Thursday, 1 October 2020

ज़िन्दगानी तरसती नहीं चाहिए

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ज़िन्दगानी    तरसती    नहीं    चाहिए
मौत  भी   इतनी   सस्ती  नहीं चाहिए

 ढूंढता   ही   रहा   हूँ   मैं   इंसानियत 
आदमियों   की   बस्ती   नहीं  चाहिए

देख ली मौजे दुनिया की सच्चाई सब
झूठ  है  सब  ये  मस्ती   नही  चाहिए

खुद को ही  ढूंढने की  जो नौबत पड़े
मेरे  मालिक  वो  हस्ती  नही  चाहिए

आदमी  आदमी  को  न   पहचाने वो
मर्म   की   तंगदस्ती    नही    चाहिए

क्या खता हो गयी क्यूँ गिले हो गये

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क्या   खता  हो  गयी  क्यूँ  गिले  हो  गये
कह   रहे    लोग   हमको     बुरे   हो गये

फुरसतों   के   ये    लम्हे   कहर   ढा  रहे
अच्छे  खासे   भी   अब  सरफिरे  हो गये

बात  दिल  की  कही हमने दिल से मियां
आप   क्यूँ   इस तरह   अनमने   हो  गये

दोष  होता  नही  गलतियों  का  ही  बस
गल्तफहमी    में  भी    फासले    हो गये

वक्त   रहता   नही   है   कहीं  टीक  कर
कल  जो  अपने  थे  अब  गैर के हो गये

था  न  मुमकिन  बदलना  यूँ हालात को 
मन  बदल  कर  फिर हम ही नये हो गये

जिंदगी   से   तो   अनबन  रही  उम्र भर
मौत   से   भी    बहुत  से  गिले  हो  गये

देख   उनको    हुई   है    उदासी   बहुत
क्या  थे  कल  आज क्या देखिए हो गये

है  वो   रहजन   नया  है  सलीका  नया
तौर   अब   रहजनी   के   नये   हो  गये

कुछ  उजालों  में  उनको  गये  भूल हम
वज्ह   से   जिनके  रोशन  दिये  हो गये

देख कर रुख  बदलती हवाओं की अब 
जो   पराये   भी  थे   वो   सगे  हो  गये

रहती  है   फिक्र   बंदो  की   अपने उसे
रब   को   नाराज   मत  सोचिए हो गये

कब तलक हो सियासत की बातें मियां
छोड़िए   ये      पुराने      धड़े  हो  गये

हर गुलसिताँ है राएगा गर तितलियाँ न हो

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हर  गुलसिताँ  है  राएगा  गर  तितलियाँ न हो
मतलब  नही  है  जिंदगी   जो  मस्तियाँ न हो

मिलते  हैं   यार   रोज   बहुत  यूँ तो  आदमी
क्या  फायदा  है  जीने  का गर हमनवाँ न हो

गर   मुश्किलात   झेले   नही  दर्द  जाने क्या  
बेकार   है   हयात   जो   मजबूरियां   न   हो

सच्चाई  की  डगर  है  बहुत   कांटो  से  भरी
संभव  है  सीधी  राह  में  ये  सख्तियाँ  न हो

इक  जंग  रोज  लड़  रही सबकी ही जिंदगी
मुमकिन  है  सबके तन पे मगर वर्दियाँ न हो

कुछ दाग  फिर से  चांद पे  आए नजर मियां
मुमकिन  नही  है  उसपे कहीं फब्तियाँ न हो

मरता  नही  है  कोई  भी  अब  शर्म  से यहां
मिलता न कोई  जिसमें ये खुदगर्जियाँ न हो

दुनिया  जहां  की  फिक्र  न परवाह यार की
दुश्मन  मिले  हजार   ही   पर  बे कराँ न हो

मसला  शुरू  हुआ ही था की खत्म हो गया
खबरें वो बन न सकती हैं गर  सुर्खियां न हो

महबूब   ऐसा   चाहिए    हो   सादगी   भरा 
नखरे  मिजाज  नाज  न  हो शोखियाँ न हो

हालात  इस कदर  हुए  बदतर हैं आजकल
हर  बागबां  है  सोचता  गुलशन जवाँ न हो

ठंडी  हवाएं  आसमाँ   कुछ  धूप  भी  मिले 
रौनक नही वो घर में जहाँ खिड़कियाँ न हो