Tuesday, 22 November 2016

आयी है सुब्ह फिर नई खबर लेकर

आयी है सुब्ह फिर नई खबर लेकर
फिरते हैं लोग हाथों में पत्थर लेकर

फिजाओं में अजब सी गंध फैली है
बैठे हैं कुछ लोग  जुबां जहर लेकर

इक दीये ने अंधेरों से बगावत की है
देखें फैलेगी  कहां तक असर लेकर

तमाशे रोज नये नये है  शहर में मेरे
रोज आते हैं मदारी नये हुनर लेकर

हौसला ये की जमाने से लड़ जायेगें
जो मिले तो  सहमा सा जिगर लेकर

साजिशों पर भारी  पड़ रही है नेमते
सुब्ह निकलता हूँ संग मैं मेहर लेकर

नये दौर  नये तौर नये  चलन में अब
दोस्त भी मिले पहलू में खंजर लेकर

रह गये महज मकां ईंट और गारो के
गये अजीज अपना अपना घर लेकर

लम्हा लम्हा सलीके से सहेज रखा है
बैठे हैं उन्ही यादों का  खंडहर लेकर

Sunday, 20 November 2016

रंजो गम का बदस्तूर सिलसिला रख कर

रंजो गम का बदस्तूर सिलसिला रख कर
जिंदगी जब मिली  तय फासला रख कर

नही दिखी कहीं खुलूस ऐ वफा की सूरत
भुल  गया है  खुदा   जाने   कहां रखकर

सुना है मुल्क में हवाओं का रुख बदला है
चलिए देखते हैं मुंडेर पे इक दीया रखकर

तमाम  उम्र ही  उनकी  दहकते  गुजर गई
चला  करते थे  जो हाथों में  धुंआ रखकर

पलक झपकते सब मालोजर खाक हो गए
हासिल न हुआ कुछ भी "असासा" रखकर

परतें ही उधड़ती दिखी है महज रिश्तों की
क्या मिला है और  दीवारें दरमियां रखकर

"दोस्त" सारे   ही  मुंह  फेरने  लगे  अब तो
अपनो को दूर किया हकीकी जुबां रखकर

Wednesday, 9 November 2016

कब तक पेट की आग में पानी डाला जायेगा

कब तक पेट की आग में पानी डाला जायेगा
जाने  कब   भूखों  के  मुंह  निवाला  जायेगा

इमारतों के पीछे छिप  झाँकता रहता है सुरज
जाने कब मुफलिस बस्ती में  उजाला जायेगा

अभी है चंद लोग यहाँ  जो जिंदा है जमीर से
कब तक भला  ये भरम  यूँ ही  पाला जायेगा

नही पुछता भुखा  कभी भी  मजहब रोटी का
वो मस्जिद हो आयेगा  फिर शिवाला जायेगा

ठिठुरता रहा  इक बेचारा  झोपडी में रात भर
उसके पडोस से आज चढ़ावे दुशाला जायेगा

बिफरते हैं हर शाम बच्चे देख शहर में रोशनी
उलझे है कैसे दिन ढले  उन्हें संभाला जायेगा

शाम हुई घर को चले है जेब फिर से खाली है
उम्मीदों को फिर नये  झांसे में  डाला जाएगा

तसल्ली नही देते अब झुठी उम्मीदो के कतरे
जिंदा रहने अब नया तरीका निकाला जाएगाः

Sunday, 6 November 2016

कहकहों की राहों में सिसकियाँ दबी सी है

कहकहों की राहों में सिसकियाँ दबी सी है
रिश्तों के निबाहों में    तल्खियां दबी सी है

गुजरते हुए हयात के   तजुर्बे रोज नये नये
वक्त के चंद लम्हो में  नादानियां दबी सी है

दिलों के बाहर तो बहुत शोर सुनाई देता है
दिलों के  भीतर में  खामोशियां  दबी सी है

बदचलन आवारा नींदे भटकती है रात भर
दर पर खड़े ख्वाबों में बेचैनियां दबी सी है

तहज़ीब के लिबास ओढ़े फिरे हैं यहाँ वहाँ
आज भी किरदार में  नादानियां दबी सी है

दे दे कर जख्म  पुछते है कि  हाल कैसा है
उनके  हर सवाल पर  फब्तियां  दबी सी है

दिली गुबार झाड़के शिकवे भंगार में देने है
एक इतवार में कित्ती मजबूरियां दबी सी है

वक्त की पोटली में कुछ लम्हें छुपाये रखे हैं
हर लम्हों में  कितनी  दुश्वारियां  दबी सी है

Friday, 4 November 2016

दर बदल जाते हैं दीवार बदल जाते हैं

दर बदल जाते हैं  दीवार बदल जाते हैं 
देखते  ही देखते  बाजार  बदल जाते हैं

सारा ही शहर ये अजनबी सा दिखता है 
हल्के वजूद देख पैरोकार बदल जाते हैं

सच के तिजारत मे अब बरकत नही है 
घाटा होने देख  कारोबार  बदल जाते हैं

घर के आंगन बुढा सा पेड दोस्त है मेरा 
मिला सुकून उससे जो यार बदल जाते हैं

पिता से भी मिलती है तो पति से पुछकर 
बिदाई बाद बेटी के हकदार बदल जाते हैं

थाल सजाए बैठी ही रह जाती है बहना
बाट जोहते भाई के त्योहार बदल जाते हैं

तुम्हारे शहर मेरे भी कुछ रिश्ते बसते थे 
हालात के साथ ही किरदार बदल जाते हैं  

मौला दे माफी ये बच्चे जरा भुलक्कड़ है 
घर गृहस्थी मे इनके संस्कार बदल जाते हैं

Wednesday, 2 November 2016

ख्वाब देखूंगा तो अखबार मे आ जायेगा

ख्वाब देखूंगा तो अखबार मे आ जायेगा
कुछ हकीकत  सरेबाजार मे  आ जायेगा

मै सांसे भी लेता हूँ  तो जमाने से छिपके
वरना कल वो भी इश्तेहार में आ जायेगा

मै मुफलिस इक मुद्दा हूँ सियासत के लिए
मेरे ये  हालात भी  दरकार में  आ जायेगा

मेरे हर निवाले पर भी  नजर रखी जायेगी
मेरा  किरदार भी  सरोकार में  आ जायेगा

बेबसी की  तस्वीरें मेरी  बिकेगी बाजारों में
ये मेरा  जिस्म भी  कारोबार में आ जायेगा

मेरे कांधो पे  चढ़ करके  शहर का  "लुच्चा"
कल को देख लेना  सरकार में  आ जायेगा

मत कर  गुस्ताखी   ऐ सुखनवर  तू रहने दे
वरना तेरा नाम भी गुनहगार में आ जायेगा

अभी जो बाकी है वजूद जरा जुदा सा तेरा
तू भी इस शहर के रिश्तेदार में आ जायेगा