है लगी आग सी वहां शायद
जल रहा दिल है या मकां शायद
कर लिए कान बंद लोगों ने
शोर लगती है सिसकियां शायद
बात होती न दरमियाँ कुछ भी
बढ़ गई अब है तल्खियां शायद
जल रही दास्तां मुहब्बत की
है उसी का धुआं धुआं शायद
ख्वाहिशें सब दबा के रखती है
सब समझती है बेटियाँ शायद
आदमियत हुई पशेमां फिर
अब ये बन जाए सुर्खियां शायद
इक नया हादसा हुआ फिर से
अब न आए कोई बयां शायद
मां की छाती से फिर लहू निकले
चीखीं हैं भूखी लोरियाँ शायद
फिर किया जिंदगी से समझौता
है जरुरी ये खामियां शायद
चांद के दाग दिख गए सबको
फिर से आए ये फब्तियां शायद