Monday, 11 April 2016

कोई याद कोई लम्हा कोई भी मंजर नही भूला

कोई याद कोई लम्हा कोई भी मंजर नही भूला
मुझसे दूर रहकर भी मुझको     घर नही भूला

जात जमात औकात घराना सब ही साथ चले
बदली सुरत लेकिन नफरत ये शहर नही भूला

दुनियादारी छोड़कर  दरवेश भले वो बन गया
फकीरी में भी तलबगारी का  असर नही भूला

ख्वाहिशें अपनी भुल गया   जरूरते कमाने में
बिटिया के बडी़ होने की बुढा खबर नही भूला

खोया सा तन्हा सा   आज चांद नजर आ रहा
तमाम शब भटकने का वो     हुनर नही भूला

जरा सी अदाकारी रख   जेब में वो चल दिया
किरदार कई बदले    खुद को मगर नही भूला

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