Sunday, 27 September 2015

बात होती है अब कहां कोई

बात होती है अब कहां कोई
कुछ करता नही बयां कोई

लिये फिरता है आग सीने मे
इश्क पाले था कल जहा कोई

हर तरफ झुठ औ फरेब मिले
बोलो ढुंढे कहां वफा कोई

ख्वाब पलते रोज आंखो मे
सच की मिली नही दुकां कोई

बेवजा है तलाश ए दैरो हरम
राम मिलते है न खुदा कोई

जाने क्या थी बेबसी उनकी
यूँ न होता है बेवफा कोई

Thursday, 17 September 2015

खुद के किरदार पे नजर डालो

खुद के किरदार पे नजर डालो
फिर कोई जुमला उछालो

कभी उलटा भी वार पड़ता है
मुंह खोलो तो जुबां सम्हालो

बेबात बकबादी ठीक नही
कभी अच्छे खयाला निकालो

रिश्ते मिलते है जुबां के रस्ते
आओ बेहतरीन रिश्ता बना लो

Wednesday, 16 September 2015

कहां दैरो हरम में रब मिलता है

कहां दैरो हरम मे रब मिलता है
वहा तो बस मजहब मिलता है

ऐ वाईज चल मैकदे मे ढुंढ लें
सुनते है कि वहा सब मिलता है

इक यार पुराना कही खो गया है
देखे वो फिर कब मिलता है

खंजर लिए फिरते है यार
जो मिलता है गजब मिलता है

शहर की हवा बदली सी है
बेअदबी वो बाअदब मिलता है

हमे जिंदगी के तौर सिखाता
सितमगर हमी से बेढब मिलता है

यूँ तो मुहब्बत मुश्किल है फिर भी
मजा मौशूकी मे अजब मिलता है

होश वालो को कहा रब मिले है
बेहोशी मे ही तो रब मिलता है

अरदास

चाहे न नेमत अता कर तु
गुजारिश है मौला बुराई न दे

न दे चाहे शोहरत ओ बुलंदी
करम कर तु जग हंसाई ने दे

गुजरती है तेरे सदके जिंदगी
चाहे किसी को दिखाई न दे

तेरे करम से रोशन जहां है
कही भी तु गम की परछाई न दे

खुशियाँ कही दिखाई न दे

खुशीयाँ कही दिखाई न दे
दर्द किसी का सुनाई न दे

अंधे बहरो की बस्ती है ये
जप्त आंसूओ को रिहाई न दे

हकीकत बयानी यहा जुर्म है
कलम छिन ले रोशनाई न दे

जिधर देखिये मजहबी फसाद
अमन की भाषा सुनाई न दे

हंसी लब आस्तीने खंजर
दाता ऐसे पडोसी भाई न दे

मिल जुल रहे सभी प्रेम से
किसी से कोई रूसवाई न दे

Tuesday, 15 September 2015

खबरें बिक चुकी हैं इश्तेहार पढिये

खबरे बिक चुकी है
इश्तेहार पढिये

जज्बातो की नीलामी
सरे बाजार पढिये

कैसे होती है इंसानियत
शर्मशार पढिये

बाइज्जत शहर के
दागदार पढिये

महफूज नही बेटी
मिलती नही है रोटी

लगे है शहर मे बडे
बाजार पढिये

न पेट मे है अतडी
न आंखो मे है पानी

मुर्दो की बस्ती है
अखबार पढिये

मुर्दो की बस्ती का
अखबार पढिये

Sunday, 13 September 2015

उम्मीदें

कुछ उम्मीदें घर पर मेरा...बाट जोहती है...
शाम ढले घर आता हूँ...तो मेरी जेबे टोहती है...

Wednesday, 9 September 2015

होठों पे मुस्कान दिलो मे खाई है

होंटो पे मुस्कान दिलो मे खाई है
अपनो ने भी खुब रश्म निभाई है

कोने मे रोती पडी बुढी आंखे
आज भी न आयी मां की दवाई है

आज वसीयत करने वाले है बाबूजी
पहली बार इकट्ठे सारे भाई है"..

बाबूल के अंगना से अब उड जाना है
दिल भरा हुआ है बेटी की सगाई है

Wednesday, 2 September 2015

बाबूजी


बाबूजी के कमीज से
एक धुली हुई परची मिली है

कुछ जरूरते लिखी थी 
जो धुल गये है अब

बाबूजी जो
ख्वाहिशें जुबां पर 
आने नहीं देते थे 
बच्चो की

पहले ही पुरी हो 
जाती थी

आज बेटो ने
उनकी जरूरतें 
किस्तो मे बांट रख्खी है