Sunday, 21 August 2016

नजरे भीग जाती है अखबार देखकर

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नजरे भीग जाती है अखबार देखकर
खबरे आ रही है अब बाजार देख कर

घर के कोने मे पडी़ चाकी खामोश है
खाली कनस्तर रो रहे त्योहार देखकर

माटी के चुल्हे ने अवकाश ले लिया
बदले हुए समय की सरकार देख कर

हरा भरा आंगन वो बच्चो का शोर
सारा आलम खामोश है दीवार देख कर

मैंने रिश्ते संभाले मोतियों की तरह
उन्होंने प्यार निभाया इश्तेहार देख कर

सब बदल जाते हैं जमाने के साथ
दिल भर आता है माँ का दुलार देख कर

Tuesday, 16 August 2016

भुख

दोपहर के समय
चिलचिलाती धूप में

चिथडे पहने नंगे पाँव घुमती
नन्ही सी जान भुख से बिलखती

पेट की आग के लिए
कई दुख सहकर भी

कई कई दिन भुखी रहती है

इस उम्र में वो
जिंदगी से मिल चुकी है

भुख के साथ
पुरी तरह हिल चुकी है

विवश है अपना भविष्य
तिमिरमय बनाने को

वह आदी हो चुकी है
इस तरह जिंदगी बिताने को

उसे भी है हसरत
खेलने की पढने की

पर उसे दी गई है शिक्षा
जिंदगी से लड़ने की

वह लड रही है
और अविरल लडती रहेगी

न लड़ाई खत्म होगी
न भुख खत्म होगी

एक दिन वह स्वयं ही
खत्म हो जायेगी

लडते हुए जिंदगी से
चिरनिंद्रा में सो जायेगी

बेकस इंसान

एक बेकस इंसान

समाज का जो अंग है
समाज से विभंग है

समाज से वो दूर है
बेबसी से मजबूर है

चाहता है वो भी
सामाजिक बनना

पर बन नही पाता है

इस पूंजी वादी समाज में
खुद को विवश पाता है

उसने जब भी कोशिश की
खुद को बदलने की

अपनी पुरी काया के साथ
सामाजिक ढांचे में ढलने की

अपने घर का आयतन उसे
छोटा ही लगा

एक अनजाने भय से
वो डरा रहा

परिवार को भुख सहना होगा
बेघर हो कर
रहना होगा

तब वो
सामाजिक बन पायेगा

समाज के साथ
कदम मिलाकर
चल पायेगा

उसने महसूस किया है कि
समाज उसके लिए
नही है

समाज हमेशा
पूंजीपतियों का रहा है

गरीब सामाजिक बन कर
सैकड़ों दुख सहा है

उसने उसी समय
सामाजिक बनने का
विचार त्याग दिया

जब आने वाले
अनजाने भय को
उसने याद किया

Monday, 15 August 2016

आजादी

आजादी

चंद सिरफिरे ही थे
जो लेकर आये थे उसे

फिर उनसे हाथ छुड़ा
जाने कहां खिसक गई

अब सुनते हैं कि
ठहरी है
रसूखदारो के यहाँ

जो आ रही थी
मुल्क में
रास्ता भटक गई

बरसों पहले

बरसों पहले
बंटी थी मरकज से

गणतंत्र के नाम पर
कोई आजादी
जैसी चीज

चंद गिने-चुने
रसूखदारो के बीच

ये सिलसिला
फिर यूँ ही
साल दर साल
चलता रहा

झोपडी का वो
स्वराज
डरा सहमा सा
कोठियों में
पलता रहा

आज भी
यही हो रहा है

उस डरी सहमी सी
आजादी के लिए
मुल्क
रो रहा है

Saturday, 6 August 2016

कहीं गम कहीं पे सुकून है

4कहीं गम कहीं पे सुकून है
बारिश का अपना जुनून है

कहीं भिगते है झोपडे
कहीं मस्ती के मजमून है

कहीं दरिया बहती आंखों से
कहीं ख्वाबों में रंगून है

इस शहर में मुर्दे बसते है
मुआफी यहां हर खून है

अल्फाजो को जरा तरासिये
यूँ चुभते ज्यों नाखून है

अदालतों को बदल निजाम
अंधे बहरों का कानून है

कहीं फैशन में है चिथडे फटे
कहीं बेबस फटी पतलून है

कहीं नाली में फैके अनाज है
कहीं भुखे से मजलूम है

दौर ए तरक्की कहते इसे
हर शख्स अपने ही धुन है

Thursday, 4 August 2016

मंजर ही हादसों का अजीबोगरीब था

मन्जर  ही  हादसे  का  अजीबो गरीब  था
निकला उदू भी वो ही जो सबसे करीब था

सौदा  न हो सका  कभी हमसे ये इश्क का
मंहगी थी उल्फतें ये दिल अपना गरीब था

मजबूरियों  बेचैनियों   का   नाम   जिंदगी
खामोश सा निबाह भी  कितना अजीब था

जीस्त  सस्ती है  साहब  मंहगी है ख्वाहिशें
खाली  जेबें  अक्सर   ही   मेरा  नसीब था

ढुंढा  नही मिला कहीं  हमको  वो  आदमी
खोया  हुआ  है  जात  में  मेरा  हबीब  था

गुंगा  पुकारता   है  बहरों  को   यहां  देखो
दिखा  हमे  सभी  सर  लटका  सलीब  था

मिजाजे यार ने हैरत में डाल रखा है

मिजाजे   यार  ने  हैरत  में   डाल  रखा है
रकीबो  से   ये  जो  रिश्ता  कमाल रखा है

सुब्ह से शाम तलक ख्वाहिशों को पाला है
ए ज़िन्दगी   तुझे    ऐसे    संभाल  रखा  है

देखा है वक्त ने मुझको  यूं चलते चलते ही
उम्मीद  सा   न दिखा   तो  मलाल रखा है

खयाल  ख्वाब से  आ  या  दरीचे दरवाजे
तेरे   लिए   कई   रस्ता    निकाल  रखा है

जरुरतों   ने   किया  है   हमें   हैरां  इतना
तमाम  ख्वाहिशें  कल को ही टाल रखा है

मेयार  भी  न  गिरा  मुल्क  का   यूं चौराहे
यतीम  क्यूँ  है   रिआया    सवाल  रखा है

खुशी  इत्मिनान  नींदे   मुश्किल  है  सभी
नसीब  कैसे   हो  हैरत   में   डाल  रखा है