Friday, 24 January 2020

उनकी गलियों से कभी भी तो गुजर कर देखिये

उनकी गलियों से कभी भी तो गुजर कर देखिये 
मुफलिसो की  बस्तियों मे  भी उतर कर देखिये 

जिंदगी  वो  किस कदर  मजबूरियों से  लड रहे
साथ  उनके  एक दिन ही  तो बसर कर  देखिये

भुखे  बच्चे  देख  कर  मुँह को कलेजा आता है 
कोई  लम्हा  ऐसे  अहसासों  गुजर  कर  देखिये

फाको  में  ही   बीत  जाते  हैं  बड़े  त्योहार  भी
फिर   से  इतराते   रफू   लिबास  ही पर देखिये

लोरियों  में   ख्वाब दिखलाती है बहलाती है माँ 
रात भर   सोती नही मां   आप  ये कर   देखिये

ख्वाहिशें  दम  तोडती  है रोज ही  दहलीज़ पर
गर मिले फुर्सत कभी तो  इक नजर भर देखिये

ताकती   रहती है   उम्मीदी  निगाहें   हर बखत
उनकी  झोली मे  नजारे कुछ नजर कर देखिये

मेरे मालिक  ने  अगर  काबिल  बनाया है  तुम्हे
कुछ  जरूरतमंद  पर भी  तो  मेहर कर देखिये

आदमीयत शहर से खोने लगी है आजकल

आदमियत  शहर  से  खोने  लगी है आजकल 
इज्ज़तें   नीलाम   ही  होने   लगी है आजकल 

बिक रहे  इंसाफ भी  अब कौड़ियों के दाम पर 
देख  हालत   जिंदगी   रोने लगी है  आजकल

दफ्न  कर दी  ख्वाहिशें घर की खुशी के वास्ते
उनकी  रुसवाई  नजर  धोने लगी है आजकल

रब्त की  सौगात  जो  पाकर के हम  इतराते थे
उनकी  बोली   तीर चुभोने  लगी है  आजकल

बीज जो रोपा था  हमने  कल मुहब्बत के लिए 
नफरतें   नस्लें  नयी   बोने  लगी  है  आजकल

जिनके कांधो पे हिफाजत का रहा जिम्मा सदा
साजिशों में  वो शरिक होने  लगी है  आजकल

हर तरफ ही है मची कुछ अफरातफरी सी यहां 
और  हुकूमत  चैन से  सोने  लगी है  आजकल

Friday, 10 January 2020

कम्युनल हूँ डर लिखता हूँ

कम्युनल हूँ   डर   लिखता हूँ
उल्टा-सीधा   पर   लिखता हूँ

देखे  हैं       आडंबर       ढेरों
पत्थर को भी  हर  लिखता हूँ

कोठी  वालो  को   ईश्वर   अर
बेघर  को   बेघर   लिखता  हूँ 

रात को  रात ही  कहता हूँ  मैं
अख्तर को अख्तर लिखता हूँ

उन्मादी    फिरको   के   हत्थे
चढ़ते  बेबस   सर  लिखता हूँ

बद नियत  के   कारण  बहते
हर इक आंसू  पर  लिखता हूँ

जिसको तुम उत्सव कहते हो
उसको मैं  महशर  लिखता हूँ 

मुल्क मुहब्बत   तोड़ने   वाली
सोच को मै  जर्जर लिखता हूँ

तुम  पढ़ते हो  अपने  मन की
मै  भी तो  मन भर लिखता हूँ

झूठ  नही   लिख्खा  जाता है
सत्य का  हर स्तर  लिखता हूँ

मुल्क परस्ती   भी   है  मुझमें
दहशत गर्दी  बर   लिखता हूँ

भारत माता  की  जय  कहता
पहले देश अक्सर  लिखता हूँ

हर  मसले  पर  खूब लिखा है
हर हुक्काम  इतर  लिखता हूँ

खांचो  में  दिखती  है  दुनिया
इस पर या उस पर लिखता हूँ

गल्त कहे तो  कहता  रहे  वो
ऐसों को अब  मर  लिखता हूँ

दुनिया लिखती हैं जो लिख्खे
खुद को मै  बेहतर लिखता हूँ

Wednesday, 8 January 2020

क्या खयाल उनको हमारा कभी आया होगा

क्या   खयाल उनको    हमारा    कभी   आया होगा 
यूँ   ही  उनका  भी   कभी  दिल   गुनगुनाया   होगा

