Thursday, 30 July 2015

गांव हमारा कितना पीछे छुट गया


धुंए से माँ का गहरा नाता था
बाबूजी को चुल्हे का खाना भाता था

अब तो मिट्टी से रिश्ता ही टुट गया
गांव हमारा कितना पीछे छुट गया

धुल भरी गलियों मे दिन गुजरते थे
जिनसे लडते थे उन्ही पे मरते थे

अब तो अपनो से बतियाना छुट गया
गांव हमारा कितना पीछे छुट गया

आंगन मे परिवार इकट्ठा होता था
हर दिन त्योहारो का आलम होता था

अब परिवार एक कमरे मे सिमट गया
गांव हमारा कितना पीछे छुट गया

ख्वाहिशों के लिबास

जिंदगी खैर कर
तलब अपनी

मै तेरा जहर
पी के जीता हुं ..!

ख्वाहिशों के लिबास पर
जरूरतो के पैबंद

सांसो के धागे से
दिन रात सिता हूँ..!!

Wednesday, 29 July 2015

जरूरतें

थकने नही देती जरूरतें मुझको
मेरे बच्चे मुझे बुढा नही होने देते

मजहब

वो प्रसाद भी खा लेता है
           और शिरीनी भी

               भुखे पेट को
               मजहब नही नजर आता

Tuesday, 28 July 2015

ख्वाहिश

अपनी भी है ख्वाहिश
कोई दिल का मसीहा तो मिले

खोये रहे जिसमें सदा
ऐसा कोई जहां तो मिले

जिक्र करे जो सिर्फ हमारा
ऐसी कोई जुबां तो मिले

करे अपने भी दिल से दिल्लगी
ऐसा कोई इंसा तो मिले

जेहन पे जो छाप छोड़ जाये
ऐसा हसीन धोखा तो मिले

अपनी भी है ख्वाहिश हमे
कोई दिलरूबा तो मिले

खयाल

खयालो मे वो आते ही रहे अक्सर
हकीकत में उनसे कभी आया न गया

दिल में है उनके क्या ये तो वो ही जाने
मगर हमसे वह शख्स कभी भुलाया न गया

ताहयात किये जिन पर जां निसार हम
हाले दिल पर उनसे आंसू बहाया न गया

हम रूबरू न हो रजा ऐसी उनकी ही थी
बाजारों में मगर उनसे चेहरा छुपाया न गया

मेरी दीवानगी के चर्चे करता है वो मजे ले लेकर हमसे तो कभी उनका राज कोई सुनाया न गया

नाराजगी ताउम्र की मौत से भी न दुर हुई
हमारी कब्र पर उनसे दो फुल भी चढाया न गया

दिल की बात

दिल की बात दिल में रह गई
लब रहे खामोश सदा

नजरो से वो समझ सके न
मेरे दिवाने दिल की सदा

दुर से ही तकते उन्हें
कभी न उनका रूबरू हुआ

खबर न हुई उन्हें जरा भी
नजरो ने कर दी उल्फत अयां

निगाह उनकी हुई न हम पर
गुजरे करीब से कई मर्तबा

हम उन्हें गुजरते तकते रहे
बन कर पत्थर बेजुबां

डोली संग जनाजा

तु भी सज रही थी वहां
यहां मै भी संवारा जा रहा था

तेरी आँखों में अरमान था
मेरी आँखों में इंतजार था

तु लदी हुई थी गहनों से
मै लादा गया था फुलो से

तु लाल जोडे में सजी थीं
मै सफेद चादर में कैद था

तुझे चार ने उठाया कांधे पर
मै भी चार कांधो पर था

लांघा चौखट तुने घर का
मै भी घर से निकल पड़ा

तु साथ ले जा रही थी जमघट
मुझे हुजूम ले जा रहा था

शहनाइयाँ थी साथ तेरे
मेरे साथ खामोशी थी

तु रोते जा रही थी घर से
मै रोता छोड जा रहा था

तु जिंदगी से मिलने जा रही थी
मै जिंदगी से मिलकर जा रहा था

तेरी डोली रूकी जा पिया घर
मेरा जनाजा पहुंचा श्मशान घर

तु डोली से निकली बाहर
जनाजा पहुंचा मेरा चिता पर

तु उधर सेज पर बैठी
आग लगी मेरी चिता पर

पिया ने छुआ जब तेरा तन
तो मेरा तन चिता में झुलस गया

तु पिया की आगोश में थी
मै मौत की आगोश में था

जब शांत हुआ तुफान उधर
मेरी चिता भी हो गई राख

इस तरह एक और दास्तां
चिता में जलकर हो गई खाक

माँ

...माँ ...उठो न ..माँ .....देख न ...
मुझे कुछ नहीं हुआ है .....उठ न माँ ....उठ न .....

