मिला खूब हमको है धोखा यहीं पर
किया शिद्दतों से भरोसा यहीं पर
वफाओं का क्या खूब बदला दिया है
मरासिम लगा अजनबी सा यहीं पर
किसे अब कहें आशना है ये हमसे
लगा गैर सा सब ही चेहरा यहीं पर
वो तारों भरी रात तन्हा लगी है
मिला चांद पागल भटकता यहीं पर
लगी भीड़ यूं तो शहर भर में लेकिन
जुबां सबकी खामोश देखा यहीं पर
चरागां किया कोना कोना शहर का
रहा कैसे बाकी अंधेरा यहीं पर
कि मुद्दत हुई चांद गुजरे यहाँ से
अभी तक उजाला है ठहरा यही पर
सियासत गई है पहुंच हादसे तक
नही क्यूँ ये राहत है पंहुचा यहीं पर
शिकायत रही खूब सबको ही हमसे
किया हमपे अक्सर ही चर्चा यहीं पर
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