किस मुंह से हालातो को दफा कह दूँ
खुद इजाद मुसीबत को सजा कह दूँ
उसने हर मर्तबा मुझे खबरदार किया
हिज्र ए इश्क मै अब कैसे जफा कह दूँ
गुफ्तगू जब कभी उनसे होती ही नही
कैसे है आज वो हमसे यूँ खफा कह दूँ
मुंतजिर हम ही रहे यूँ तो करार न था
जो न ख्वाब मे आये क्यूँ धोखा कह दूँ
उनसे पहचान की सुरत नजर तक थी
इस मुलाकात को मै कैसे रिश्ता कह दूँ
जो कभी उनसे इजहारे मुहब्बत न हुई
आज मै उनको किस तरह बेवफा कह दूँ
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