Monday, 30 November 2015

जीने का तरीका वो जानता है बहुत

जीने का तरीका वो जानता है बहुत
मुश्किलो से तो गहरा रिश्ता है बहुत

उम्र पुरी गुजारी है इसी जद्दोजहद मे
अपनो की भीड़ मे भी तन्हा है बहुत

मुफलिस की बस्ती मे जलता है दिया
आज भी वहां किश्त पे जिंदा है बहुत

रईसो की कोठी मे रिश्ते बेलिबास है
गरीब घर मे बेटियों पर परदा है बहुत

सजदे मे वो दर दर ही झुकता रहता है
दैरो हरम की तासीर मानता है बहुत

ताउम्र की मिल्कियत अल्फाज दे रहा
बच्चो के सामने आज शर्मिंदा है बहुत

लडा जो जिंदगी से वो अब हार गया
बेटी को बिदा करते हुए रो रहा बहुत

कभी खुशी कभी गम मे ही गुजर गई
ये जिंदगी बस बेवफा है बेवफा बहुत

उजाला भी देखो निकला है हिजाब मे

उजाला भी देखो निकला है हिजाब मे
बादलो का साया है आज आफताब मे

जहर सी फैली हुई है फिजाओं मे सारी
नही मिलती अब कही खुशबू गुलाब मे

हकीकत मे जो हासिलात होते नही है
क्यूं चले आते है वो सताने यूँ ख्वाब मे

एक हम है  उनके इश्क मे मरे जाते हैं
अहसास भी नही है इश्क का जनाब मे

आया गुरूर है उनके मिजाज मे शायद
पुरजे मिले  अपने ही खत के जवाब मे

शरीफुन् नफ्स सभी बस्ती से चल दिए
बेईमान जो अब घुमने लगे है नकाब मे

आसमां को निहारते रातें बीत जाती हैं
भुखे को नजर आती रोटी माहताब मे

नेमतो के बाजार सज गये चौक चौराहे
मेहर मिलने लगी औकात के हिसाब मे

Sunday, 29 November 2015

होठों पे मुस्कान दिलो मे खाई है

होंटो पे मुस्कान दिलो मे खाई है
अपनो ने भी खुब रस्म निभाई है

कोने मे पडी रो रही है बुढी आंखे
आज भी न आयी मां की दवाई है

आज वसीयत बनवायेंगे बाबूजी
इसी खातिर ही इकट्ठे सारे भाई है

छोड के सारे नाते बेटी चल देती है
जमाने की इन रवायतो की दुहाई है

हिस्सा मां का वो बाबूल की लाडली
अनजाने संग करनी उसकी विदाई है

पीहर औ ससुराल मे बेटी बंट जाती
कतरा कतरा सबके हिस्से मे आयी है

आज यकीनन ये तकिये गीले हो जाये
आंखो से जब्त कैदी को दे दी रिहाई है

Saturday, 28 November 2015

ये अदद एक देश ही नही है

ये अदद एक देश ही नही है ये माता हमारी है
असहिष्णुता नाराजगी क्या माता से तुम्हारी है

मां के चार बेटे है तो आपस मे तकरार होती है
कभी रूठ जाने पर क्या ममता पर वार होती है

देश ने तुम्हे इज्ज़त दौलत औ शोहरत अता किया
जरा खरोंच से तुमने अपना सारा हाल बता दिया

भारत माता के बहते आंसू तुमने बोलो कब पोंछे
अपनी हैसियत से किसी लाचारो की कब सोचे

दानिशमंद कलमनवीस फनकार और जाने कई
दुकानदारी जब चलती रही जुबाने खामोश रही

आपके कलम से फन से कौन सी क्रांति आ गई
कहां अब माहौल बिगड़ा कहां अशांति आ गई

देश मे अब भी भुखे है अब भी लाचार बसते है
दो तल्ले रहने वाले आज चार तल्लो पर बसते है

