जीने का तरीका वो जानता है बहुत
मुश्किलो से तो गहरा रिश्ता है बहुत
उम्र पुरी गुजारी है इसी जद्दोजहद मे
अपनो की भीड़ मे भी तन्हा है बहुत
मुफलिस की बस्ती मे जलता है दिया
आज भी वहां किश्त पे जिंदा है बहुत
रईसो की कोठी मे रिश्ते बेलिबास है
गरीब घर मे बेटियों पर परदा है बहुत
सजदे मे वो दर दर ही झुकता रहता है
दैरो हरम की तासीर मानता है बहुत
ताउम्र की मिल्कियत अल्फाज दे रहा
बच्चो के सामने आज शर्मिंदा है बहुत
लडा जो जिंदगी से वो अब हार गया
बेटी को बिदा करते हुए रो रहा बहुत
कभी खुशी कभी गम मे ही गुजर गई
ये जिंदगी बस बेवफा है बेवफा बहुत