Friday, 2 April 2021

सुखनवरो के दिलों को खंगाला जब हमने

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सुखनवरो के  दिलों को  खंगाला जब हमने
कुछ अधजले मिले अशआर देखने के लिए/1/

बला   का   दर्द    उढ़ेला  है    गज्ल गोई में
कि कौन कितना है गमख्वार देखने के लिए/2/

कभी  जो  जिंदगी  की  धूप ने  सताया मुझे
निकल  पड़ा  मैं  भी  खुद्दार देखने  के लिए/3/

जमात   जात  है   पर   आदमी    नदारद है
कहाँ  को  जाए  भला  प्यार  देखने के लिए/4/

नजर मिजाज नजरिया बदलते देखा है

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नजर   मिजाज   नजरिया   बदलते   देखा है
बदलते   दौर  में    रिश्ता    बदलते    देखा है/1/

जरा सी  उम्र में  हम  क्या  बताएँ   ऐ  साहब
गुजरते  वक़्त  में  क्या क्या  बदलते  देखा है/2/

जो  कि  अजीज  था  हमराह  था  उसे हमने 
जरा  सी   बात  पे   रस्ता   बदलते    देखा है/3/

अजीमो  शाने  वतन  पुरखो  की  विरासत है
सियासी  फेर  में    नक्शा   बदलते   देखा है/4/

बहुत  करीब था  दिल के जो जानता था मुझे
उसे  भी   आज  तो  चेहरा   बदलते  देखा है/5/

बदलते देखे हैं मंजिल भी राहगुज़र भी बहुत 
इरादे   शौक  का   दरिया   बदलते   देखा है/6/

कुबूल  होने  न  होने  की  कशमकश  में  ही
दुआ  उम्मीद  का   जरिया  बदलते  देखा है/7/

तू बता ऐ वक़्त तुझको क्या हुआ

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तू  बता  ऐ वक़्त तुझको  क्या हुआ
क्यूँ  तेरा  चेहरा   लगे    उतरा हुआ/1/

हम तेरी खातिर ही  भटके दर ब दर
तू  नही  लेकिन  कभी  अपना हुआ/2/

महफिलें सजती थी कल  चौपाल में
दौर  अब वो  खत्म सब सपना हुआ/3/

हो गये  अब  गैर  जो  अपने थे कल
क्या बताएं अब भला क्यूँ क्या हुआ/4/

बस्तियों  के  बीच  छत  बस एक थी
अब तो इक घर का कई हिस्सा हुआ/5/

नाप   आते   थे     दुपहरी    धूप  में
जैसे  सूरज  हमसे  था  सहमा  हुआ/6/

क्या मिला बोया जो नफरत मुल्क में
आपसी   रिश्तों  का  ही  हर्जा  हुआ/7/

वक़्त  की  तस्वीर  जब  खोली  गई
कांच  फिर  चुभने  लगा  टूटा  हुआ/8/

अब  न  रोटी  की  यहाँ  तू बात कर
अब  अकीदा  ही   यहाँ   मुद्दा हुआ/9/

राब्ता   उनसे   हमारा   अब   भी है
दूर  रह कर   और  भी  गहरा  हुआ/10/

कमसिनी  में   खेलते  थे   साथ  ही
वक़्त अब बदला तो सब पहरा हुआ/11/

मुब्तिला  है  वो  तरक्की  पर  बहुत
मुल्क फिर लगता है क्यूँ ठहरा हुआ/12/

कागजों  पर  घर  बने  लाखों  मगर
राह  में   क्यूँ  है  बशर  सोया  हुआ/13/

सारे आलम में है दहशत अजाब जैसा है

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सारे  आलम  में  है  दहशत  अजाब जैसा है
बात  भी   अच्छे  दिनों  की   सराब  जैसा है/1/

खार  ही  खार  मिले  हैं   नसीब  से   हमको
कैसे   हम   कह दे  भला  ये  गुलाब जैसा है/2/

पाक दामन कही मिलना भी ख्वाब ही तो है
आजकल  चेहरे  पे  चेहरा   नकाब  जैसा है/3/

मसअला खूब है फिर भी  नही कोई मसला
मसनदे  साहिबो   खातिर  खिताब  जैसा है/4/

जी करे पढ़ लो जहाँ से पलट के सफ्ह कोई
जिंदगी   मेरी   खुले  इक   किताब  जैसा है /5/