कभी लाचारी भ्रष्ट व्यवस्था अपनी दो बाते बोलो
असमानता अशिक्षा आतंकवाद पर मुह खोलो

असहिष्णुता का नारा ही ये राजनीति से प्रेरित है
देश हित की बात करो रिआया त्रस्त है उद्वेलित है

अलग मुकाम हासिल है तो दानिशमंदी परिचय दो
पक्षपात से दूर रहकर तुम निष्पक्ष भरा निर्णय दो

देश ने तुम्हे चाहा है अपने सर आंखो पर बिठाया
अपनी ओछी हरकत से तुमने सबका दिल दुखाया

इज्ज़त के बदले ही अक्सर इज्ज़त है मिला करती
प्यार मोहब्बत के आगे सारी ही बुराई डरा करती

Wednesday, 25 November 2015

सीधा सादा सा बंदा भी अब खबर मे रहता है

सीधा सादा सा बंदा भी अब खबर मे रहता है
मुद्दआ जबसे बना है निवाला नजर मे रहता है

थोडी खुशियाँ हासिल करने किश्तों पे जीता है
कतरो मे है बंटा हुआ हर पल कबर मे रहता है

आज उसकी बस्ती मे खुब भीड़ भरी रहती है
कोई न जाता था कलतक वो जिधर मे रहता है

कल जो बेचारा आम था खास बन बैठा है वो
चुनावी दौर मे वो सियासत के असर मे रहता है

सीधा सादा सा बंदा भी अब खबर मे रहता है

सीधा सादा सा बंदा भी अब खबर मे रहता है
मुद्दआ जबसे बना है निवाला नजर मे रहता है

थोडी खुशियाँ हासिल करने किश्तों पे जीता है
कतरो मे है बंटा हुआ हर पल कबर मे रहता है

