Monday, 6 October 2025

दिन भर क्यूँ नही दिखता चांद

दिन  भर क्यूँ नही दिखता चांद
जाने   कहाँ    है    फिरता चांद

देख के    तुमको     लरजा कर
बादल   पीछे        छिपता चांद

कचरे  बिनते        देखा   हमने
एक गरीब   के   घर  का   चांद

ऊंची        अट्टालिकाओं      ने
घेर  लिया   है        मेरा    चांद

देख  मेरे  महबूब  का   जलवा
सुर्ख   हुआ  है     कैसा    चांद

रूप    सलोना   देख    तुम्हारा
कैसा    है      शरमाया     चांद

रात के    माथे पे       बिंदी सा
देखो    खूब    चमकता    चांद

माटी का   इक   धेला    बस है
हमने   छूकर       देखा    चांद

रात के   छुटकर   देखो    कैसे 
टहनी   में है       अटका   चांद

भूख से आकुल बच्चों को बस 
दिखता  रोटी     जैसा     चांद

सूरज  के   दम पर है    चमके
दाग  भरा   है    वरना     चांद

मंदिरों   के      देख के   वैभव
खुद के   हाल पे    रोया  चांद

तेरे दर्शन      की      चाहत में
छत पर    आया   होगा   चांद

दिन भर का भूखा आकुल सा
तुझको  देख के   निखरा चांद

चांद ने अपना व्रत फिर खोला
पहले   तुझको    देखा    चांद

इन आँखों में    चांद की सूरत
चांद  की  आंखों में    था चांद

सुब्ह से     भूखा    प्यासा था
तुझसे  मिलकर   निखरा चांद

घिस घिस  करके  देखो आज
और निखर कर  निकला चांद 

जाने   कितनी   ही  आंखों से
हो  कर  के  है    गुजरा   चांद

बाहर  वाले    गेट में   चढ़ कर
हमने   भी      ढूंढा   था   चांद

और  तुझे    मै   क्या देता कि
तुझको    फिका  लगता  चांद

इन   मंहगे    बाजारों में    था
सबसे  सस्ता    तोहफा   चांद

रूप  सलोना   ऐसा    निखरा
देख  तुझे     शरमाया     चांद

तेरे   दीद  की    चाहत  लेकर
बेसुध   छत पर   आया   चांद