Sunday, 20 December 2015

इस शहर की आदमियत खोने लगी है आजकल

इस शहर की आदमियत खोने लगी है आजकल
सरेराह ही नीलाम इज्जत होने लगी है आजकल

इंसाफ भी बिकने लगा अब कौड़ियों के दाम पर
बेटियां भी ये हालात देख रोने लगी है आजकल

ख्वाहिशे सारी दफ्न कर दी ताकि बच्चे खुशी रहे
उनकी दुश्वारियां आंखें भिगोने लगी है आजकल

कल जिन रिश्तो की दौलत लेकर हम इतराते थे
उनकी हर बोली नश्तर चुभोने लगी है आजकल

रोपा बीज हमने तो की मोहब्बत की फसल होगी
नई फसल वो ही नफरत बोने लगी है आजकल

जिन हाथों पर मुल्क की हिफाजत का जिम्मा है
वो भी अपनी रंगीनीयत ही धोने लगी है आजकल

जिधर नजर जाती है बस अफरातफरी मची हुई
हुकूमत बड़ी गहरी नींद सोने लगी है आजकल

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