उठ  के     वो   बैठ     गए   होंगे     कभी   रातों  में
देख     ख्वाबों में     हमे     दिल   मुस्कुराया   होगा

मन भी    तड़पा   होगा   मिलने को   कभी हमसे यूँ 
नाम     लब  पर  भी   हमारा   कभी     आया होगा

झुक गई    होंगी      निगाहें   भी     कभी  शर्माकर
बैठे बैठे       वो    हमें    याद में      लाया      होगा

वो  कभी    गुस्सा   कभी  प्यार    का    बेचैनी पन 
तजकिरा    उनको     हमारा    कभी   भाया  होगा

बैठ    खिलवत में   कभी   हमको  वो  सोचा  होगा 
फिर  जफाओं  पे भी    अपने  वो   लजाया   होगा

जब  परेशान     खयालो  ने     किया  होगा    उन्हें 
अश्क आंखों में भी फिर  खुद ही उतर आया  होगा

Monday, 6 January 2020

वैसे हम इत्मीनान से आए गये तो हैं

वैसे   हम इत्मीनान  से   आए   गये   तो हैं
पर  उस  गली में    लोग   डराए  गये तो हैं

हालात   कुछ   जटिल   है   मुद्दे   महीन है
टीवी  पे   नोक झोंक   चलाए   गये   तो हैं

आंसू  वहाँ पे   पोंछने   बहती   निगाहों से
बनकर के  अपने   लोग    पराए  गये तो हैं

पर  हौसलो के  काट के  पंछी को कैद कर
उम्मीद  के    मीनार    गिराए    गये   तो हैं

रोटी   मिलेगी   ख्वाब में   देकर तसल्लियाँ
बच्चें    गरीब घर  के    सुलाए   गये  तो हैं

कुछ  मसअलों  से  ध्यान  हटाने के  वास्ते
मुद्दे  सियासी  तौर     उठाए     गये   तो हैं

संगीन  चाहे  मामला  कितना भी हो मियां
आये  गये   की  तर्ज   भुलाए   गये   तो हैं

राहत  के  नाम    बांटी  गयी   रेवड़ी  यहाँ
मजलूम  इस कदर  भी  सताए  गये  तो हैं

आधे-अधूरे  सच ही  दिखाते  हैं लोग अब
सब  असलियत  बखूब  छिपाए  गये तो हैं

मुद्दे  यहाँ  सियासी  है  बस  और कुछ नही
हालात   जो   बने  हैं   बनाए   गये   तो  है

यूँ ही  नही  ये  हादसा  बरपा यहाँ है  आज
बारूद    मुद्दतों   से    उगाए   गये    तो  हैं

पहलू में रख के आग ही चलने लगे हैं लोग
जुल्मत  के दाग   यूँ भी  छिपाए  गये तो हैं

मुद्दत  हुई  न देखा  उजालों  की  शक्ल को
शिद्दत  से   आफताब   बुलाए   गये  तो  हैं

