Monday, 6 January 2020

मुहब्बत के दीप हम जलाएँ कहाँ तक

मुहब्बत  के  दीप हम  जलाएँ कहाँ तक
हम उम्मीद  को    आजमाएँ   कहाँ तक

गया  मोड़ कर  मुंह  वो आया नही फिर 
कि  रो रो   उन्हें  हम   बुलाएँ  कहाँ तक

सितमगर   सताना   गया   भूल   शायद
अब अपने से खुद को  सताएँ कहाँ तक

नही  याद  रहती  हैं   सुरत  अब उनकी
हुए   मुद्दतों    याद     आएँ    कहाँ तक

दिली   हसरतें   फिर    उभरने   लगी है
जो  हों   रूबरू  तो   दबाएँ   कहाँ तक

भले   दुरियाँ   दरमियाँ   आ   गयी   हो 
नजर  की  मुहब्बत   छिपाएँ  कहाँ तक

सरेराह     यूँ    बोलता    वो    नही   है
पर हम    जानते  हैं   सदाएँ  कहाँ तक

कभी  झांक लेता  कनखियों से  वो भी
कसक हूक  दिल की छिपाएँ कहाँ तक

जिगर की  जिगर से  हुई  बात फिर तो
चला   दौरे उल्फत   बताएँ   कहाँ  तक

है बर्बाद पहले ही जब दिल की दुनिया
लगे   अब  भला   बद्दुआएँ   कहाँ तक

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