Sunday, 6 December 2015

मैं ढुंढने को जमाने मे जब खुदा निकला

मै ढुंढने को जमाने मे जब खुदा निकला
पता चला न कही वो तो लापता निकला

जो शिकायत भी करे तो किस दर पे करे
हर इक पीर पैगंबर भी तो उसका निकला

ये जमाना लगे उससे खफा खफा फिर भी
जर्रे जर्रे का यहां उससे ही रिश्ता निकला

उसको खेतो खलिहानो मे खदानो मे देखा
वहां पे खेतीहर मजदूर का हौसला निकला

उसको फुलो मे कलियों मे फिजाओं मे ढुंढा
वो हरेक खुशबू मे हवा मे भी घुला निकला

हमने ढुंढा किया उसको फकीर के कासो मे
मगर वहा भी वो फकीर का मेहरबां निकला

रोते बच्चे को जो गोद मे उठाया बाजार मे
देखा तो हंसता हुआ एक फरिश्ता निकला

उसकी जुस्तजू मे हम जमीदोज भी हो गये
वो भी तो उसी के घर का ही रास्ता निकला

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