बेटी

बेटी को ब्याह दी पीतल के बालियों मे
वो शख्स जो सोने के जेवर बनाता था

कातर निगाहे

मंदिर के चढावे धिक्कारते है खुद को
चौखट पर भुखी कातर निगाहे देखकर

उसूल

सारे उसूल धरे के धरे रह गए
जो जिंदगी की मुश्किलो से दो चार हुए

खुशी

जो दुसरो पे बोझ हो ऐसी जिंदगी न दे

किसी से छिन कर मालिक तु मुझे खुशी न दे

ख्वाहिशें

मै जरूरतो की गठरी लिए बस्ती बस्ती फिर रहा

ख्वाहिशें बेलिबास ही मेरा पीछा कर रही है

जरूरतें

जरूरतें बेटियोंं सी हर रोज बढ रही है

पगार बेटे है जो कभी बढते ही नही

सपनो का भारत

आजादी की राह पर फना हुए बहुत से वीर

उनके सपनो का भारत लेकिन आज तक गुलाम है

इमान

हम इमानो का बस्ता लिए
फिरते है बस्ती बस्ती

शाम लौटते है तो
अरमा होते है साथ चिंदीयो मे

रोटी

कोई लंगोटी का ख्वाहिशमंद
कोई रोटी का भुखा है

पेट जिसके भरे हुए है
बोटी का भुखा है

झुठे बेर

रावण अंत के कोई जतन काम नही आते
शबरी के झुठे बेर अब श्री राम नही खाते

रश्मो रिवाज

जमाने के रश्मो रिवाजों की दुहाई है
आज फिर इक बेटी की पीहर से बिदाई है

कल तक जिस आंगन चिड़िया चहक रही थी
आज वहा पसरा हुआ मातम है बस रोआँई है

माँ

हम थे माँ के साथ कुछ अच्छे नसीब थे
हम उन दिनो अमीर थे जब माँ के करीब थे

बाबूजी

शहरी दोस्त ने
जब देखा

मेरे स्कूल पहुंचे थे
बाबूजी

बहुत
हंसा था वो

मगर वो रो पडा
उस दिन

जब उसके डैडी का
फोन भी नहीं आया

उसके
जन्मदिन पर

पिता

पिता

शब्द एक
भावनायें अनेक

जिम्मेवारियों के बोझ तले
दबा वो शख्स

जो दिखे कड़क
हो नरम

रहे बनकर छांव हर पल
ओढ़के औलाद की धुप

बाबूजी

मेरी जरूरतो...की कीमत पर... जो अपनी...ख्वाहिशें बेच...आया था... वो थे...

मेरे बाबूजी...

बाबूजी

अपनी ख्वाहिशों को
कभी जाहिर नही किया

मगर हमारी जरूरतो का
हरदम ध्यान रखा

ऐसे थे हमारे बाबूजी

फरमाहिश

गुस्से मे
पांव पटकता

मै
बाहर निकल आया

स्पोर्ट्स शूज
की फरमाइश

पुरी
नही हुई थी

नजर पड़ी जब
टुटे चप्पलो पर बाबूजी के...

आंखे भर आयी...

परिवार

वो हमेशा
हमारे बाबूजी ही रहे

कभी डैडी
या पापा नही बन पाये

शायद
इसीलिए हमे

शहरो की फैमिली से
गांवो के परिवार
अच्छे लगते है

बाबूजी

मेरी हार पे
मुझसे ज्यादा

वो उदास था

मेरे आंसू छलक पडे थे
वो ढाढ़स दे रहा था

ऐसे थे मेरे बाबूजी

बाबूजी

कभी मैंने
पैर नही दबाये

कभी उनकी आंखो को
पढ नही पाया

आज मेरी गृहस्थी मे
मायूसी देखकर

वो बुलाकर पुछते है
बेटा क्या हुआ

जज्बात

किश्तो मे है ख्वाहिशें...कतरा कतरा हयात है... आंसूओ की मंडी मे...बिक रहे जज्बात है...

