तो क्या देखा

पिंजरे में पोपट तो  बहुत देखे होंगे तुने
आसमाँ विहंग नही देखा तो क्या देखा

कभी सुब्ह देखा तो    कभी शाम देखा
दोनों एक संग नही देखा  तो क्या देखा

मोबाइल में बचपन कही खो सा गया है
बच्चो ने पतंग नही देखा  तो क्या देखा

Sunday, 27 March 2016

ज़मीन से उगती है या आसमाँ से आती है

ज़मीन से उगती है या आसमाँ से आती है
ये बे-इरादा सी उदासी    कहाँ से आती है

सुलगती रहती है धुंआ धुंआ सा उठता है
दहक रिश्तों में जरा सी  कहा से आती है

छलके पडते है दिदार की चाहत में आंसू
आंखें ये अरसे से प्यासी कहां से आती है

निहारती रहती हैं गुजरे निशान कदमों के
उम्मीदें अधूरी  हैरां सी   कहां से आती है

भटकते भटकते थक सिरहाने आ बैठी है
देखिए नींदे  परेशां सी   कहां से आती है

Saturday, 26 March 2016

ठिठक गये थे हम कि माजरा क्या है

ठिठक गये थे हम कि माजरा क्या है
दहशत में है लोग   फिर हुआ क्या है

ढूंढता फिरता है आज सारा शहर ही
जिंदगी जीने का यहां सलीका क्या है 

कोई भी किसी से क्यूँ बोलता नही है
दरमियां दिलों के  ये फासला क्या है

मानों तो सब यहां  अपने ही लोग हैं
न मानों तो आपस में   रिश्ता क्या है

देखा है बारिशों में  भीगते सुरज को
नही जानते हैं हम कि तजुर्बा क्या है

सुब्ह शाम में उम्र तमाम हुई जाती है
बेखबर जिंदगी का फलसफा क्या है

शहर में जात थे जमात थे औकात थे
मगर आदमी होने का तरीका क्या है

Friday, 25 March 2016

खंडहरनुमा उस घर में कौन है

खंडहरनुमा     उस घर में कौन है
आप तो बाहर है भीतर में कौन है

सभी तो यहां  पत्थर से दिखते हैं
आवाज ये कैसी  शहर में कौन है

जेहन के साथ   नही है जुबां तेरी
दिल में है कौन   नजर में कौन है

कितनी दुआएं   तेरे संग चली थी
तुने कहां देखा   सफर में कौन है

दहलीज़े राहें   तकती है आज भी
घर रिश्ते ढूंढता  किधर में कौन है

कितनी उम्मीदे दबी है कदमों तले
कभी देखना  तेरे असर में कौन है

नही आते साथ  रास्ते मिलने वाले
पलट के देखना लश्कर में कौन है

Thursday, 24 March 2016

मिलता नही है अब कही खालिस आदमी

मिलता नही है अब कही खालिस आदमी
हर आदमी के भीतर है  दस बीस आदमी

जिंदगी के रंग आज   इतने रंगीन हो गये
लगता है जैसे    हो कोई नुमाइश आदमी

झेलते गमों को  गमख्वार हो गया है अब
करता है हरेक गम की   तफ्शीश आदमी

निकले जो बिहाने तो  मुंधियारे घर आता
सारे दिन करे अपनी  आजमाइश आदमी

सहमी सहमी सी दुबकी रहती है दिलों में
करता नही अब कोई    ख्वाहिश आदमी

सियाह राते ढलने का नाम   नही लेती है
उजालों की जो करे है फरमाइश आदमी

उसूलों के जनाजे हर दिन निकलते रहते
करता रहता है गैरत की पैमाइश आदमी

Monday, 21 March 2016

सिसकियों के मोल हालात बिका करते हैं

सिसकियों के मोल हालात बिका करते हैं
कुछ बे जवाब से सवालात बिका करते हैं

शहर की रंगीन   मिजाजी के दरमियां ही
बस्ती में कितने    जज्बात बिका करते हैं

हर मोड़ पे जलील  होती ये मुफलिसीयां
हर कदम कितने  औकात बिका करते हैं

भूख की कीमत खुब वो मां ही जानती है