आज उसकी बस्ती मे खुब भीड़ भरी रहती है
कोई न जाता था कलतक वो जिधर मे रहता है

कल जो बेचारा आम था खास बन बैठा है वो
चुनावी दौर मे वो सियासत के असर मे रहता है

Tuesday, 24 November 2015

नजर मिलते ही दिल मे उतर जाते हैं

नजर मिलते ही दिल मे उतर जाते हैं
कमाल खुब इक लम्हे मे कर जाते है

संजो के रखे थे अरमान हमने सीने मे
बेखयाली मे चिंदी चिंदी कतर जाते है

गजब है अव्वल वो कभी मिलते नही
जो मिलते है तो कतराते गुजर जाते हैं

सुर्ख फुलो सी महक उठती है सब राहे
नर्म पैरो चहलकदमी मे जिधर जाते हैं

बेहद शातिरी से वो हर कतल करते है
मुस्कुरा के वो सादगी से मुकर जाते हैं

जिन्होंने देहरी भी न लांघी थी घर की
तन्हाई के संग उल्फत ए सफर जाते हैं

इश्क की गलियों का पता जानते नही
बदहवासी मे वो अंजाने शहर जाते हैं

इश्क की शान मे गुस्ताखी न हो जाए
बेहद सलीके से हम उनके घर जाते हैं

अंधेरों की हस्ती को मिटाने एक टुकड़ा धुप

अंधेरो की हस्ती को मिटाने के वास्ते
एक टुकड़ा धुप मेरे घर भी चाहता हूँ

मेरे बच्चे भी कभी आसमान देख ले
थोडे से उजाले मै इधर भी चाहता हूँ

वाकिफ हूँ बखुब ऐ खुशी तेरे कद से
करना तुझे हासिल पर भी चाहता हूँ

सजदे मे परवर हम जो रहते है हरसूं
इबादत का अपने असर भी चाहता हूँ

उम्र यूँ ही उलझने सुलझाने मे गुजरी
सुखन ख्यालो के सफर भी चाहता हूँ

हकीकत में ईमानदारी अब दोगलो मे दिखता है

हकीकत मे ईमानदारी अब दोगलो मे दिखता है
रवायतो का वो चलन अब चोचलो मे दिखता है

जाओ परिंदो अब अपना बसेरा कही और करो
मेरे शहर मे पानी तक अब बोतलो मे बिकता है

फैले हाथो पर चवन्नी देने तक औक़ात नही है
भूख खडा चौराहे पर शौक होटलो मे बिकता है

बाजारो मे आंसूओ के खरीदार कहां मिलते है
जज्बात भी तो मुशायरो महफिलो मे दिखता है

अभागी सी इक झोपडी बेचारी अंधेरे मे रहती
जगमगाता सारा मंजर बस बंगलो मे दिखता है

मेलजोल की वो बाते तो भूली बिसरी हो गई
सारा भाईचारा तो बस अब जंगलो मे दिखता है

कोठीयो मे हरदम ही पकवान छनाते रहते है
जाने कब से पसरा मातम चुल्हो मे दिखता है

रिश्ते नाते अपने घर पर भी आते जाते रहते है
बदले हुए लहजे अब उनके बोलो मे दिखता है

Saturday, 21 November 2015

बेचैन दिख रहा है मुझे गोदी मे सुलाने वाला

बेचैन दिख रहा है मुझे गोदी मे सुलाने वाला
खामोश होकर बैठा है वो लोरियां गाने वाला

जरूरते रोज बढती जाती है जेब छोटे हो रहे
कशमकश मे उलझा है घर को चलाने वाला

कैसी ख्वाहिशें दफ्न करे कौन सी शय टाले
उधेड़बुन मे फंस हुआ है बाजार जाने वाला

पुराने से घर के आंगन मे इक बुढा सा दरख्त
खडा पुरानी यादे ले खो गया उसे लाने वाला

बुढे दरख्त की शाखो पे बांधी थी यादे कभी
झुला यादो का बंधा है न मिला झुलाने वाला

कुछ अजीज अपने भी इसी शहर मे रहते है
रास्ते खड्डे बडे है उनके घर तक जाने वाला

रिश्तो की भीड़भाड रिश्ते यूँ ही बन जाते है
कहने को है नाते ये नही कोई निभाने वाला

Friday, 20 November 2015

रुह से चल जिस्म तक हो रही बगावत देखिये

रूह से चल जिस्म तक हो रही बगावत देखिये
दिल से दिल के दरमियाँ कैसी अदावत देखिये

किस कदर मायूस हो हम उस शहर से लौटे है
तेरे दर पे तुझसे न मिलने की मलालत देखिये

अहसास तेरी रूसवाई का अश्को को भी रहा
सुख गई आंखे ही रिश्तों की नजाकत देखिये

आशनाई मे तेरी हम तुझसे ही मशहूर हुए है
तुमको ये भी खबर नही हद जलालत देखिये

रूबरू जब हो कभी वो तब न सुनाये दास्तां
रकीबो से खबर लेने की खुब अदायत देखिये

दैरो हरम क्या मालूम उसको ही जाना खुदा
आस्ताने सब भूल गये ऐसी अकीदत देखिये

मसफिल सजी है वहां घर मेरे घर मे खामोशी
न्यौता शरीकी भेज रहे उनकी शराफ़त देखिये

गुजर कर देखिये

कभी उनकी गलियों से भी गुजर कर देखिये
मुफलिसो की बस्तियों मे भी उतर कर देखिये

मजबूरी मे जिंदगी से किस कदर वो लड रहे
साथ उनके एक दिन आप बसर कर देखिये

भुखे बच्चे रोते देख कलेजा मुंह को आता है
कोई लम्हा ऐसे अहसास से गुजर कर देखिये

बडे बडे त्योहार यूँ ही फाको मे बित जाते हैं
नये जानकर रफूगर लिबास पैहर कर देखिये

रात रात भर आंसूओ को उबालती रहती है
माँ कभी सोती नही है आप जागकर देखिये

ख्वाहिशें दम तोडती रहती है अक्सर हर वक्त
कभी फुर्सत लम्हो मे निगाहे उधर कर देखिये

