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सुख से जीने की चिंता में, सब्र गवाएं फिरते हैं।
दुख अपना खुद अपने से अब, लोग छिपाए फिरते हैं।। /1/
क्या अच्छा है क्या अनुचित है, खूब सरल है ये कहना।
मसला होने तक पहले सब, दोष दबाए फिरते हैं।। /2/
मोल नही जिनका होता है, वो ही होते हैं अनमोल।
और उन्हें हम नादानी में , व्यर्थ लुटाए फिरते हैं।। /3/
ठोकर पे ठोकर लगती है, हमको तो हर बार यहाँ।
क्यूँ हर दिन पत्थर हमसे पहचान छिपाए फिरते हैं।। /4/
तारीखें लौट आती हैं पर, दिन वापस नही आते हैं।
कुछ लम्हों खातिर जीवन भर, बस बौराए फिरते हैं।। /5/
हम पे भरोसा मत करना तुम, करते हैं खुद से धोखा।
चेहरे पर अक्सर झूठी, मुस्कान सजाए फिरते।। हैं/6/
ना कोई चिंगारी दिखती , कहाँ धुआँ सा उठता है।
अचरज है फिर कैसे यहाँ कुछ, आग लगाए फिरते हैं।। /7/
रक्खा है थोड़ा सा बचा कर , तुझको अपने किस्से में।
किस्से के उस हिस्से में , खुद को भरमाए फिरते हैं।। /8/
जंग छिड़े जब अपनों से तो, हारना पड़ता है खुद को।
पेचीदगी ये रिश्तों की, दिल को समझाए फिरते हैं।। /9/
किसको सुनाए अब दुखड़ा हम, कौन सुनेगा इस दिल की।
हमको समझने वाले ही, हम को समझाए फिरते हैं।। /10/
वक़्त नही अब पास किसी के, बे मतलब की बातों का।
मतलब से मतलब की बातें, बस बतियाए फिरते हैं।। /11/