Thursday, 31 December 2015

जाते जाते गया साल फिर रुलाते हुए गया

जाते जाते गया साल फिर रुलाते हुए गया
कितनो को गहरी नींद में   सुनाते हुए गया

अरमान कितने सीने में धरे के धरे  रह गए
वो सारी ही हसरतों को     भुलाते हुए गया

बूढा बदन ठिठुरता रहा सर्द रातो बेलिबास
आधी रात जाम पे जाम छलकाते हुए गया

ख्वाहिशों औ जरुरतों के कश्मकस के बीच
चंद लम्हो का हंसी जश्न वो मनाते हुए गया

उम्मीदें बहुत सी लगी है आगत के साल से
बीता बरस कुछ भरम भी  फैलाते हुए गया

अपनी तमाम मुश्किलों से हमको लपेट कर
उम्मीदों की इक किरण भी जगाते हुए गया

गुजरते हुए जिंदगी की इसी     धुप छांव से
हर दिन ही नया रास्ता एक दिखाते हुए गया

नया साल नया दिन नई सुब्ह नया उजियारा
बीता बरस कुछ नया भी तो  बनाते हुए गया

Monday, 28 December 2015

हमसे ही गुफ्तगू की उन्हें फुर्सत नहीं मिली

हमसे ही गुफ्तगू की उन्हें फुर्सत नहीं मिली
हर इक शय थी जद में ये दौलत नहीं मिली

हर दिल अजीजी का ही  गुमां उम्र भर रहा
उनकी नजर हमको वो  इज्जत नहीं मिली

मिलती रही तमाम उम्र ही   खैरात की तरह
हक में ही थी जो अपने वो नेमत नहीं मिली

अक्सर ही तलबगार रहे हम  इश्क के लिए
जिस्मो के इस बाजार में  चाहत नहीं मिली

कितने किये जतन कि अब तो चैन से जीये
पुरी जिंदगी यूं ही बीत गई इशरत नहीं मिली

अर्जी सुनी है उनकी जुबां मेरे नाम की

अर्जी सुनी है उनकी जुबां  मेरे नाम की
आने लगी है छन के दुआ  मेरे नाम की

शायद उन्हें भी इश्क का मुगालता हुआ
कदर उसे थी कल को कहां मेरे नाम की

अपनी भी हैसीयत मे इजाफा जरा हुआ
खुलने लगी चाहत की दुकां मेरे नाम की

तोहमत किसी पे यूं ही लगाना फिजूल है
आकर के कुछ खता तो बता मेरे नाम की

न हो यकीं जो मेरी   मुहब्बत तो देख ले
खुद मे भी कुछ निशानियां  मेरे नाम की

नफरत की बस्तियों से गुजरा हुआ हुँ मै
सदके में मालोजर भी लुटा मेरे नाम की

दिल का सुकून उनसे कुरबत की आस है
अब इत्ती तो इनायत हो खुदा मेरे नाम की

Saturday, 26 December 2015

मुगालता ये रहा हमको एहतराम के बाद

मुगालता ये रहा हमको  एहतराम के बाद
अब तो गुजरे हयात चैन से ईनाम के बाद

यूं तो हर लम्हा तेरी याद में बोझल गुज़रा
बेहिसाबी से तुझे ढुंढा किये शाम के बाद

हादसा कोई भी कर गुजरे जमाने में कहीं
जिक्र अपना वहां आया  इल्जाम के बाद

इससे बढ कर जफा की सुरत क्या होगी
खत के टुकड़े उनने भेजा पयाम के बाद

कौन से राब्ता के सर भला तोहमत कर दे
हर किसी ने हमे रुलाया है  काम के बाद

जीते जी हमको जमींदोज कर रहे हैं वही
वसीयत में जिन्हे हक है मेरे नाम के बाद

सफर में चलने की तैयारी  हो गई अपनी
पूछने आये अदायत सब इंतजाम के बाद

Friday, 25 December 2015

जमाने में जीने के अंदाज भी निराले है

जमाने में जीने के अंदाज भी निराले है
होंठो पर लतीफे है औ जुबां पे छाले है

धुप किस आंगन उतरी सुरज क्या जाने
कोठियों में झोपड़ी के हक के उजाले है

रोते बच्चे बहलाती मां पानी उबालकर