उम्मीद भरी निगाहे ताकती रहती है चहुंओर
उनकी झोली मे कुछ नजारे नजर कर देखिये

मेरे मालिक ने गरचे काबिलियत अता की है
जरूरतमंदी मे तुम भी कभी मेहर कर देखिये

Tuesday, 17 November 2015

कोई मजहब तो कोई जात देखता रह गया

कोई मजहब तो कोई जात देखता रह गया
इक परिंदा हैरां सा हालात देखता रह गया

कुछ उल्टे सीधे से सवालात देखता रह गया
बदले हुए लोगो के जज्बात देखता रह गया

चल रही है मुल्क मे बयार ही कुछ इस तरह
सीधा सा बंदा बस करामात देखता रह गया

सलामत पांव फिर भी अपाहिज है जेहन से
बस वो रहनुमा के निशानात देखता रह गया

खरीदने निकला था थोड़ी खुशियां बाजार मे
बहुत दूर था चांद मै औकात देखता रह गया

अंधेरो के घने बादल छटेगें जाने कब तलक
उजालो का मुंतजिर लमहात देखता रह गया

कहते रहे जो तुमसे अब मिलेंगे न हम कभी
मुद्दतो मे जो मिले मुलाकात देखता रह गया

कैसी ये जगह कैसे दयार हो गये

कैसी ये जगह कैसे दयार हो गये
भले भले लोग भी बीमार हो गये

ये बदली हुई हवाओ का असर है
बेअदबी बच्चो के संस्कार हो गये

कल जहा अम्न के परिदे उडाते थे
दहशत उस मुल्क के मयार हो गये

नफरत भरे हुए दिलो मे हर शख्स
जहर मिले फिजा के बयार हो गये

हिफ़ाज़त कौन करेगा मजलूम की
दहशतगर्द जो सिपहसलार हो गये

खिलखिलाते चेहरे मायूस से दिखे
घर के बीच जो खडे दीवार हो गये

माँ बाबा अब एक कोने मे रहते है
बेटे के भी तो अब परिवार हो गये

होली औ दिवाली भी बेनूर से रहे
मंहगे अब तो सारे त्योहार हो गये

बेशक कोई आफत आने वाली हो
बदले बदले से मेरे सरकार हो गये

सितम वो करता रहा मजे ले लेकर
हम शिकवा किये गुनहगार हो गये

Monday, 16 November 2015

संजीदगी में भी शरारत ढुंढ लेती है

संजीदगी मे भी शरारत ढुंढ लेती है
दरिंदगी मे भी शराफ़त ढुंढ लेती है

मुल्क मे बडी काबिल दानिशमंदी है
आतंक पर भी सियासत ढुंढ लेती है

कारोबारी की नजर बडी पारखी है
दाने दाने मे जो तिजारत ढुंढ लेती है

चुल्हे ही ठंडे पड जाते है जब घरो मे
भुख पानी मे भी जरूरत ढुंढ लेती है

जमाने मे कुछ भी नाहक नही होता
काबिली जर्रे मे नसीहत ढुंढ लेती है

रिश्तो से चाहे मुलाकात न हो कभी
शौक अपने लिए फुर्सत ढुंढ लेती है

मुहब्बत की जुस्तजू बहुत मुश्किल है
निगाहे इक पल मे नफरत ढुंढ लेती है

नयी कलम को तवज्जो नही मिलती
पर भी कलम ये गफलत ढुंढ लेती है

Friday, 13 November 2015

त्योहारो के बहाने भी कुछ काम नही आये

त्योहारो के बहाने भी कुछ काम नही आये
रिश्तो से मुलाकात किये अरसा गुजर गया

रहता था वो हरदम ही अपनो की भीड़ मे