मेरे  इस मुल्क में  बसते  है सारे ही मजहब
मुल्क गुलशन में खिला इक गुलाब जैसा है/6/

करीब पा के तुझे फिर न ये मचल जाए

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करीब  पा के तुझे  फिर  न ये  मचल जाए
कुछ ऐसी  बात करो  दिल मेरा बहल जाए/1/

खयाल ख्वाब में तुझको ही ढूंढा है अक्सर
यूं  ही  न  राह तकाई में  दिन ये  ढल जाए/2/

हजार   तौर    अदब    एहतराम    होते हैं
ये  सोंच सोंच  न  तहजीब  ही बदल जाए/3/

सहम सहम के जरा घर से हम निकलते हैं
कि हादसों को  कहीं से  पता न चल जाए/4/

रहे जो  शाख  तो  कल  फूल  पत्ते आयेंगे
बुरा ये  दौर  किसी  तर्ह  बस निकल जाए/5/

कहीं कुछ बोलता कोई नही है

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कहीं   कुछ   बोलता   कोई  नही है
यहाँ  अब    आसरा   कोई   नही है/1/

सब अपने आप में  मशरूफ है बस
किसी   से   राब्ता    कोई    नही है/2/

खुदा  मिलने  लगे हैं हर कदम पर
मगर   इंसा   मिला   कोई   नही है/3/

मैं  ढूंढे  जा रहा हूँ जाने क्या क्या
मेरा  अपना   पता   कोई  नही है /4/
 
न की गल्ती कभी कोई हो जिसने
अब  इतना  पारसा  कोई  नही है/5/

यहीं आकर के सीखा है सभी ने
हमल  में  सीखता  कोई  नही है /6/

तमन्ना  आरजू  उम्मीद  है क्या
हूँ  सजदे  में  दुआ कोई नही है /7/

भला कैसे कहूँ खुद को सुखनवर
अदब  से  राब्ता   कोई  नही है/8/

कई मिल जाते हैं राहों में हर दिन
मगर  उनमें  मेरा  कोई  नही है /9/

गुजर जाते बगल से हादसों के
ठहर कर  देखता  कोई नही है /10/

भटकता है कहाँ ऐ दिल बता दो
किसे  है  ढूंढता  कोई  नही है /11/

जिधर देखो यहां मातम है पसरा
कहीं भी  शाद सा कोई नही है /12/

यूँ तो हर तर्फ खुश्बू है महक है
मुअत्तर  आप सा कोई नही है /13/

मैं खुद से दूर होता जा रहा हूँ
कि अब मुझमें मेरा कोई नही है /14/

हमे दिल का कभी व्यापार करना ही नही आया

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हमे  दिल  का  कभी  व्यापार  करना  ही  नही आया
मुहब्बत   को  कभी  बाजार  करना  ही  नही  आया/1/

भरा  रहता  दुखों  से  हर समय  यूँ तो  हृदय अपना
दुखी  मन  का  हमें  विस्तार  करना  ही  नही आया/2/

यही  कारण  सदा  ही  मात  खाया  हमने जीवन में
हमें  सच  बोल कर   इंकार  करना  ही  नही  आया/3/

लगा  इल्ज़ाम  है  हम पर दगा करने का उल्फत में
मगर  हमको  कभी  तकरार  करना  ही नही आया/4/

बहुत  ही  साफगोई  से   सदा  हर  बात  की  हमने 
कभी  लहजा   हमें  श्रृंगार  करना  ही  नही  आया/5/

वो जब मिलता है तो बस सादगी की बात करता है
दिखावा  ऐसे  हमको  यार  करना  ही  नही आया/6/

शराफत  का  सदा  जिम्मा  रहेगा  क्या  हमारा ही
उन्हे  अच्छा  कभी  व्यवहार  करना ही नही आया/7/

हुए  नाराज  अक्सर  ही  जरा  सी  बात पर  रिश्ते
बना कर  के  हमे  गुफ्तार  करना  ही  नही  आया/8/

लगाया है गले  हर मोड़ पर जो गम मिला हमको
कि शरणागत का यूँ दुत्कार करना ही नही आया /9/

लुटायी है सभी में खोलकर जी हमने तो खुशियाँ
हमें  ता जिंदगी   भंडार  करना   ही  नही  आया/10/