भुख नहीं जिनको उनके मुंह निवाले है

कलपना मजलूम का  सुनता नहीं कोई
दैरो हरम में फरियादी सारे पैसे वाले हैं

जुल्मतो की अर्जियां किसके दर पे करे
निजाम तो है सो रहा मुंशिफ घर ताले है

ख्वाहिशों औ जरुरतों मे जंग हो रही है
देखे इस लड़ाई में  कौन जीतने वाले हैं

फटी हुई बनियान में   उम्र गुजार देता है
हसरतें दफ्न कर वो सारा घर संभाले है

रिश्तों के बाजार में सारे ही रिश्ते झूठे हैं
मां बाप बेमतलब बाकि मतलब वाले हैं

जिसकी जो मर्जी है उत्सव मनाईये

जिसकी जो मर्जी है  उत्सव मनाईये
अर्ज किसी के मत दिल को दुखाईये

सैंवई हो गुजिये हो चाहे मीठे में केक
जुबां पे हर मज़हब के स्वाद सजाईये

मिलिये लोगों से महज जुबां तक नहीं
दिल से दिल मे  जाने की राह बनाईये

अपने परवर का सदा झंडा बुलंद रखे
अम्नो चैन के गीत  भी तो गुनगुनाईये

साजिशे बंद हो जहरीली फिजाओं की
खुशबुओं की भी मुल्क में हवा बहाईये

ईद में हो राम राम   दीवाली मे सलाम
आपस में इक दुजे के त्योहार मनाईये

नये साल मे सबको खुशियां हासिल हो
इक दुजे के लिए ऐसे अरमान सजाईये

इस शहर को जाने हुआ क्या है

इस शहर को जाने हुआ क्या है
आदमियत खो गई वजा क्या है

साजिशो का यूं दौर चल पड़ा है
भूल गए हैं सब कि दुआ क्या है

खोई हुई सी है जिंदगी इस कदर
नही मिलती   खबर कहा क्या है

घर घर देखी हमने अदावत ऐसी
ना मालूम लोगों में रिश्ता क्या है

आजिजे जुल्मियत सहमे  लोग
चौराहे पे मौत नहीं देखा क्या है

ठिठुरी काया को कंबल ओढा के
पूछना फकीर से फरिश्ता क्या है

अजमत बेच देते हैं दैरो हरम की
वो बंदे पुछते है कि धोखा क्या है

Wednesday, 23 December 2015

रफ्ता रफ्ता अब सारे किरदार बदल गए

रफ्ता रफ्ता  अब सारे किरदार बदल गए
नये दौर में सब अपने  त्यौहार बदल गए

ईद की सेवईयां गुम  दीवाली से सारे दीप
होली की रंगीनीयों के  इश्तेहार बदल गए

मिट्टी से मिट्टी का भी अब  रिश्ता टूट गया
सौंधी सौंधी खुशबुओं के बयार बदल गए

आस्ताने पर जो बंदे  कल सजदा करते थे
उनकी भी इबादत के अब दयार बदल गए

भरे पुरे घर में इक बड़ा सा आंगन होता था
दीवार खींच गई बीच तो परिवार बदल गए

नाजो में पली चिड़िया  घर भर की लाडली
ससुराल जो पहुंची बेटी तो संसार बदल गए

बाबुल से भी मिलती है  तो पति को पुंछ के
बिदा होते ही अब बेटी के हकदार बदल गए

बाबूजी के इशारे से सारा घर मौजूद होता था
वसीयत बनते अब सबके सरोकार बदल गए

लूट खसोट औ झुठ फरेब की ही है बस खबरे
खबरे वही सब बासी बस अखबार बदल गए

Tuesday, 22 December 2015

अपनी बेपरवाही से किस्मत की साजिश चल गई

अपनी बेपरवाही से किस्मत की साजिश चल गई
वक्त बदला जो जरा अपना तो दुनिया बदल गई

जमाने में ढुंढते रहे हम अपनी इक पहचान जुदा
खुद के भीतर जब झांका फिर नियत संभल गई

खर्च होते रहे घर बार मे हम बेहद नाप तौल कर
बाजार से जो गुजरे अचानक तबीयत मचल गई

उलझे रहे हम ताहयात खुशियों को घर लाने में
खबर न हुई उम्र कब  खिड़कियों से निकल गई

