उजाला भी देखो निकला है हिजाब मे
बादलो का साया है आज आफताब मे
जहर सी फैली हुई है फिजाओं मे सारी
नही मिलती अब कही खुशबू गुलाब मे
हकीकत मे जो हासिलात होते नही है
क्यूं चले आते है वो सताने यूँ ख्वाब मे
एक हम है उनके इश्क मे मरे जाते हैं
अहसास भी नही है इश्क का जनाब मे
आया गुरूर है उनके मिजाज मे शायद
पुरजे मिले अपने ही खत के जवाब मे
शरीफुन् नफ्स सभी बस्ती से चल दिए
बेईमान जो अब घुमने लगे है नकाब मे
आसमां को निहारते रातें बीत जाती हैं
भुखे को नजर आती रोटी माहताब मे
नेमतो के बाजार सज गये चौक चौराहे
मेहर मिलने लगी औकात के हिसाब मे
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