दुध वास्ते जिसके लमहात बिका करते हैं

बेटी के हाथ पीले   करने के जुगत में ही
बाप की ताउम्री हासिलात बिका करते हैं

मजबूरियों के चादर ओढ के रोज कितने
उसूल बेमोल ही वाहियात बिका करते हैं

मुल्क में सियासत लाशों पे रोटी सेंकती है
कुर्सी की कीमत यहां जात बिका करते हैं

चौराहो पे दुआ  की दुकान मिल जाती है
चंद सिक्को में ही आफात बिका करते हैं

न रंग अच्छा है न हाल अच्छा है

न रंग अच्छा है  न हाल अच्छा है
पूछते हैं कैसे हो सवाल अच्छा है

इश्तेहारो के दौर उम्मीदे वफादारी
खुब है मुगालता खयाल अच्छा है

बताया था बरहमन ने हाथ देखके
मायूस न हो तेरा ये साल अच्छा है

फिजाओं में मौसमी बयार चढी है
फागुन के ये रंग  जमाल अच्छा है

देखते हैं दूर से रंगीन पिचकारियां
सुखी होली खेले मलाल अच्छा है

घर में दाना नही गुजिया कैसे मिले
ठंडे चूल्हे में हांडी कमाल अच्छा है

त्योहार देखते ही मायूस हो जाते है
मुफलिसी में हाल  बेहाल अच्छा है

हर तरफ ही रंगीनीयों का आलम है
झूठे सही मंजर फिलहाल अच्छा है

Thursday, 17 March 2016

मुश्किल को मुश्किल बतलाना भूल जाते हैं

मुश्किल को मुश्किल बतलाना भूल जाते हैं
खुद से जब मिलते हैं  जमाना भूल जाते हैं

पूछते हैं उनसे ही उनके     रुठने का सबब
जब वो सितमगर  हमे सताना भूल जाते हैं

उलझे हैं इस कदर जिंदगी की जद्दोजहद में
जब रोते भी है तो आंसू बहाना भूल जाते हैं

उधडे उधडे दिखते हैं ये सारे रिश्ते नाते भी
तुरपाई करते उन्हे आजमाना भूल जाते हैं

घर की जरूरते कमाते ख्वाहिशें पुरी करते
बच्चो के लिए   फर्ज निभाना भूल जाते हैं

हर मोड़ पर मिल जाते हैं   दर्द भी नये नये
अब नई मुसीबत देख   पुराना भूल जाते हैं

Wednesday, 16 March 2016

हुई जाती है अब तो मुल्क में गुनहगार तस्वीरें

हुई जाती है अब तो मुल्क में गुनहगार तस्वीरें
करने लगी हैं    जज्बातों का कारोबार तस्वीरें

छुपा जाती है बहुत से दर्द ये   अपने भीतर में
बहुतो के लिए अब बन गई    इश्तेहार तस्वीरें

चौराहे पर इन्हें कोई बेचता है  रोटी कमाता है
गरीबों के मुंह का निवाला है ये लाचार तस्वीरें

कितनी ही जुर्म की गवाही भी बन जाती है ये
कई मुंसिफो का भी बन रही है आधार तस्वीरें

बारिशों में बचपन के संग दिल को बहलाती है
बन जाती हैं जब नन्हे हाथ में  पतवार तस्वीरें

खुशनुमा और उदासी के लमहात की सुरत में
करती रहती है जज्बातों का   इजहार तस्वीरें

कह जाती है बहुत कुछ खामोश सी रहके भी
रखती है हमारी जिंदगी से ही सरोकार तस्वीरें

Thursday, 10 March 2016

कितने ही अरमान दफ्न होते हैं रोज सीने में

कितने ही अरमान दफ्न होते हैं रोज सीने में
बहुत मुश्किल होता है  जिंदा रहकर जीने में

उसूलों के जनाजे यहां हरदिन ही निकलते हैं
गैरत की खुश्बू भी अब आती नही पसीने में

साहिल पे खड़े होकर तो तूफानों को देखा है
अबके शायद हम भी डूबे मौजों के सफीने में

बाकी तो मेरे मुल्क में सबही खैरियत है मगर
क्या लुफ्त आता है सियासत को लहू पीने मे

भुख से कैसे समझौता करती  उसकी बेबसी
मुस्कुराते चेहरे भी बयां हो जाते हैं आईने में