फिरते रहे हाथों में ले   रिश्तो की जमी बर्फ को
नफरते जमी की जमी रही बस बर्फ पिघल गई

जहन में खयालातो के  कुछ तेवर बागी हो गए
नसीब की धुप फिर से अच्छी ग़ज़ल निगल गई

Sunday, 20 December 2015

इस शहर की आदमियत खोने लगी है आजकल

इस शहर की आदमियत खोने लगी है आजकल
सरेराह ही नीलाम इज्जत होने लगी है आजकल

इंसाफ भी बिकने लगा अब कौड़ियों के दाम पर
बेटियां भी ये हालात देख रोने लगी है आजकल

ख्वाहिशे सारी दफ्न कर दी ताकि बच्चे खुशी रहे
उनकी दुश्वारियां आंखें भिगोने लगी है आजकल

कल जिन रिश्तो की दौलत लेकर हम इतराते थे
उनकी हर बोली नश्तर चुभोने लगी है आजकल

रोपा बीज हमने तो की मोहब्बत की फसल होगी
नई फसल वो ही नफरत बोने लगी है आजकल

जिन हाथों पर मुल्क की हिफाजत का जिम्मा है
वो भी अपनी रंगीनीयत ही धोने लगी है आजकल

जिधर नजर जाती है बस अफरातफरी मची हुई
हुकूमत बड़ी गहरी नींद सोने लगी है आजकल

Friday, 11 December 2015

रुकती नहीं किसी के वास्ते चलती रहती है

नही रूकती किसी की वास्ते चलती रहती है
जिंदगी बस रूह के लिबास बदलती रहती है

अजीब है ये दुनिया बहुत तवायफ़ों की तरह
अपने चाहने वाले अकस्मात बदलती रहती है

मतलब भर की ही होती है सारी रिश्तेदारियां
वक्त देख वो अपने मुलाकात बदलती रहती है

सियासत के खेल मे अहसासों की बिसात क्या
वो तो मेयार देख कर जज्बात बदलती रहती है

बदहवासी के हालात से शख्सियत न आंकिये
यहां सुबह औ शाम मे औक़ात बदलती रहती है

नियत बदलते लोगो की देर नही लगती है अब
मालोज़र देख के ये दिन रात बदलती रहती है

शहर मे जिस निजाम पे हिफाजत का जिम्मा है
महज खानापूर्ति मे तहकीकात बदलती रहती है

आफतो से आदमियत का राब्ता बहुत  पुराना है
सुरत वही होती है मुश्किलात बदलती रहती है

Thursday, 10 December 2015

किस मुंह से हालातों को दफा कह दूँ

किस मुंह से हालातो को दफा कह दूँ
खुद इजाद मुसीबत को सजा कह दूँ

उसने हर मर्तबा मुझे खबरदार किया
हिज्र ए इश्क मै अब कैसे जफा कह दूँ

गुफ्तगू जब कभी उनसे होती ही नही
कैसे है आज वो हमसे यूँ खफा कह दूँ

मुंतजिर हम ही रहे यूँ तो करार न था
जो न ख्वाब मे आये क्यूँ धोखा कह दूँ

उनसे पहचान की सुरत नजर तक थी
इस मुलाकात को मै कैसे रिश्ता कह दूँ

जो कभी उनसे इजहारे मुहब्बत न हुई
आज मै उनको किस तरह बेवफा कह दूँ

Monday, 7 December 2015

मंदिर मे भगवान कैद है मुरत में इमान कैद है

मंदिर मे भगवान कैद है मुरत मे ईमान कैद है
अपनी बंधी सोच से शहर मे हर इंसान कैद है

जुदा जुदा सुरत मे है वो कितने ही किरदार मे
बरसो से अबला है नारी मर्दो मे हैवान कैद है

