Thursday, 10 December 2015

किस मुंह से हालातों को दफा कह दूँ

किस मुंह से हालातो को दफा कह दूँ
खुद इजाद मुसीबत को सजा कह दूँ

उसने हर मर्तबा मुझे खबरदार किया
हिज्र ए इश्क मै अब कैसे जफा कह दूँ

गुफ्तगू जब कभी उनसे होती ही नही
कैसे है आज वो हमसे यूँ खफा कह दूँ

मुंतजिर हम ही रहे यूँ तो करार न था
जो न ख्वाब मे आये क्यूँ धोखा कह दूँ

उनसे पहचान की सुरत नजर तक थी
इस मुलाकात को मै कैसे रिश्ता कह दूँ

जो कभी उनसे इजहारे मुहब्बत न हुई
आज मै उनको किस तरह बेवफा कह दूँ

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