Friday, 18 January 2019

है लगी आग सी वहां शायद

है  लगी  आग  सी  वहां  शायद
जल रहा दिल है या मकां शायद

कर  लिए   कान  बंद  लोगों ने
शोर लगती है  सिसकियां शायद

बात होती  न दरमियाँ  कुछ भी
बढ़ गई अब है  तल्खियां शायद

जल  रही  दास्तां  मुहब्बत  की
है उसी  का  धुआं धुआं  शायद

ख्वाहिशें  सब  दबा के रखती है
सब  समझती  है बेटियाँ  शायद

आदमियत   हुई   पशेमां   फिर
अब ये बन जाए सुर्खियां शायद

इक  नया हादसा  हुआ  फिर से
अब न आए  कोई  बयां  शायद

मां की छाती से फिर लहू निकले
चीखीं हैं  भूखी  लोरियाँ  शायद

फिर किया  जिंदगी से  समझौता
है  जरुरी   ये   खामियां   शायद

चांद के  दाग  दिख  गए सबको
फिर से आए ये फब्तियां शायद

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