Saturday, 21 November 2015

बेचैन दिख रहा है मुझे गोदी मे सुलाने वाला

बेचैन दिख रहा है मुझे गोदी मे सुलाने वाला
खामोश होकर बैठा है वो लोरियां गाने वाला

जरूरते रोज बढती जाती है जेब छोटे हो रहे
कशमकश मे उलझा है घर को चलाने वाला

कैसी ख्वाहिशें दफ्न करे कौन सी शय टाले
उधेड़बुन मे फंस हुआ है बाजार जाने वाला

पुराने से घर के आंगन मे इक बुढा सा दरख्त
खडा पुरानी यादे ले खो गया उसे लाने वाला

बुढे दरख्त की शाखो पे बांधी थी यादे कभी
झुला यादो का बंधा है न मिला झुलाने वाला

कुछ अजीज अपने भी इसी शहर मे रहते है
रास्ते खड्डे बडे है उनके घर तक जाने वाला

रिश्तो की भीड़भाड रिश्ते यूँ ही बन जाते है
कहने को है नाते ये नही कोई निभाने वाला

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