Saturday, 30 April 2016

कभी उन्हें हमारा खयाल आता तो होगा

कभी उन्हें हमारा खयाल आता तो होगा...
कभी उनका दिल भी गुनगुनाता तो होगा...

उठ बैठते होंगे कभी यकायक रातों में...
देख ख्वाबों में हमे दिल मुस्कुराता तो होगा....

तडप उठता होगा मन हमसे मिलने को कभी तो...
लबों पे हमारा नाम कभी आता तो होगा...

झुक जाती होगी नजर शर्म से कभी तो...
कभी बैठे वो हमको याद फरमाता तो होगा....

कभी हमपे गुस्सा कभी हमपे प्यार....
कभी हमारा जिक्र उनको भाता तो होगा....

खिलवत में बैठ हमारी हालत को सोच....
कभी जफाओ पर अपनी पछताता तो होगा...

कभी हमारी याद जब सताने लगे तो....
आखों में आसूं उतर आता तो होगा....

कभी उन्हें हमारा खयाल आता तो होगा....
कभी उनका दिल भी गुनगुनाता तो होगा....

Thursday, 28 April 2016

ख्वाबों में आने से पहले

ख्वाबों में आने से पहले
मुझको तुम बता देना

मेरे सो जाने के पहले
इतना तो इत्तला देना

धीरे से आकर ख्वाबों में
मुझको तुम जगा देना

अपने बदन की खुश्बू से
मेरा तन मन महका देना

कभी मुझसे खता हो तो
मुझको तुम सजा देना

कुछ पल के लिए रुठकर
मुझे मनाने का मजा देना

कभी तन्हा महसूस करु तो
मुझको साहस बंधा देना

आंखें नम हो जाये गर कभी
तुम मन मेरा सहला देना

तुम ही मेरी जिंदगी हो
दिल मे अपनी जगह देना

जिंदगी के सफर में तुम
हमसफर मुझको बना लेना

Sunday, 24 April 2016

खयालो में वो आते ही रहे अक्सर

खयालो मे तो वो आते ही रहे अक्सर
हकीकत में उनसे कभी आया न गया

दिल में है उनके क्या ये तो वो ही जाने
हमसे वो शख्स   कभी भुलाया न गया

ताहयात किये जिन पर जां निसार हम
हालेदिल पे उनसे आंसू बहाया न गया

हम रूबरू न हो   रजा ऐसी उनकी थी
बाजारों में मगर   चेहरा छुपाया न गया

मेरी वहशत के चर्चे करता है वो मजे से
हमसे कभी उनका राज  सुनाया न गया

नाराजगी ताउम्र की मौत से भी न दुर हुई
मेरी कब्र पे उनसे दो फुल चढाया न गया

Saturday, 23 April 2016

चाहा था हमने हमें गम मिले जरा सा

चाहा था हमने हमें भी   गम मिले जरा सा
गम मिला हमें इतना दम रह गया जरा सा

कभी दिल में ही रोये कभी आंसू बहा लिये
कभी गम छुपाने को मुस्कुरा लिए जरा सा

हकीकत जान  ख्वाब में ही खोये रहे सदा
टुटे ख्वाब  जो निकला आफताब जरा सा

कसूर किसका कहें तकदीर है अपनी ऐसी
सभी लोग है अच्छे बुरे हम ही हैं जरा सा

उठाये नाज सारे  उनके सदा हंसते हंसते
खफा हो गये जो रोेकर कहा दर्द  जरा सा

सब पूछते हैं हमसे   उदासियों का सबब
उन्हें नजर न आया दर्द चेहरे का जरा सा

सितम उन्हें लगते हैं अपने बहुत ही थोड़े
कहते हैं हमने तुम्हें  तडफाया है जरा सा

कहते हैं हमे वो  कमजोर हो तुम दिल के
करते हो जो इश्क   दर्द भी सहो जरा सा

Monday, 11 April 2016

कोई याद कोई लम्हा कोई भी मंजर नही भूला

कोई याद कोई लम्हा कोई भी मंजर नही भूला
मुझसे दूर रहकर भी मुझको     घर नही भूला

जात जमात औकात घराना सब ही साथ चले
बदली सुरत लेकिन नफरत ये शहर नही भूला

दुनियादारी छोड़कर  दरवेश भले वो बन गया
फकीरी में भी तलबगारी का  असर नही भूला

ख्वाहिशें अपनी भुल गया   जरूरते कमाने में
बिटिया के बडी़ होने की बुढा खबर नही भूला

