मुहब्बत के दीप हम जलाएँ कहाँ तक
हम उम्मीद को आजमाएँ कहाँ तक
गया मोड़ कर मुंह वो आया नही फिर
कि रो रो उन्हें हम बुलाएँ कहाँ तक
सितमगर सताना गया भूल शायद
अब अपने से खुद को सताएँ कहाँ तक
नही याद रहती हैं सुरत अब उनकी
हुए मुद्दतों याद आएँ कहाँ तक
दिली हसरतें फिर उभरने लगी है
जो हों रूबरू तो दबाएँ कहाँ तक
भले दुरियाँ दरमियाँ आ गयी हो
नजर की मुहब्बत छिपाएँ कहाँ तक
सरेराह यूँ बोलता वो नही है
पर हम जानते हैं सदाएँ कहाँ तक
कभी झांक लेता कनखियों से वो भी
कसक हूक दिल की छिपाएँ कहाँ तक
जिगर की जिगर से हुई बात फिर तो
चला दौरे उल्फत बताएँ कहाँ तक
है बर्बाद पहले ही जब दिल की दुनिया
लगे अब भला बद्दुआएँ कहाँ तक
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