जाते जाते गया साल फिर रुलाते हुए गया
कितनो को गहरी नींद में सुनाते हुए गया
अरमान कितने सीने में धरे के धरे रह गए
वो सारी ही हसरतों को भुलाते हुए गया
बूढा बदन ठिठुरता रहा सर्द रातो बेलिबास
आधी रात जाम पे जाम छलकाते हुए गया
ख्वाहिशों औ जरुरतों के कश्मकस के बीच
चंद लम्हो का हंसी जश्न वो मनाते हुए गया
उम्मीदें बहुत सी लगी है आगत के साल से
बीता बरस कुछ भरम भी फैलाते हुए गया
अपनी तमाम मुश्किलों से हमको लपेट कर
उम्मीदों की इक किरण भी जगाते हुए गया
गुजरते हुए जिंदगी की इसी धुप छांव से
हर दिन ही नया रास्ता एक दिखाते हुए गया
नया साल नया दिन नई सुब्ह नया उजियारा
बीता बरस कुछ नया भी तो बनाते हुए गया
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