संजीदगी मे भी शरारत ढुंढ लेती है
दरिंदगी मे भी शराफ़त ढुंढ लेती है
मुल्क मे बडी काबिल दानिशमंदी है
आतंक पर भी सियासत ढुंढ लेती है
कारोबारी की नजर बडी पारखी है
दाने दाने मे जो तिजारत ढुंढ लेती है
चुल्हे ही ठंडे पड जाते है जब घरो मे
भुख पानी मे भी जरूरत ढुंढ लेती है
जमाने मे कुछ भी नाहक नही होता
काबिली जर्रे मे नसीहत ढुंढ लेती है
रिश्तो से चाहे मुलाकात न हो कभी
शौक अपने लिए फुर्सत ढुंढ लेती है
मुहब्बत की जुस्तजू बहुत मुश्किल है
निगाहे इक पल मे नफरत ढुंढ लेती है
नयी कलम को तवज्जो नही मिलती
पर भी कलम ये गफलत ढुंढ लेती है
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