खनकते सिक्को की शोर मे खो गई बेचारगी
सत्ता के गलियारो मे भी अब बेईमान कैद है

बेहद खुश है आज वो दाने दाने का मोहताज
उसके हर निवाले मे भी इक मेहरबान कैद है

नजर आने लगी है बाप के चेहरे पे भी झुर्रीयां
उन पेशानी की लकीरो मे इक परेशान कैद है

तंगहाली के दौर मे भी निगाहे रखता चांद पर
मुफलिस के ख्वाब मे महल आलिशान कैद है

वो महज झंडा नही है तिरंगे की सुरत है जो
लहराते तीन रंगो मे वतन की पहचान कैद है

सुरत देख होने लगी है नज्मो की इस्लाहियत
कुछ बेहद खास ही तासीर मे कद्रदान कैद है

हरेक सफा सजाया है बेहद ही सलाहियत से
जेहन के सफीने मे बिसरी सी दास्तान कैद है

Sunday, 6 December 2015

मैं ढुंढने को जमाने मे जब खुदा निकला

मै ढुंढने को जमाने मे जब खुदा निकला
पता चला न कही वो तो लापता निकला

जो शिकायत भी करे तो किस दर पे करे
हर इक पीर पैगंबर भी तो उसका निकला

ये जमाना लगे उससे खफा खफा फिर भी
जर्रे जर्रे का यहां उससे ही रिश्ता निकला

उसको खेतो खलिहानो मे खदानो मे देखा
वहां पे खेतीहर मजदूर का हौसला निकला

उसको फुलो मे कलियों मे फिजाओं मे ढुंढा
वो हरेक खुशबू मे हवा मे भी घुला निकला

हमने ढुंढा किया उसको फकीर के कासो मे
मगर वहा भी वो फकीर का मेहरबां निकला

रोते बच्चे को जो गोद मे उठाया बाजार मे
देखा तो हंसता हुआ एक फरिश्ता निकला

उसकी जुस्तजू मे हम जमीदोज भी हो गये
वो भी तो उसी के घर का ही रास्ता निकला

Friday, 4 December 2015

वो बाप किस तकलीफ से हमे पालता रहा

वो बाप किस तकलीफ से हमे पालता रहा
रह रहकर उम्र भर मुझे ये दर्द सालता रहा

बच्चो के पेट भर जाए इस जद्दोजहद मे ही
ता जिंदगी वो अपनी खुशी को टालता रहा

किरदार कोई घर मे बेलिबास न रहने पाए
ये सोच फटी बनियान मे दिन निकालता रहा

हर इक की जरूरतो का हरदम खयाल रखा
बखुब सलीके से वो हर रिश्ते संभालता रहा

बेअदबी औ दिलफरेबी दुनिया से छिपा कर
बाअदबी जहनीयत के सांचे मे ढालता रहा

बडे होने पर जरूर वो करेंगे मेरी तिमारदारी
उस बेचारे को उम्र भर ऐसा ही मुगालता रहा

मुफलिसी का कभी हमे अहसास न होने दिया
हंस हंस के सारी मुश्किले खुद ही झेलता रहा

धूप मे भी वो दौडा कभी छांव देख नही ठहरा
उबड खाबड रास्तो मे ता हयात डोलता रहा

यूँ ही खुशी औ गम गुजार दी उसने ये जिंदगी
उम्र के पडाव मे कभी जीतता कभी हारता रहा

जिनकी खातिर हर लम्हा घुट घुट करके गुजरा
आज उन रिश्तो की खुद से बेरुखी देखता रहा

अच्छी लगी

खेलते बच्चो के हाथो  मे गोंटी अच्छी लगी
तरक्की के इस दौर में भी धोती अच्छी लगी

भीड भरे शहर की मसरूफियत के बनिस्बत
सीधे सादे गांव की  हमे सादगी अच्छी लगी

दुसरो से छिनकर खुशियाँ हमे न देना मौला
अपने हक से जो मिले वो खुशी अच्छी लगी

बेफिजूल है क्या मजा है झुठ और फरेब मे
अम्न चैन से जो गुजरे वो जिंदगी अच्छी लगी

आंखे चुंधियाती शहरो की रोशनी के दरमियाँ
मुझको मिट्टी के दिये की रोशनी अच्छी लगी

बासी रोटी सेंक कर जो नास्ते मे मुझे मां ने दी
हर अमीरी से मुझे वो मुफलिसी अच्छी लगी

