Friday, 18 January 2019

है लगी आग सी वहां शायद

है  लगी  आग  सी  वहां  शायद
जल रहा दिल है या मकां शायद

कर  लिए   कान  बंद  लोगों ने
शोर लगती है  सिसकियां शायद

बात होती  न दरमियाँ  कुछ भी
बढ़ गई अब है  तल्खियां शायद

जल  रही  दास्तां  मुहब्बत  की
है उसी  का  धुआं धुआं  शायद

ख्वाहिशें  सब  दबा के रखती है
सब  समझती  है बेटियाँ  शायद

आदमियत   हुई   पशेमां   फिर
अब ये बन जाए सुर्खियां शायद

इक  नया हादसा  हुआ  फिर से
अब न आए  कोई  बयां  शायद

मां की छाती से फिर लहू निकले
चीखीं हैं  भूखी  लोरियाँ  शायद

फिर किया  जिंदगी से  समझौता
है  जरुरी   ये   खामियां   शायद

चांद के  दाग  दिख  गए सबको
फिर से आए ये फब्तियां शायद

Friday, 4 January 2019

मिला खूब हमको है धोखा यहीं पर

मिला खूब हमको  है धोखा यहीं पर
किया  शिद्दतों  से  भरोसा  यहीं पर

वफाओं का क्या खूब बदला दिया है
मरासिम लगा  अजनबी सा यहीं पर

किसे अब कहें  आशना है  ये हमसे
लगा गैर सा  सब ही  चेहरा यहीं पर

वो  तारों  भरी   रात  तन्हा  लगी है
मिला चांद  पागल भटकता यहीं पर

लगी भीड़ यूं तो शहर भर में लेकिन
जुबां सबकी  खामोश  देखा यहीं पर

चरागां किया  कोना कोना  शहर का
रहा  कैसे   बाकी  अंधेरा  यहीं  पर

कि  मुद्दत  हुई  चांद  गुजरे  यहाँ से
अभी तक  उजाला है ठहरा यही पर

सियासत  गई  है  पहुंच  हादसे तक
नही  क्यूँ ये  राहत है पंहुचा यहीं पर

शिकायत रही  खूब सबको ही हमसे
किया हमपे अक्सर ही चर्चा यहीं पर

Wednesday, 2 January 2019

तमाशा हुआ खत्म जोकर अकेले थे

तमाशा हुआ  खत्म  जोकर अकेले
थे किरदार  ढेरों  वो था पर अकेले

वो रोया है परदे के पीछे ही लेकिन
जमाने को  हरदम हंसा कर अकेले

शिकायत ही करते  रहे उम्र भर हम
गई  जिंदगी  हमको जी कर अकेले

शरारत  बहुत  हो  गई  जिंदगी अब
कभी तो हमे मिल  तु आकर अकेले

मशक्कत किया जिंदगी भर ही उसने
है भटका  जमाने  में  दर दर अकेले

वफाओं ने  क्या खुब  बदला दिया है
रहा  शख्स  बरसों  ही  बेघर अकेले

ढोता है  बिचारा  वो  पत्थर  अकेले
मशक्कत  बड़ी  वो  रहा कर अकेले

हवाओं को भी  आ गया फिर पसीना
दिया  जलते देखा जो दर पर अकेले

वतन  से  बगावत दिलों में है नफरत
चला  तो  नही है  वो  पत्थर अकेले

यकीनन  वजह भी बड़ी ही वो होगी
न करते  बगावत  यूं  मर कर अकेले

जमाने को  खुशियों की सौगात देकर
गया  फिर   बिचारा  दिसंबर  अकेले