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दिल फरेबी झुठे इश्तेहार से डर लगता है
आजकल हमको ये बाजार से डर लगता है
बेचते रोज जरूरत के लिए हसरत को
अपने दोहरे से ये किरदार से डर लगता है
झुग्गियों में है अंधेरा सा अभी तक कायम
जगमगाते हुए त्योहार से डर लगता है
फिर वही लूट फसादों की खबर अल सुब्ह
अब तो इस रोज के अखबार से डर लगता है
जैसे कठपुतली है हाथ सियासत के वो
मुब्तिला आज के फनकार से डर लगता है
मुल्क में दैर हरम मौका परस्ती बस है
पिस रहे लोग ये व्यापार से डर लगता है
मुफलिसी बेबसी से तंग है आवाम यहां
देख हालात ये लाचार से डर लगता है
रोज वादे ही खिलाती है वजीफा कह कर
अब तो इस मुल्क की सरकार से डर लगता है