कहीं के जुल्म कहीं के गुनाह भी आये

कहीं के  जुल्म   कहीं के  गुनाह  भी  आये
हवा के  साथ  भटकते कुछ आह भी आये

जमीन  फाड़ के   मुर्दे  लगे  निकलने  जब
तबाह  करने  को फिर खैर ख्वाह भी आये

हरेक लफ्ज़ के मानी बदल बदल के मियां
कलम  के  शाह  कलंदर  इलाह  भी  आये

सुखनवरी  की  महक  तोड़  सरहदें  आयी
तो  साथ साथ  ही  बादल सियाह भी आये

हरफ हरफ  पे  हुए  तजकिरे  हजार  मगर
सवाल  मौन  ही   रखने  सलाह  भी  आये

जहन  असीर   जुबां    इंकलाब   के   नारे
दो मुँहो  वाले   कुछ ऐसे  गवाह  भी  आये

वतनपरस्ती  का   उनका  अलग  तरीका है
हम आये सजदे वो कोई और राह भी आये

सफ़ीने    थाह    लगा    पाये ना समंदर की
बचा के जान अब अपनी मल्लाह भी आये

मुहब्बत के दीप हम जलाएँ कहाँ तक

मुहब्बत  के  दीप हम  जलाएँ कहाँ तक
हम उम्मीद  को    आजमाएँ   कहाँ तक

गया  मोड़ कर  मुंह  वो आया नही फिर 
कि  रो रो   उन्हें  हम   बुलाएँ  कहाँ तक

सितमगर   सताना   गया   भूल   शायद
अब अपने से खुद को  सताएँ कहाँ तक

नही  याद  रहती  हैं   सुरत  अब उनकी
हुए   मुद्दतों    याद     आएँ    कहाँ तक

दिली   हसरतें   फिर    उभरने   लगी है
जो  हों   रूबरू  तो   दबाएँ   कहाँ तक

भले   दुरियाँ   दरमियाँ   आ   गयी   हो 
नजर  की  मुहब्बत   छिपाएँ  कहाँ तक

सरेराह     यूँ    बोलता    वो    नही   है
पर हम    जानते  हैं   सदाएँ  कहाँ तक

कभी  झांक लेता  कनखियों से  वो भी
कसक हूक  दिल की छिपाएँ कहाँ तक

जिगर की  जिगर से  हुई  बात फिर तो
चला   दौरे उल्फत   बताएँ   कहाँ  तक

है बर्बाद पहले ही जब दिल की दुनिया
लगे   अब  भला   बद्दुआएँ   कहाँ तक

सिसकते हुए मुस्कुराएँ कहाँ तक

122 122 122 122

सिसकते   हुए     मुस्कुराएँ    कहाँ तक
भरे  दिल   कहो   गुनगुनाएँ   कहाँ तक

सितारे  ही  गर्दिश  में है  जब कि अपने 
हिफाजत   करेंगी    दुआएँ    कहाँ तक

शिकायत  है  यूँ  तो   बहुत   जिंदगी से
मगर  हर  घड़ी  अब   बताएँ  कहाँ तक

बड़ा  खौफ  सा  आजकल  है  दिलों में
भला खुद को  अब  बरगलाएँ कहाँ तक

दिया  इक  मुंडेरो  पे  रख्खा  है  लेकिन
हवाओं  से   उसको   बचाएँ   कहाँ तक

चली है  अजब सी  सबा  मुल्क  में अब
अब अपने ही घर हम न जाएँ कहाँ तक

सलीबो  मे  लटकी  हर इक  जिंदगी  है
ये ख्वाब अब सुनहरे  सजाएँ  कहाँ तक

हर इक  मोड़  पर   हादसा   मुंतजिर है
अब हर दिन ये मातम  मनाएँ कहाँ तक

हवाओं  का  रुख फिर  दिखे हैं इधर ही
चरागों   से   दामन    बचाएँ   कहाँ तक

शिकायत शिकायत शिकायत शिकायत
भला  सर  वतन  अब झुकाएँ कहाँ तक

बहुत   हक बयानी   किये   जा  रहे  जो
कहें   फर्ज  अपना   निभाएँ   कहाँ तक

वहीं है दिन है वही रात फिर नया क्या है

1212 1122 1212 22
वहीं है दिन  है वहीं  रात  फिर  नया क्या है 
ये तारीखों के सिवा कुछ बदल हुआ क्या है

सहमते   कांपते से     लोग  नजर   आते है 
उदासियों के सिवा  कुछ कहीं दिखा क्या है

गुजर रहे हैं  फकत  दिन महीने साल  यूँ ही 
तुम्हारी याद है  और कुछ  फिर बचा क्या है

कुछ एक   लम्हें  ही  हिस्से   हमारे  आए हैं 
तेरी  नराजगी  से बढ़  कभी  मिला  क्या है 

निकल पड़े हैं  हर इक सुब्ह  ढूंढने खुद को
हर एक  शाम  ही घर  पुछता  बता  क्या है 

बखूब  चेहरे   को   पढ़  लेते    बाबूजी  मेरे 
उदास  देख के   पुछ लेते थे   हुआ  क्या है

जो माँ ने  हाथ  धरा  सर पे  मुस्कुरा कर के
मै मुश्किलात  गया  भूल  सब  दुआ क्या है