दिन चढे तक बिस्तरो से चिपकी  शहरीयत से
सुबह मे खिलते फुलो की ताजगी अच्छी लगी

सजी देखी इक दुकान मे दोनो पाक ए किताब
हमे गीता औ कुरान की ये दोस्ती अच्छी नही

बेचैन सा रहता है इन दिनो वो हमसे बेखबर
दुआ करे सलामत की ये बेरूखी अच्छी लगी

Thursday, 3 December 2015

ऐ मुकद्दर मेरे मै ही तेरा कुसूर वार हूँ

ऐ मुकद्दर मेरे मै ही तेरा कुसूर वार हूँ
जो दिया उससे जियादा तलबगार हूँ

औकात से बढ़कर  ख्वाहिशें है मेरी
कुछ बेलगाम जरूरतो से शर्मशार हूँ

चालाकियों से उम्र भर नावाकिफ रहा
खुद पर है ये गुमान के मै होशियार हूँ

कुछ उम्मीदें रास्ता ही ताकती रहती है
उन बेबस मुंतजिरो   का मै गुनहगार हूँ

आवारा हूँ नाकारा हूँ चाहे बददिमाग हूँ
अम्मा को मै हरेक सुरत ही इख्तियार हूँ

मुरकर्रर है मेरे वास्ते भी दो गज जमीं
अपनी मिल्कियत का मै भी जमीदार हूँ

जिंदगी से कोई भी शिकवा नही बाकि
बस अपनी ही  हरकतो से ही बेजार हूँ

जिंदगी से ताउम्र  जद्दोजहद जारी रही
अब रहबर की रहनुमाई चलने तैयार हूँ

Wednesday, 2 December 2015

अपनी साख से बिछडा हुआ पत्ता हूँ मै

अपनी साख से बिछडा हुआ  पत्ता हूँ मै
ऐ दिल जरा पास तो आ बहुत तन्हा हूँ मै

जरूरतो के दाम रोज ख्वाब बेच रहा हूँ
वक्त से लडता हुआ बेबस सा लम्हा हूँ मै

अपने अपने मतलब की सब बांट लेते है
घर पर रोज आता अखबार का पन्ना हूँ मै

कल तक बुनियाद था आज याद मे नही
कुछ काम जो न आ सके वो रिश्ता हूँ मै

नजरअंदाज रहता हूँ क्यूँकि खास नही हूँ
सियासत पटल से भटका हुआ मुद्दा हूँ मै

बडे ही मंहगे से लिबास मे पैबंद जूं लगा
गुमां होता है बरगद का मगर धोखा हूँ मै

तपी हुई है जिंदगी बखुब ही धूप छांव मे
तिस पे भी कशमकश मे उलझा रहा हूँ मै

जेहन मे चुभती है कहकहो की आवाजे
बंधी सोच मे कितना उदास फिरता हूँ मै

Monday, 30 November 2015

जीने का तरीका वो जानता है बहुत

जीने का तरीका वो जानता है बहुत
मुश्किलो से तो गहरा रिश्ता है बहुत

उम्र पुरी गुजारी है इसी जद्दोजहद मे
अपनो की भीड़ मे भी तन्हा है बहुत

मुफलिस की बस्ती मे जलता है दिया
आज भी वहां किश्त पे जिंदा है बहुत

रईसो की कोठी मे रिश्ते बेलिबास है
गरीब घर मे बेटियों पर परदा है बहुत

सजदे मे वो दर दर ही झुकता रहता है
दैरो हरम की तासीर मानता है बहुत

ताउम्र की मिल्कियत अल्फाज दे रहा
बच्चो के सामने आज शर्मिंदा है बहुत

लडा जो जिंदगी से वो अब हार गया
बेटी को बिदा करते हुए रो रहा बहुत

कभी खुशी कभी गम मे ही गुजर गई
ये जिंदगी बस बेवफा है बेवफा बहुत

उजाला भी देखो निकला है हिजाब मे

उजाला भी देखो निकला है हिजाब मे
बादलो का साया है आज आफताब मे

जहर सी फैली हुई है फिजाओं मे सारी