जरूरतों की फेहरिस्त ले मन सोचता बैठा है
क्यूँ चली आती है पहली तारीख हर महीने में

देखे जो दूर से सभी अच्छा दिखाई दे

देखे जो दूर से तो सभी अच्छा दिखाई दे
उम्र ढली फिर भी दिल बच्चा दिखाई दे

बोलते है तो बस हकीकत जान पड़ता है
मकसद में मगर मक्कारी सा दिखाई दे

नफरतों के बीज वो बो रहे हैं इस कदर
अम्न के दुश्मनों का ही हिस्सा दिखाई दे

साजिशों के जाल फंस गया इक मेमना
यकीनन फिर से नया किस्सा दिखाई दे

आजादी के भी मायने कितने बदल गये
बयानगी के पीछे सब गद्दारी सा दिखाई

Wednesday, 2 March 2016

मुसीबतों ने कभी रखा ही नहीं तन्हा हमे

मुसीबतों ने कभी   रखा ही नहीं तन्हा हमे
जले पडोस में चुल्हा  मिलता है धुंआ हमे

रोज ढुंढता हूँ घर पे  उसके खोये से निशां
रोज होता है बरामद अपना ही हिस्सा हमे

हालात की मजबूरियां  ये मुसलसल दूरियां
जिंदगी लगती बस जरुरतों का किस्सा हमे

अब कहां वो बरकते नसीहतें औ हिदायतें
अब तो सौदेबाजी सी   लगती है दुआ हमे

कुछ अधजले खयाल चंद हसरते दबी हुई
आज अपने सिरहाने ये सामान मिला हमें

चांद की पीली आँच में तपता रहा रात भर
सुब्ह झुलसा कराहता ख्वाब इक दिखा हमें

मुर्दों के इस शहर में  खुदकुशी की अर्जियां
जमीर बेच दिये है नहीं दिखे कोई जिंदा हमे

सुखे फुल के जैसे रिश्ते खुशबू से उन्हें मिलाये कौन

सुखे फुल के जैसे रिश्ते खुशबू से उन्हें मिलाये कौन
कुछ अहसास सिरहाने बैठे नींद में उन्हें सुलाये कौन

तिनका पत्ता खुशबू सब ही     आंधियों में उड जाते
दर्द  दिलो मे पसरा हुआ है आंधी तक ले जाये कौन

दिन ढलते ही आवारा बनकर मारा मारा  फिरता है
काली चादर ओढे सोया सुब्ह सुरज को जगाये कौन

दो पहर में साया अपना    कद से भी ऊंचा हो गया
दो पहर बाद फिर साये को खुद ही से मिलाये कौन

हरदम ही धुंए में जलती है   मां की आंखें सच नहीं
बेटे की मुश्किलों में भी   बहते हैं आंसू जताये कौन

उधार की मुस्कान देखकर   अपने बाप के चेहरे पर
माँ के पल्लू में छिप बेटी रोती है ढांढस बंधाये कौन

वक्त की झोली से कुछ लम्हें चुराये थे जीने के लिए
फटी जेब से कहां गिर गए उनकी खबर बताये कौन

Tuesday, 1 March 2016

चिंदी चिंदी फिर दिलों के वो जज्बात करे है

चिंदी चिंदी फिर दिलों के वो जज्बात करे है
बिखरी सी हसरतों के      तहकीकात करे है

जमाने में यूं तो सारे ही मंजर सुहाने लगते हैं
खुशियाँ लेकिन खुद के घर मुलाकात करे है

तपते से खयालो की हरारत जरा सी रह गई
दुरुस्ती में तो अक्सर ये आंखें बरसात करे है

ख्वाहिशे सब जेब की सुराखों से फिसल गई
जरुरते मेरे तनख्वाह की ही  मालूमात करे है

जो मौत से कभी डरा नहीं बच्चों से डर गया
वो रोज ही घर पर भुख से दो दो हाथ करे है

हर सफहा पलटते ही सिसकियाँ निकलती है
उधड़े उधड़े से हैं कई    जो खयालात करे है

क्यूँ खींच गई यूँ रिश्तो के दरमियां ही दीवारें
कई टुकडों में बंटी मां ये     सवालात करे है

मजहब दौलत जात घराना   शोहरत खुद्दारी
ऐ जिंदगी हर मोड़ पर ऐसे मुश्किलात करे है