Thursday, 13 June 2019

चिल्लर में ही खनकते से जज्बात को देखा

चिल्लर में ही  खनकते से  जज्बात को देखा
फिर  आज  वो  दबे  हुए   हालात को  देखा

इस जगमगाते शहर के  उजालों के दरमियां
इक नन्हे से  दिए की भी  औकात को  देखा

सारी चमक धमक वहीं पे फिकी सी पड़ गई
बिनते  हुए  कूड़े  में  जो  नवजात  को देखा

माथे पे  बल पड़े हैं  जिसे  देख सुनके आज
चुभते  हुए   कुछ ऐसे   सवालात   को देखा

जो  रखते  हैं   अदावतें   दुनिया  के  सामने
छिप छिप के उनमें होती मुलाकात को देखा

दहलीज़  लांघ  पाए  हया की न  जो  कभी
वो  दायरों  में  लफ्ज़ ए मोहताज  को देखा

हासिल  है  माहिरी  तो  बरसने  में  ही  इन्हें
बेमौसमों  में  आंख  के   बरसात  को  देखा

किश्तों  में  मर  रहें हैं फिर भी हौसले बुलंद
वो  जंगे  जिंदगी के  भी  लमहात को देखा

No comments:

Post a Comment