विरासत

जी हाँ .... मेरे बाबूजी ने मुझे
विरासत में "तमीज़ की तालीम" दी है ....

आपके डैड ने आपको क्या दिया है ?

किस्तो मे

रफ्ता रफ्ता दिन गुजर रहा
धज्जी धज्जी ये हयात

किस्तो मे चल रही है सांसे
रही अच्छी उनसे मुलाकात

पोस्ट मार्टम

भूख से मरने वालों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट बड़ी अजीब थी...

पेट खाली, दिल भरा आँखों में शर्म और जुबाँ पे तहजीब थी.

रोजा

हर दिन यूँ ही फाको मे गुज़रे
जाने कब हमारा रोजा खुलेगा

गुरूर

दहलीज से लगी खड़ी है रहमते
गुरुर निकले तो भीतर आ जाये....

किताब

तमाम रईशजादे खौफजदा है शहर के
एक कोठे से किताब लिखने की खबर आयी है

तनख्वाह

मेरी तनख्वाह मुझ पर हँसती है ....
मेरी ख्वाहिशों को देखकर

जमीर

इक चीज़ थी ज़मीर जो वापस न ला सका,,
लौटा तो है ज़रूर वो दुनिया खरीदकर,,

आंसू

आंसू...उबाल रही है...माँ...खाली पतीले मे...
त्योहार है...बेटे को...कुछ तो खिलाना है...

नजरिया

नजर का आपरेशन तो सम्भव है,
पर नजरिये का नही..!!!

माँ

माँ का पल्लू भीगा भीगा लगता है
त्योहारो मे बेटा भुखा सोया है

मिट्टी का चुल्हा

कोने मे पड़े मिट्टी के चुल्हे को देखकर
धुंए मे आंखे जलाती माँ याद आती है

हमारा गाँव

धुंए से माँ का गहरा नाता था
बाबूजी को चुल्हे का खाना भाता था

अब तो मिट्टी से रिश्ता ही टुट गया
गांव हमारा कितना पीछे छुट गया

रावण

एक रावण था
दुनिया दुखी थी

विधाता खुद आये
उससे मुक्ति दिलाने

आज तो कई रावण
हमे घेरे हुए चारो ओर से

आज कोई राम भी नही
जो इनसे बचाए

खामियां

मुझमें हजार खामियां हैं माफ कीजिए

पर अपने आइने को भी तो साफ कीजिए..

आशियाना

इमारतों मे छिप गया है दरख्तों का वजूद

परिंदे अब खिडकियों पे आशियाना तलाशते है

खत

कुछ खत आये थे
सरहद पार से

सारे
खाक हो गए

बस लिफाफे
बच गए है

वो भी
बगैर पते के

बेबस जिंदगी

कोठे मे दोस्तो के संग
हम भी हो लिये

सब हुस्न देखते रहे
हम बेबस जिंदगी

हिन्दू या मुसलमान

जो चला गया वो कौन था..हिन्दू या मुसलमान...???

इन सबसे जुदा वो शख्स था खुद में पूरा हिन्दुस्तान ...!!!

अखबार वाला

अखबार वाला खुद आज अखबारो मे है
उसकी रोशनाई आज चांद सितारो मे है

कलाम

तिरंगे मे लिपटा अनोखा पैगाम आया है
भारत माँ का सच्चा सपूत कलाम आया है

माँ

चोट जरा भी लगती है
जुबा पे माँ आ जाती है

भय कही जो लगता है
माँ की याद सताती है

विचलित हूँ व्यथित हूँ संसद की तरह स्थगित हूँ

विचलित हूँ व्यथित हूँ
संसद की तरह स्थगित हूँ

सफेदपोशो की भीड़ मे
एक मै ही पतित हूँ

मजबूर हूँ जनता हूँ
खादी के आश्रित हूँ

कल ख्वाब देखा था
आज भी भ्रमित हूँ

राजनितिक मुद्दा हूँ
समाज का शोषित हूँ

मुद्दो पर अटल हूँ
संसद का दुर्भाग्य पटल हूँ

लोकतन्त्र के बलात्कार पर
होता रहा लज्जित हूँ

व्यग्र मन का झंडाबरदार
देश का भविष्य हूँ

दुराग्रहियों के कटोरे का
मीठा नवनीत हूँ

आज मै व्यथित हूँ
संसद की तरह स्थगित हूँ