वक्त ने ली करवट कुछ यूँ तन्हा गुजर गया

कम्बख्त दिल ताउम्र ही मुंतजिर बना रहा
राहो को तकते एक एक लम्हा गुजर गया

हम मोतियों के मानिंद रिश्ते जोडते रहे
वाहियात से काम मे वक्त बेजा गुजर गया

कमाने के दौर थे जब आशिकी करते रहे
बरबाद हुई जिंदगी बस मौका गुजर गया

आस्ताने दैरो हरम भी ढुंढकर हम आ गये
मिला नही जाने कहां फरिश्ता गुजर गया

बेसुध होकर गिर पड़ा वो भुखा चौराहे पर
अनदेखा करके उसको हर इंसा गुजर गया

चिल्लरो मे खनकते जज्बात को देखा

चिल्लरो मे खनकते जज्बात को देखा
आज फिर दबे हुए से हालात को देखा

जगमगाते शहर के उजास के दरमियाँ
एक नन्हे से दिये की औक़ात को देखा

त्योहारो की सब चमक फीकी पड गई
कुडे बिनते हुए जब नवजात को देखा

त्यौरियां चढ जाती है जिनको सुनकर
ऐसे भी चुभते हुए सवालात को देखा

अदावत रखते थे जो जमाने के रूबरू
उनमे छिप छिप के मुलाकात को देखा

हया की दहलीज़ लांघ नहीं पाए कभी
दायरे मे बंद लफ्ज़े मोहताज को देखा

बहुत माहिरी हासिल है बरसने मे इन्हे
आंखो से बेमौसम के बरसात को देखा

किश्तों पे है मौत पर भी हौसले बुलंद
जिंदगी से वो जंग के लम्हात को देखा

Monday, 9 November 2015

हर शख्स यहां अपनी बदगुमानी मे रहता है

हर शख्स यहां अपनी बदगुमानी मे रहता है
बेपरवाह हकीकत से जुदा रवानी मे रहता है

आजकल की नई फसल के शौक है बडे बडे
नही दिखता है बाप किस परेशानी मे रहता है

कोठियो तक सिमट गई चकाचौंध त्योहार की
अंधेरा सदा ही झोपडी के जिंदगानी मे रहता है

छुटभैये हमारे गांव के निजाम बनकर फिर रहे
हमने सुना था वो हुकुमते राजधानी मे रहता है

खुशियो की तलाश मे जो जद्दोजहद करता है
पसीना भी उसी शख्स की पेशानी मे रहता है

परेशान हो सकता है सच हारता नही कभी
झुठ जो है हरदम ही गलत बयानी मे रहता है

हर शख्स के किरदार मे रहता है असर खुन का
ओछी हरकते नही किसी खानदानी मे रहता है

खुशी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है

खुशी देर तक किस शख्स के हिस्से मे रहती है
हंसी भी लरजते हुए गरीब के चेहरे मे रहती है

जमाने की बदली हुई हवाओ से डर लगता है
बिटिया अक्सर गरीब घर की परदे मे रहती है

हालात कुछ यूँ है कि घर के चुल्हे ठंडे हो गये
बिलखते बच्चे देख माँ हरदम गुस्से मे रहती है

भीड़ लगी है अपनो की पर भी बेगाने है हम
कुछ हमारी नातेदारी रिश्तो के मेले मे रहती है

बेमोल वफाऐ अब तो बिकने लगी बाजार मे
कुछ उसूले बदहवास होकर रस्ते मे रहती है

ख्वाबों के सारे आशियां जर्रा जर्रा बिखर गए
हमारी अधुरी ख्वाहिशें अब टुकड़े मे रहती है

