कितने ही अरमान दफ्न होते हैं रोज सीने में
बहुत मुश्किल होता है जिंदा रहकर जीने में
उसूलों के जनाजे यहां हरदिन ही निकलते हैं
गैरत की खुश्बू भी अब आती नही पसीने में
साहिल पे खड़े होकर तो तूफानों को देखा है
अबके शायद हम भी डूबे मौजों के सफीने में
बाकी तो मेरे मुल्क में सबही खैरियत है मगर
क्या लुफ्त आता है सियासत को लहू पीने मे
भुख से कैसे समझौता करती उसकी बेबसी
मुस्कुराते चेहरे भी बयां हो जाते हैं आईने में
जरूरतों की फेहरिस्त ले मन सोचता बैठा है
क्यूँ चली आती है पहली तारीख हर महीने में
No comments:
Post a Comment