नही मिलती अब कही खुशबू गुलाब मे

हकीकत मे जो हासिलात होते नही है
क्यूं चले आते है वो सताने यूँ ख्वाब मे

एक हम है  उनके इश्क मे मरे जाते हैं
अहसास भी नही है इश्क का जनाब मे

आया गुरूर है उनके मिजाज मे शायद
पुरजे मिले  अपने ही खत के जवाब मे

शरीफुन् नफ्स सभी बस्ती से चल दिए
बेईमान जो अब घुमने लगे है नकाब मे

आसमां को निहारते रातें बीत जाती हैं
भुखे को नजर आती रोटी माहताब मे

नेमतो के बाजार सज गये चौक चौराहे
मेहर मिलने लगी औकात के हिसाब मे

Sunday, 29 November 2015

होठों पे मुस्कान दिलो मे खाई है

होंटो पे मुस्कान दिलो मे खाई है
अपनो ने भी खुब रस्म निभाई है

कोने मे पडी रो रही है बुढी आंखे
आज भी न आयी मां की दवाई है

आज वसीयत बनवायेंगे बाबूजी
इसी खातिर ही इकट्ठे सारे भाई है

छोड के सारे नाते बेटी चल देती है
जमाने की इन रवायतो की दुहाई है

हिस्सा मां का वो बाबूल की लाडली
अनजाने संग करनी उसकी विदाई है

पीहर औ ससुराल मे बेटी बंट जाती
कतरा कतरा सबके हिस्से मे आयी है

आज यकीनन ये तकिये गीले हो जाये
आंखो से जब्त कैदी को दे दी रिहाई है

Saturday, 28 November 2015

ये अदद एक देश ही नही है

ये अदद एक देश ही नही है ये माता हमारी है
असहिष्णुता नाराजगी क्या माता से तुम्हारी है

मां के चार बेटे है तो आपस मे तकरार होती है
कभी रूठ जाने पर क्या ममता पर वार होती है

देश ने तुम्हे इज्ज़त दौलत औ शोहरत अता किया
जरा खरोंच से तुमने अपना सारा हाल बता दिया

भारत माता के बहते आंसू तुमने बोलो कब पोंछे
अपनी हैसियत से किसी लाचारो की कब सोचे

दानिशमंद कलमनवीस फनकार और जाने कई
दुकानदारी जब चलती रही जुबाने खामोश रही

आपके कलम से फन से कौन सी क्रांति आ गई
कहां अब माहौल बिगड़ा कहां अशांति आ गई

देश मे अब भी भुखे है अब भी लाचार बसते है
दो तल्ले रहने वाले आज चार तल्लो पर बसते है

कभी लाचारी भ्रष्ट व्यवस्था अपनी दो बाते बोलो
असमानता अशिक्षा आतंकवाद पर मुह खोलो

असहिष्णुता का नारा ही ये राजनीति से प्रेरित है
देश हित की बात करो रिआया त्रस्त है उद्वेलित है

अलग मुकाम हासिल है तो दानिशमंदी परिचय दो
पक्षपात से दूर रहकर तुम निष्पक्ष भरा निर्णय दो

देश ने तुम्हे चाहा है अपने सर आंखो पर बिठाया
अपनी ओछी हरकत से तुमने सबका दिल दुखाया

इज्ज़त के बदले ही अक्सर इज्ज़त है मिला करती
प्यार मोहब्बत के आगे सारी ही बुराई डरा करती

Wednesday, 25 November 2015

सीधा सादा सा बंदा भी अब खबर मे रहता है

सीधा सादा सा बंदा भी अब खबर मे रहता है
मुद्दआ जबसे बना है निवाला नजर मे रहता है

थोडी खुशियाँ हासिल करने किश्तों पे जीता है
कतरो मे है बंटा हुआ हर पल कबर मे रहता है

