कोई याद कोई लम्हा कोई भी मंजर नही भूला
मुझसे दूर रहकर भी मुझको घर नही भूला
जात जमात औकात घराना सब ही साथ चले
बदली सुरत लेकिन नफरत ये शहर नही भूला
दुनियादारी छोड़कर दरवेश भले वो बन गया
फकीरी में भी तलबगारी का असर नही भूला
ख्वाहिशें अपनी भुल गया जरूरते कमाने में
बिटिया के बडी़ होने की बुढा खबर नही भूला
खोया सा तन्हा सा आज चांद नजर आ रहा
तमाम शब भटकने का वो हुनर नही भूला
जरा सी अदाकारी रख जेब में वो चल दिया
किरदार कई बदले खुद को मगर नही भूला
No comments:
Post a Comment