12122 12122 12122
कि चिंदी चिंदी दिलों के जज्बात हो रहे हैं
ये बिखरी सी हसरतों पे जुल्मात हो रहें हैं /1/
जमाने में अब तो सारे मंजर लगे हैं झूठे
पहन मुखौटे सभी मुलाकात हो रहें हैं /2/
खयालो की रह गयी हरारत है बस जरा सी
जो वक़्त बे वक़्त के करामात हो रहें हैं /3/
फिसल गयीं ख्वाहिशें सुराखों से जेब की सब
जरूरतों के तो बस शिकायात हो रहें हैं /4/
डरा नही मौत से जो बच्चों से डर गया वो
कि आंखों आंखों से बस सवालात हो रहे हैं /5/
हर एक पन्ना पलटते सिसकी निकल रही है
यूँ उधड़े उधड़े से सब खयालात हो रहे हैं /6/
दरार रिश्तों के दरमियाँ आ गयी क्यूँ इतनी
जो एक घर चार अब मकानात हो रहें हैं /7/
ये जात मजहब ये ज़र ये शोहरत है राएगाँ सब
बस इनकी ही वज्ह से फसादात हो रहें हैं /8/
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