खोया सा तन्हा सा   आज चांद नजर आ रहा
तमाम शब भटकने का वो     हुनर नही भूला

जरा सी अदाकारी रख   जेब में वो चल दिया
किरदार कई बदले    खुद को मगर नही भूला

Thursday, 7 April 2016

फकत हिंदू रह गये और मुसलमां रह गये

फकत हिंदू रह गये  और मुसलमां रह गये
इंसा की जुस्तजू थी वो जाने कहां रह गये

कल तक जिस बस्ती मिलते थे चेहरे हंसी
वहां जात और जमात  के   निशां रह गये

रिश्तों के दरमियां कुछ बेरूखी सी छाई है
बोल चाल बंद बस  खामोश जुबां रह गए

भीड जमा तो हुई चौराहे हादसा देख कर
चंद लम्हों में वहां महज कहकशां रह गए

खुदकुशी की अर्जी है मुर्दों के इस शहर में
रफ्ता रफ्ता बस यहाँ खाली मकां रह गए

झुठ फरेब आतंक दहशत मिलते हैं यहाँ
मौजूदगी हर शै की आदमी सिवा रह गये

उलझ गए इस कदर  दैरो हरम के फेर में
अम्नो जुबां  भुल गये बेरब्त बयां रह गये

Wednesday, 6 April 2016

रात में तारों भरी रात ने सोने नही दिया

रात में तारों भरी रात ने सोने नही दिया
बेबस चांद के हालात ने सोने नही दिया

आपको भी मुहब्बत है कि नही है हमसे
ऐसे मासूम खयालात ने सोने नही दिया

कैसे मर मर  गुजरी है जिंदगी तुझ बिन
बेरब्त से ऐसे जज्बात ने सोने नही दिया

कितने बेताब थे    तेरे दिदार की चाहत
ख्वाबों में   मुलाकात ने सोने नही दिया

बिलखती रही हसरतें   यतीमों की तरह
चंद चुभते   सवालात ने सोने नही दिया

गुजारी जो तेरे साथ खयालों की जिंदगी
बीते उन हंसी लमहात ने सोने नही दिया

शिद्दत से तुझे याद करते गुजरे दिन रैन
मुद्दत से    मुश्किलात ने सोने नही दिया

Tuesday, 5 April 2016

वाह वाह क्या बात है

अजब से हालात है  गजब मुश्किलात है
कट रही है जिंदगी वाह वाह क्या बात है

जरुरतों के मोल जो  रोज नीलाम हो रहे
दिल के जज्बात है वाह वाह क्या बात है

निकलते ही रहते हैं ख्वाहिशों के जनाजे
चिंदी में औकात है वाह वाह क्या बात है

चेहरे बदल बदल कर  रोज ही आ जाती
कैसी आफात है    वाह वाह क्या बात है

दहशत भरे मंजर हैं हर हाथ में खंजर है
दिलों में घात है     वाह वाह क्या बात है

खामोश हर जुबां कोई बोलता नही कुछ
कैसी ये जमात है  वाह वाह क्या बात है

जागते बीतती रातें खोये खोये सारा दिन
उलझे खयालात है वाह वाह क्या बात है

कहने को यूँ तो घर में मेले जैसा मंजर हैं
तन्हाई सौगात है   वाह वाह क्या बात है

हर इक लफ्ज़ को हजार मतलब पहनाये
खुद से मुलाकात है वाह वाह क्या बात है

अपनी ही ख्वाहिशों से बेजार आदमी

अपनी ही ख्वाहिशों से बेजार आदमी
खुद के   घर में जैसे अखबार आदमी

जरुरत के हिसाब बंट जाता है पुरे घर
इक इक पन्ना होकर    लाचार आदमी

बिताता हर दिन रिश्तों को समेटते हुए
जमाने की नजर में   गुनहगार आदमी

अपनो के बीच भी गुमसुम सा रहता है
तन्हाइयों का लगता है शिकार आदमी

बिखर जाता है पल में जरा सी बात पे
अपनो के बीच बना रहे दिवार आदमी

जात है जमात है   औकात भी है यहाँ
बंटे है सभी आपस में बेशुमार आदमी

भागता फिरता है  झूठी खुशी के पीछे
भुला अपने सब   रीत संस्कार आदमी

तरक्की के इस  चकाचौंध के दरमियां
रह गया है बन करके इश्तेहार आदमी