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हर गुलसिताँ है राएगा गर तितलियाँ न हो
मतलब नही है जिंदगी जो मस्तियाँ न हो
मिलते हैं यार रोज बहुत यूँ तो आदमी
क्या फायदा है जीने का गर हमनवाँ न हो
गर मुश्किलात झेले नही दर्द जाने क्या
बेकार है हयात जो मजबूरियां न हो
सच्चाई की डगर है बहुत कांटो से भरी
संभव है सीधी राह में ये सख्तियाँ न हो
इक जंग रोज लड़ रही सबकी ही जिंदगी
मुमकिन है सबके तन पे मगर वर्दियाँ न हो
कुछ दाग फिर से चांद पे आए नजर मियां
मुमकिन नही है उसपे कहीं फब्तियाँ न हो
मरता नही है कोई भी अब शर्म से यहां
मिलता न कोई जिसमें ये खुदगर्जियाँ न हो
दुनिया जहां की फिक्र न परवाह यार की
दुश्मन मिले हजार ही पर बे कराँ न हो
मसला शुरू हुआ ही था की खत्म हो गया
खबरें वो बन न सकती हैं गर सुर्खियां न हो
महबूब ऐसा चाहिए हो सादगी भरा
नखरे मिजाज नाज न हो शोखियाँ न हो
हालात इस कदर हुए बदतर हैं आजकल
हर बागबां है सोचता गुलशन जवाँ न हो
ठंडी हवाएं आसमाँ कुछ धूप भी मिले
रौनक नही वो घर में जहाँ खिड़कियाँ न हो