आज उसकी बस्ती मे खुब भीड़ भरी रहती है
कोई न जाता था कलतक वो जिधर मे रहता है

कल जो बेचारा आम था खास बन बैठा है वो
चुनावी दौर मे वो सियासत के असर मे रहता है

सीधा सादा सा बंदा भी अब खबर मे रहता है

सीधा सादा सा बंदा भी अब खबर मे रहता है
मुद्दआ जबसे बना है निवाला नजर मे रहता है

थोडी खुशियाँ हासिल करने किश्तों पे जीता है
कतरो मे है बंटा हुआ हर पल कबर मे रहता है

आज उसकी बस्ती मे खुब भीड़ भरी रहती है
कोई न जाता था कलतक वो जिधर मे रहता है

कल जो बेचारा आम था खास बन बैठा है वो
चुनावी दौर मे वो सियासत के असर मे रहता है

Tuesday, 24 November 2015

नजर मिलते ही दिल मे उतर जाते हैं

नजर मिलते ही दिल मे उतर जाते हैं
कमाल खुब इक लम्हे मे कर जाते है

संजो के रखे थे अरमान हमने सीने मे
बेखयाली मे चिंदी चिंदी कतर जाते है

गजब है अव्वल वो कभी मिलते नही
जो मिलते है तो कतराते गुजर जाते हैं

सुर्ख फुलो सी महक उठती है सब राहे
नर्म पैरो चहलकदमी मे जिधर जाते हैं

बेहद शातिरी से वो हर कतल करते है
मुस्कुरा के वो सादगी से मुकर जाते हैं

जिन्होंने देहरी भी न लांघी थी घर की
तन्हाई के संग उल्फत ए सफर जाते हैं

इश्क की गलियों का पता जानते नही
बदहवासी मे वो अंजाने शहर जाते हैं

इश्क की शान मे गुस्ताखी न हो जाए
बेहद सलीके से हम उनके घर जाते हैं

अंधेरों की हस्ती को मिटाने एक टुकड़ा धुप

अंधेरो की हस्ती को मिटाने के वास्ते
एक टुकड़ा धुप मेरे घर भी चाहता हूँ

मेरे बच्चे भी कभी आसमान देख ले
थोडे से उजाले मै इधर भी चाहता हूँ

वाकिफ हूँ बखुब ऐ खुशी तेरे कद से
करना तुझे हासिल पर भी चाहता हूँ

सजदे मे परवर हम जो रहते है हरसूं
इबादत का अपने असर भी चाहता हूँ

उम्र यूँ ही उलझने सुलझाने मे गुजरी
सुखन ख्यालो के सफर भी चाहता हूँ

हकीकत में ईमानदारी अब दोगलो मे दिखता है

हकीकत मे ईमानदारी अब दोगलो मे दिखता है
रवायतो का वो चलन अब चोचलो मे दिखता है

जाओ परिंदो अब अपना बसेरा कही और करो
मेरे शहर मे पानी तक अब बोतलो मे बिकता है

फैले हाथो पर चवन्नी देने तक औक़ात नही है
भूख खडा चौराहे पर शौक होटलो मे बिकता है

बाजारो मे आंसूओ के खरीदार कहां मिलते है
जज्बात भी तो मुशायरो महफिलो मे दिखता है

अभागी सी इक झोपडी बेचारी अंधेरे मे रहती
जगमगाता सारा मंजर बस बंगलो मे दिखता है

मेलजोल की वो बाते तो भूली बिसरी हो गई
सारा भाईचारा तो बस अब जंगलो मे दिखता है

कोठीयो मे हरदम ही पकवान छनाते रहते है
जाने कब से पसरा मातम चुल्हो मे दिखता है

रिश्ते नाते अपने घर पर भी आते जाते रहते है
बदले हुए लहजे अब उनके बोलो मे दिखता है

Saturday, 21 November 2015

बेचैन दिख रहा है मुझे गोदी मे सुलाने वाला

बेचैन दिख रहा है मुझे गोदी मे सुलाने वाला
खामोश होकर बैठा है वो लोरियां गाने वाला

