आयी है सुब्ह फिर नई खबर लेकर
फिरते हैं लोग हाथों में पत्थर लेकर
फिजाओं में अजब सी गंध फैली है
बैठे हैं कुछ लोग जुबां जहर लेकर
इक दीये ने अंधेरों से बगावत की है
देखें फैलेगी कहां तक असर लेकर
तमाशे रोज नये नये है शहर में मेरे
रोज आते हैं मदारी नये हुनर लेकर
हौसला ये की जमाने से लड़ जायेगें
जो मिले तो सहमा सा जिगर लेकर
साजिशों पर भारी पड़ रही है नेमते
सुब्ह निकलता हूँ संग मैं मेहर लेकर
नये दौर नये तौर नये चलन में अब
दोस्त भी मिले पहलू में खंजर लेकर
रह गये महज मकां ईंट और गारो के
गये अजीज अपना अपना घर लेकर
लम्हा लम्हा सलीके से सहेज रखा है
बैठे हैं उन्ही यादों का खंडहर लेकर