चाहतो के दौर कभी के खत्म हो गये है सब
आशिकी आजकल तो बस झमेले मे रहती है

झुठ के साथ तो सारी दुनिया खडी हो जाती है
सच्ची शख्सियत ही अक्सर अकेले मे रहती है

Thursday, 5 November 2015

बेबसी के उस हालात ने सोने न दिया

बेबसी के उस हालात ने सोने न दिया
कुछ चुभते सवालात ने सोने ने दिया

आपको भी प्यार है की नही है हमसे
इस तरह के जज्बात ने सोने न दिया

खाली पतीले मे चला रही थी चमचा
बेबस माँ को उस रात ने सोने न दिया

जगमगाते शहर की बस्ती मे अंधेरा है
खुशी के ऐसे सौगात ने सोने नेे दिया

हम तो ताउम्र उनकी बाट जोहते रहे
वो खयाले मुलाकात ने सोने न दिया

मुफलिस बस्तियों मे शीरी बांटते फिरे
ऐसे दिखावटी खैरात ने सोने न दिया

उम्मीद रजामंदी की उनसे रही हमको
उखड़े उखड़े जवाबात ने सोने न दिया

जब भी मिलता वो दिल्लगी करता है
उसके दिल फरेब बात ने सोने न दिया

मुल्क के हालात ने सोने न दिया

मुल्क के हालात ने सोने न दिया
भीगे से जज्बात ने सोने न दिया

फिजाओं मे जहर घोलते है लोग
फिजूल बयानात ने सोने न दिया

किसी को कोई पहचानता नही है
दुर के मुलाकात ने सोने न दिया

कही है जगमग कही अंधेरा क्यूं
चुभते सवालात ने सोने न दिया

मुल्क मे तो अब के सुखा पड़ा है
आंखो से बरसात ने सोने न दिया

रिश्तो ने कभी भी मुरव्वत न की
हमको लिहाजात ने सोने न दिया

हाथो की लकीरे सब उलझी सी है
नसीब के करामात ने सोने न दिया

अवाक है सभी बाजारो को देखके
मंहगाई के सौगात ने सोने न दिया

जितना करीब गया दूर हो जाती हैं
खुशी की औकात ने सोने न दिया

Tuesday, 3 November 2015

उलाहने ही कुछ सुनाने चले आते

उलाहने ही कुछ सुनाने चले आते
कभी तुम किसी बहाने चले आते

आंखे थक गई है टकटकी लगाए
ठहरे समंदर को बहाने चले आते

आ जाते है खयाल तेरे अल सुब्ह
शाम ए महफ़िल सजाने चले आते

तंज करता है जमाना तेरे नाम से
कुछ पल उन्हे दिखाने चले आते

सभी ने सताया है हमे बारी बारी
तुम भी जरा सा सताने चले आते

यूँ तो हमे रूठने की इजाजत नही
जो रूठे आज तो मनाने चले आते

मुहब्बत के दम कल भरते थे बहुत
जरा वो मुहब्बत दिखाने चले आते

जागते हुए गुजरी कितनी ही राते
सुकून भरी नींद सुलाने चले आते

उलाहने ही कुछ सुनाने चले आते
कभी तुम किसी बहाने चले आते

दिल फरेबी झुठे इश्तेहारो से डर लगता है

दिल फरेबी झुठे इश्तेहारो से डर लगता है
हमे तो आजकल बाजारो से डर लगता है

जरूरतो के तकाजे मे जज्बात बेच देते है
हमे इन बाजारू किरदारो से डर लगता है

मुफलिस बस्तियों मे पसरा रहता है अंधेरा
ये देख के जगमग त्योहारो से डर लगता है

अल सुबह ही खबरे लूट फसाद औ दंगो के
हमको रोज आते अखबारो से डर लगता है

फनकारीयां सियासत के हाथो नाचने लगी
अहले दानिश मंद फनकारो से डर लगता है

मौकापरस्ती खेल रही दैरो हरम का खेल
अवाम है दांव पे गुनहगारो से डर लगता है

भुखमरी बेबसी से आजीज आ चुके है वो
उन गरीब बस्ती के लाचारो से डर लगता है

वादे ही खिलाती है बस राहतो के नाम पर
मुझे मेरे मुल्क की सरकारो से डर लगता है