Saturday, 3 February 2018

बहुत करीब से गुजरी हैं अजनबी की तरह

बहुत करीब से गुजरी है अजनबी की तरह
जिंदगी  मिली नही कभी  जिंदगी की तरह

तमाम  उम्र   उदासियों  के  दरमियां गुजरी
लगे हैं अब तो ये उदासी भी खुशी की तरह

मेरा हमसाया सा लगता है  चांद अधूरा सा
अधूरापन ये मुझे लगता है बेबसी की तरह

ख्वाब उजालों के  ना दो  बुझी निगाहों को
ये उजाले भी हमे लगते हैं  तिरगी की तरह

हम सांस भी लेते हैं  या कोई लगान देते हैं
गुजरे है  हर एक लम्हा खुदखुशी की तरह

चला जाता हूँ बदहवास कुछ उम्मीद लिये
मोड़ के पार  दिख रही है  रोशनी की तरह

Thursday, 1 February 2018

लहजा मिजाज नाज नजरिया बदल गया

लहजा, मिजाज, नाज, नजरिया बदल गया
महफिल में हमको देखा तो चर्चा बदल गया

जाने  क्या सोंच कर के वो नजरें झुका लिये
अपनो की भीड़ में कोई"अपना" बदल गया

तेरे  शहर में  अपने भी  यूं तो थे "मोतबर"
तुमसे हुई जो "उल्फत" भरोसा  बदल गया

सुब्ह  जो थे "हबीब"  हुई  "शाम" खो गये
बदलते ही "वक्त"के सभी रिश्ता बदल गया