Friday, 25 December 2015

जमाने में जीने के अंदाज भी निराले है

जमाने में जीने के अंदाज भी निराले है
होंठो पर लतीफे है औ जुबां पे छाले है

धुप किस आंगन उतरी सुरज क्या जाने
कोठियों में झोपड़ी के हक के उजाले है

रोते बच्चे बहलाती मां पानी उबालकर
भुख नहीं जिनको उनके मुंह निवाले है

कलपना मजलूम का  सुनता नहीं कोई
दैरो हरम में फरियादी सारे पैसे वाले हैं

जुल्मतो की अर्जियां किसके दर पे करे
निजाम तो है सो रहा मुंशिफ घर ताले है

ख्वाहिशों औ जरुरतों मे जंग हो रही है
देखे इस लड़ाई में  कौन जीतने वाले हैं

फटी हुई बनियान में   उम्र गुजार देता है
हसरतें दफ्न कर वो सारा घर संभाले है

रिश्तों के बाजार में सारे ही रिश्ते झूठे हैं
मां बाप बेमतलब बाकि मतलब वाले हैं

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