दिन भर क्यूँ नही दिखता चांद
जाने कहाँ है फिरता चांद
देख के तुमको लरजा कर
बादल पीछे छिपता चांद
कचरे बिनते देखा हमने
एक गरीब के घर का चांद
ऊंची अट्टालिकाओं ने
घेर लिया है मेरा चांद
देख मेरे महबूब का जलवा
सुर्ख हुआ है कैसा चांद
रूप सलोना देख तुम्हारा
कैसा है शरमाया चांद
रात के माथे पे बिंदी सा
देखो खूब चमकता चांद
माटी का इक धेला बस है
हमने छूकर देखा चांद
रात के छुटकर देखो कैसे
टहनी में है अटका चांद
भूख से आकुल बच्चों को बस
दिखता रोटी जैसा चांद
सूरज के दम पर है चमके
दाग भरा है वरना चांद
मंदिरों के देख के वैभव
खुद के हाल पे रोया चांद
तेरे दर्शन की चाहत में
छत पर आया होगा चांद
दिन भर का भूखा आकुल सा
तुझको देख के निखरा चांद
चांद ने अपना व्रत फिर खोला
पहले तुझको देखा चांद
इन आँखों में चांद की सूरत
चांद की आंखों में था चांद
सुब्ह से भूखा प्यासा था
तुझसे मिलकर निखरा चांद
घिस घिस करके देखो आज
और निखर कर निकला चांद
जाने कितनी ही आंखों से
हो कर के है गुजरा चांद
बाहर वाले गेट में चढ़ कर
हमने भी ढूंढा था चांद
और तुझे मै क्या देता कि
तुझको फिका लगता चांद
इन मंहगे बाजारों में था
सबसे सस्ता तोहफा चांद
रूप सलोना ऐसा निखरा
देख तुझे शरमाया चांद
तेरे दीद की चाहत लेकर
बेसुध छत पर आया चांद