1212 1122 1212 22
सफर की ठोकरें, राहों की धूल पकड़ेगा।
दिल आज बैठ के, सब अपनी भूल पकड़ेगा।। /1/
शिकम की आग से, परेशान हो गया हो जो।
कहाँ तलक वो, बताओ उसूल पकड़ेगा।। /2/
महोत्सवों का अभी, दौर चल रहा है यहाँ।
अभी न मसअला, कोई भी तूल पकड़ेगा।। /3/
बता रहा है डिजिटल, जो मुल्क को मेरे।
वो कैसे झोपड़ी, पत्थर, बबूल, पकड़ेगा।। /4/
न कुछ बदलना है, अब शोर भी मचाने से।
मुखालफत का तू रस्ता, फिजूल पकड़ेगा।। /5/
उमीद पाल के बैठा, हुआ है जो दिल में।
शिकायतों से गुजर, मन मलूल पकड़ेगा ।। /6/
बगैर सोच समझ , कर ही चल पड़ा है जो।
वो दर ब दर में भटक, अपने चूल पकड़ेगा।। /7/
पहन के धूप बदन, अपने चल रहा है जो।
वही तुम्हारे महोत्सव, में फूल पकड़ेगा।। /8/
मलाल कैसे मैं तेरे, हवाले कर दूंँ बता।
तू बात बात पर, अपने ही रूल पकड़ेगा।। /9/
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