जरूरते रोज बढती जाती है जेब छोटे हो रहे
कशमकश मे उलझा है घर को चलाने वाला

कैसी ख्वाहिशें दफ्न करे कौन सी शय टाले
उधेड़बुन मे फंस हुआ है बाजार जाने वाला

पुराने से घर के आंगन मे इक बुढा सा दरख्त
खडा पुरानी यादे ले खो गया उसे लाने वाला

बुढे दरख्त की शाखो पे बांधी थी यादे कभी
झुला यादो का बंधा है न मिला झुलाने वाला

कुछ अजीज अपने भी इसी शहर मे रहते है
रास्ते खड्डे बडे है उनके घर तक जाने वाला

रिश्तो की भीड़भाड रिश्ते यूँ ही बन जाते है
कहने को है नाते ये नही कोई निभाने वाला

Friday, 20 November 2015

रुह से चल जिस्म तक हो रही बगावत देखिये

रूह से चल जिस्म तक हो रही बगावत देखिये
दिल से दिल के दरमियाँ कैसी अदावत देखिये

किस कदर मायूस हो हम उस शहर से लौटे है
तेरे दर पे तुझसे न मिलने की मलालत देखिये

अहसास तेरी रूसवाई का अश्को को भी रहा
सुख गई आंखे ही रिश्तों की नजाकत देखिये

आशनाई मे तेरी हम तुझसे ही मशहूर हुए है
तुमको ये भी खबर नही हद जलालत देखिये

रूबरू जब हो कभी वो तब न सुनाये दास्तां
रकीबो से खबर लेने की खुब अदायत देखिये

दैरो हरम क्या मालूम उसको ही जाना खुदा
आस्ताने सब भूल गये ऐसी अकीदत देखिये

मसफिल सजी है वहां घर मेरे घर मे खामोशी
न्यौता शरीकी भेज रहे उनकी शराफ़त देखिये

गुजर कर देखिये

कभी उनकी गलियों से भी गुजर कर देखिये
मुफलिसो की बस्तियों मे भी उतर कर देखिये

मजबूरी मे जिंदगी से किस कदर वो लड रहे
साथ उनके एक दिन आप बसर कर देखिये

भुखे बच्चे रोते देख कलेजा मुंह को आता है
कोई लम्हा ऐसे अहसास से गुजर कर देखिये

बडे बडे त्योहार यूँ ही फाको मे बित जाते हैं
नये जानकर रफूगर लिबास पैहर कर देखिये

रात रात भर आंसूओ को उबालती रहती है
माँ कभी सोती नही है आप जागकर देखिये

ख्वाहिशें दम तोडती रहती है अक्सर हर वक्त
कभी फुर्सत लम्हो मे निगाहे उधर कर देखिये

उम्मीद भरी निगाहे ताकती रहती है चहुंओर
उनकी झोली मे कुछ नजारे नजर कर देखिये

मेरे मालिक ने गरचे काबिलियत अता की है
जरूरतमंदी मे तुम भी कभी मेहर कर देखिये

Tuesday, 17 November 2015

कोई मजहब तो कोई जात देखता रह गया

कोई मजहब तो कोई जात देखता रह गया
इक परिंदा हैरां सा हालात देखता रह गया

कुछ उल्टे सीधे से सवालात देखता रह गया
बदले हुए लोगो के जज्बात देखता रह गया

चल रही है मुल्क मे बयार ही कुछ इस तरह
सीधा सा बंदा बस करामात देखता रह गया

सलामत पांव फिर भी अपाहिज है जेहन से
बस वो रहनुमा के निशानात देखता रह गया

खरीदने निकला था थोड़ी खुशियां बाजार मे
बहुत दूर था चांद मै औकात देखता रह गया

अंधेरो के घने बादल छटेगें जाने कब तलक
उजालो का मुंतजिर लमहात देखता रह गया

कहते रहे जो तुमसे अब मिलेंगे न हम कभी
मुद्दतो मे जो मिले मुलाकात देखता रह गया