Tuesday, 18 June 2019

हाले-दिल सबको बताने की जरूरत क्या है


हाले-दिल  सबको  सुनाने की जरूरत क्या है
दर ब दर   रो के  दिखाने की  जरूरत क्या है

बस   हंसी   में   ही   उड़ाते   है   जमाने वाले
खुद को  अखबार  बनाने  की जरूरत क्या है

कोई   हमदर्द   कहीं  अब  तो  नही  मिलता है
दर्द   बाजार   में   लाने   की   जरूरत  क्या है

अब  अगर  भूल गए  वो  ही  सितम  करना तो
खुद से इस दिल को दुखाने की जरूरत क्या है

झेलने  पड़ते  हैं   खुद  को  ही  मसाइब अपने
दरमियाँ   रब्त  को   लाने  की  जरूरत क्या है

जल  रहा  आग  में  अपनी  ही  लगाई अब वो
अब हमें  उसको  जलाने  की  जरूरत  क्या है

एक    चेहरे  पे    कई    रंग    लगे  हैं   साहब
और  चेहरे  को   लगाने   की   जरूरत क्या है

वो  मेरे   नाम  पे  कीचड़   है   उछाला  करता
अब   उसे  सर पे  बिठाने  की  जरूरत क्या है

वो भी  शामिल था  तबाही पे  तमाशा बनकर
उसके दर  सर को  झुकाने की जरूरत क्या है

है   सरापा   ये  बदन   रूह   जहन   तेरा   ही
ऐ खुदा  तुझको  रिझाने  की  जरूरत  क्या है

सोग के  घर में  तमाशों  की  है कोशिश जारी
फिर  तसल्ली  ही  बंधाने  की जरूरत क्या है

जिस  बुलंदी  पे   मेरा  मुल्क   खड़ा है साहब
हादसों  पर  भी लजाने की   जरूरत   क्या है

Thursday, 13 June 2019

चिल्लर में ही खनकते से जज्बात को देखा

चिल्लर में ही  खनकते से  जज्बात को देखा
फिर  आज  वो  दबे  हुए   हालात को  देखा

इस जगमगाते शहर के  उजालों के दरमियां
इक नन्हे से  दिए की भी  औकात को  देखा

सारी चमक धमक वहीं पे फिकी सी पड़ गई
बिनते  हुए  कूड़े  में  जो  नवजात  को देखा

माथे पे  बल पड़े हैं  जिसे  देख सुनके आज
चुभते  हुए   कुछ ऐसे   सवालात   को देखा

जो  रखते  हैं   अदावतें   दुनिया  के  सामने
छिप छिप के उनमें होती मुलाकात को देखा

दहलीज़  लांघ  पाए  हया की न  जो  कभी
वो  दायरों  में  लफ्ज़ ए मोहताज  को देखा

हासिल  है  माहिरी  तो  बरसने  में  ही  इन्हें
बेमौसमों  में  आंख  के   बरसात  को  देखा

किश्तों  में  मर  रहें हैं फिर भी हौसले बुलंद
वो  जंगे  जिंदगी के  भी  लमहात को देखा