Thursday, 30 June 2016

जरा सी बात पर हमसे खफा हो

जरा सी बात पर हमसे खफा हो
चला है दिल कहां हमसे जुदा हो

इस कदर बेआबरू सा हो करके
कौन है जो बज्म से तेरी उठा हो

शख्सियत तेरी भी जाहिर तो हो
दाग रहने दे जो दामन में लगा हो

यकसा मै लग रहा बिखर के भी
मर के भी लगता नही मै मरा हो

धुप फैली हर मकां  अच्छा लगा
मकीं नही मिला हमें जो भला हो

मोम के थे रिश्ते पिघल गये होंगे
वक्त की आंच से शायद बचा हो

ढुंढ लेना यही कहीं पे ही मिलेंगे
तुझमेँ भी मेरे वजूद के निशां हो

Saturday, 25 June 2016

बस्ती के हर एक घर में उतर गई थोड़ी सी धुप

बस्ती के हर एक घर में उतर गई थोड़ी सी धुप
मेरा आंगन भुल जाने किधर गई थोड़ी सी धुप

अपने हिस्से उजियारे का एक टुकड़ा चाहा था
घने अंधेरों में छटपटा के मर गई थोड़ी सी धुप

दोपहर में तन्हा तन्हा भटक रहा था आफताब
छत पे इक कोने बैठी   ठहर गई थोड़ी सी धुप

आरज़ू, अरमान, तमन्ना, रफ्ता रफ्ता दफ्न हुए
खुशियों के दामन में जो पड गई थोड़ी सी धुप

तंग दरारों के पीछे से झांकती है  सब ख्वाहिशें
ऊंची दिवारों में दब कर   रह गई थोड़ी सी धुप

रिश्तों की इक फटी चादर में चंद रिश्ते पाले था
कुम्हलाये सब रिश्ते जो उधर गई थोड़ी सी धुप

Thursday, 23 June 2016

सदियों तक किसकी अदायत कौन करता है

सदियों तक किसकी  अदायत कौन करता है
इतनी शिद्दत से आज मुहब्बत कौन करता है

सुब्ह की सुरत धुंधला जाती शाम आते-आते
अपने इश्क की ऐसी हिफाजत कौन करता है

कोई भी आता नही है  दैरो हरम के आस्ताने
अब यहां सजदा औ इबादत    कौन करता है

मुझको अपने घर बुला खुद घुमती है बेखबर
ऐ जिंदगी भला ऐसी  हिकारत कौन करता है

बेसब्री से बादलों का रस्ता देख रहा है सुरज
तपती धूप में उसकी सोहबत  कौन करता है

पिसता है ख्वाहिशों औ जरुरतों के दरमियां
उस आम इंसा जैसी हिमाकत कौन करता है

Wednesday, 22 June 2016

सजदा कौन करता है इबादत कौन करता है

सजदा कौन करता है इबादत कौन करता है
मेरे खुदा आज कही मुहब्बत कौन करता है

तेरे शहर आने की  हिमाकत कौन करता है
अपने सुकून से  ऐसी शरारत कौन करता है

जिंदगी के दाम इतने   गिर गए है आजकल
घाटे की कीमत पे    तिजारत कौन करता है

भुख को ही खा जाये कोई दवा तो ऐसी बने
मुफलिसी पर इतनी भी नेमत कौन करता है

मौत की बढ़ती कीमत     बेचैन किये हैं हमे
सौदेबाजी में तेरे यहां मुरव्वत कौन करता है

अपने हक से जो मिली वो खुशी अच्छी लगी
छिनी हुई खुशियों की चाहत   कौन करता है

सर पर हाथ फेरे मां ने   मै मुकम्मल हो गया
सुन ऐ फलक   तेरी हिफाजत कौन करता है

Thursday, 16 June 2016

खुद को ही अपने मे तलाशेंगे किसी रोज

खुद को ही अपने मे तलाशेंगे किसी रोज
कायनात को भुलाकर  देखेंगे किसी रोज

जहन में अल्फाजो ने बगावत कर रखी है
लम्हे चुरा वक्त से कुछ लिखेंगे किसी रोज

नाराज यू्ँ न हो तु ऐ दिल हर एक बात पर 
फुर्सत मिली तो सोचेंगे तुझको किसी रोज

रिश्ते, उम्मीदें, ख्वाब, ताल्लुकात, तमन्नाएँ
जान ले ही लेते हैं ये सहारे भी  किसी रोज

हमपे जो गुजरी है शायद सभी पे है गुजरी
हर फसाना लगे हैं कही सुना है किसी रोज

छोटा बच्चा भी गरीबी से  वाकिफ़ हो गया
अंगूठा चुसता है भुख लगे  जो किसी रोज

मुफलिसी जानती है घर में बिछौना कम है
पलको बिठाती मेहमां जो आते किसी रोज

Wednesday, 15 June 2016

कुछ वहाँ चीज़े हम पुरानी छोड़ आए हैं

कुछ वहाँ चीज़े हम पुरानी छोड़ आए हैं,
आते आते आँखो मे पानी छोड़ आए हैं

कई ख्वाब सडकों पर  भागते फिरते हैं
तन्हा तन्हा सी जिंदगानी   छोड़ आए हैं

जानने वाले हमे यहाँ बहुत से है लेकिन
अपनी वहां पहचान पुरानी छोड़ आए हैं

जरा जरा सी ही जो      अब रह गई हैं
आधी-अधूरी सी   कहानी छोड़ आए हैं

मुश्किलात संग अपना   राब्ता पुराना है
आफत की फिर   निशानी छोड़ आए हैं

अदायत को अपने अब आता नही कोई
उनके ही दर ये मेहरबानी  छोड़ आए हैं

था पहले भी मुझमे अब भी है मुझमे वो
बेलफ्ज खामोश   जुबानी छोड़ आए हैं

Monday, 13 June 2016

कसमसाहट तिलमिलाहट बेबसी देखी गई

कसमसाहट ,तिलमिलाहट  बेबसी  देखी गई
दर्द में लिपटी हुई सी    हर जिंदगी देखी गई

सुरज रोज निकले है पर भी अंधेरा कायम है
सबके घर में आज उधार की खुशी देखी गई

दिलों के भीतर सबके ही पसरा है सन्नाटा सा
चेहरे पर हरेक के यहाँ लाचार हंसी देखी गई

सर गिरे हैं सजदे में     दिलों में है मलाल भरे
इस तरह से हो रही   इबादत बंदगी देखी गई

झीलों के शहर में रहकर पंछी प्यासे फिरते हैं
लोगों के दिलों में अजब सी तिश्नगी देखी गई

जिस्मो जां नही अपनी कोई शय कहां अपनी
कही और जा ठहरी    अपनी खुशी देखी गई